सांप्रदायिकता से चुनावी रोटियां सेकने का वक्त

एटमी करार का पतनाला वहीं का वहीं। यों अपने मनमोहन सिंह ने कई दिनों से बंद पड़ी जुबान खोली। पर कुछ ऐसा नहीं कहा। जो यूपीए-लेफ्ट की राजनीति में फर्क पड़े। मनमोहन ने भी वही पुरानी बात दोहराई। प्रकाश करात ने भी वही पुराना जवाब दोहरा दिया। अब कुछ लोगों की निगाह तीन जुलाई की यूएनपीए मीटिंग पर। पर अपनी निगाह मनमोहन के जी-8 के लिए टोक्यो दौरे पर। यों जी-8 का एटमी करार से कोई सीधा संबंध नहीं। पर कहीं जी-8 का दौरा सरकार का राम-नाम-सत्य न कर दे। सरकार के राम-नाम-सत्य होने की बात चली। तो आज बात जम्मू कश्मीर की। जहां गुलाम नबी सरकार राम-नाम-सत्य के मुहाने पर आ गई। फारुख अब्दुल्ला लंदन से दिल्ली पहुंच गए। हालात सुधारने सोनिया ने सैफुद्दीन सोज को श्रीनगर भेज दिया। पीडीपी ने समर्थन वापस लिया। तो खुद गुलाम नबी ने गवर्नर को चिट्ठी लिखी। कहा- 'सात दिन में बहुमत साबित कर दूंगा।' तो नए-नए गवर्नर एनएन वोहरा क्या करते। उनने सात दिन की मोहलत दे दी। वैसे उमर अब्दुल्ला से किसी ने पूछा- 'क्या विधानसभा में नेशनल कांफ्रेंस समर्थन देगी?' तो उनने कहा- 'मेरी जानकारी के मुताबिक गुलाम नबी के पास बहुमत का जुगाड़।' अपन को तो यह गणित समझ नहीं आया। नेशनल कांफ्रेंस-पीडीपी-पैंथर पार्टी मिलकर छियालीस। तीनों गुलाम नबी सरकार के खिलाफ। सो गुलाम नबी को बहुमत कहां से मिलेगा। सीपीएम के दो भी करार पर तकरार के चलते साथ रहेंगे? अपन को भरोसा नहीं। यानी नेशनल कांफ्रेंस ऐन मौके पर बॉयकाट करे। तभी गुलाम सरकार बचेगी। यों गुलाम सरकार अब तलवार की धार पर। घाटी में मुसलमान खिलाफ। तो जम्मू में हिंदू खिलाफ। कुछ दिन पहले तक नेंका- कांग्रेस गठजोड़ की खुसर-पुसर थी। पर अब अब्दुल्ला बाप-बेटा गलत चाल नहीं चलेंगे। यों अपने गुलाम नबी का कोई कसूर नहीं। पर सोनिया गांधी सीएम बदलने के मूड में। सैफुद्दीन सोज को सीएम बनाने पर विचार। सैफुद्दीन ऐन-आखिरी वक्त सुषमा स्वराज क्यों बनें। याद है- जब साहिब सिंह वर्मा अलोकप्रिय हो गए। तो बीजेपी ने चुनाव से तीन महीने पहले सुषमा को दिल्ली का तख्त सौंपा। पर दिल्ली में बीजेपी की लुटिया डूब गई। अब डूबी हुई लुटिया का ठीकरा अपने सिर क्यों फोड़ें सोज। वैसे भी मुस्लिम बहुल घाटी पीडीपी के हाथ। हिंदू बहुल जम्मू कांग्रेस के हाथ। अब अमरनाथ गुफा-मंदिर बोर्ड को जंगल की जमीन पर जो बवाल हुआ। उससे जम्मू में हिंदू कांग्रेस से खफा। इतवार तक मंदिर को जमीन देने पर घाटी बंद थी। सोमवार को जमीन नहीं देने पर जम्मू बंद हुआ। यानी कश्मीर और जम्मू में टकराव चरम पर। हिंदू और मुसलमान का टकराव बना दिया। यों अपन इसकी जड़ में जाएं। तो कसूर रिटायर हुए गवर्नर एसके सिन्हा का। यह बवाल जंगल की जमीन मंदिर बोर्ड को देने, न देने का नहीं। अलबत्ता डेढ सौ साल से गुफा पर मुसलमानों के नियंत्रण का। कश्मीर के पंडित अकलमंद थे। उनने गुफा की देख-रेख ही नहीं। यात्रियों को सहूलियतें भी लोकल मुसलमानों के हवाले कर रखी थी। पहलगांव-बालतल दोनों रास्तों में सौ फीसदी मुसलमान। बिना मुसलमानों की मदद के अमरनाथ श्रध्दा का केंद्र नहीं बनता। मुसलमानों की भी आमदनी का जरिया बना। पर गवर्नर सिन्हा ने बना-बनाया सारा ढांचा तोड़ दिया। लोकल मुसलमानों को अलग-थलग कर दिया। सो ताजा विवाद सिर्फ जमीन का नहीं। आग तो दो साल से सुलग रही थी। जमीन तो भभकने का जरिया बना। पीडीपी तो कांग्रेस से पीछा छुड़ाने की ताक में थी। जैसे लेफ्ट पार्टियां केंद्र में कांग्रेस से पिंड छुड़ाने की फिराक में। पीडीपी को मौका मिला, तो वह पूरी तरह सांप्रदायिक हो गई। लेफ्ट की नजर भी अमेरिका विरोध से मुस्लिम वोटों पर। बीजेपी को अमरनाथ से हिंदू वोटों का नया हथियार मिल गया।

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