अफजल की ढाल बन जाल में फंसी कांग्रेस

कांग्रेस-बीजेपी में गाली-गलौज तेज हो गया। अपन को चुनाव की आहट सुनाई देने लगी। यों भी जून का महीना मनमोहन सिंह पर भारी। पर बात वेंकैया नायडू और मनीष तिवारी के तीखे तेवरों की। वेंकैया ने कर्नाटक में फर्टिलाइजर की कमी का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ा। फर्टिलाइजर की कमी ने कर्नाटक में गोली चलवा दी। एक किसान मारा गया। बुधवार को अपने येदुरप्पा मौके पर गए। उनने जो बात बेंगलुरु में कही। वही वेंकैया दिल्ली में बोले। येदुरप्पा ने कहा- 'फर्टिलाइजर की कमी के लिए गवर्नर राज जिम्मेदार। गवर्नर राज में बंदोबस्त नहीं हुए। पिछले साल पहली अप्रेल को 52962 टन खाद मौजूद थी। इस बार सिर्फ 3821 टन। मैंने सीएम बनने पर केंद्र को कहा। तो वादा हुआ- पहली जून को एक सौ बीस लाख टन पहुंच जाएगी। पर आज तक सिर्फ 23 हजार पहुंची।' यों कर्नाटक ही नहीं। मनमोहन सरकार का सभी बीजेपी राज्यों से भेदभाव जारी। इसी से खफा होकर अपने नरेंद्र भाई मोदी बोले- 'केंद्र सरकार एक साल हमें कुछ न दे। एक साल गुजरात से टेक्स भी न ले।' इस पर कांग्रेस जल-भुन गई। अपने मनीष तिवारी को तो यह देशद्रोह दिखने लगा। बोले- 'नरेंद्र मोदी पर देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। क्या संघ ऐसा अखंड भारत चाहता है।' पर तिवारी उस समय बगलें झांकने लगे। जब पूछा- 'तो क्या कांग्रेस मोदी के खिलाफ देशद्रोह की एफआईआर दायर करेगी?' तिवारी बोले- 'जितना कहा, बस उतना ही।' यानी सिर्फ जुबान के तीर। जुबान के तीर तो ऐसे चले, पूछो मत। येदुरप्पा-मोदी-वसुंधरा सबको हत्यारे सीएम बता दिया। आंध्र में किसानों पर चली गोली भूल गए। हरियाणा में मजदूरों पर चली गोली भूल गए। पर तिवारी असल में तो अफजल के मुद्दे पर फंसे। अपने साथ सजा-ए-मौत वालों की फहरिश्त लेकर ब्रीफिंग में पहुंचे। यों अपनी तरफ से तो गुजरात-कर्नाटक और आडवाणी पर बोले। पर पता था- कोई न कोई अफजल पर सवाल पूछेगा। सो कम्प्यूटर की कापी लाए थे। दिखाकर बोले- 'एनडीए राज की पंद्रह माफी अर्जियां पेंडिंग। यूपीए राज की बारह अर्जियां बकाया। एक अर्जी तो 1997 से पहले की। फैसला तो क्रमवार ही होगा। पहले आडवाणी बताएं- उनने पंद्रह अर्जियों पर फैसला क्यों नहीं किया?' सवाल-जवाब हुआ। तो बुरी तरह उलझ गए। आप आंखों देखा हाल पढ़िए। पहला सवाल- 'क्या फैसला नंबर से होगा?' जवाब- 'यही नियम है।' दूसरा सवाल- 'क्या आतंकवादी और बाकी वारदातों में कोई फर्क नहीं?' जवाब- 'कानून की नजर में कोई फर्क नहीं।' तैश में आकर कह गए- 'अफजल का नंबर सत्ताईसवां।' अब सत्रह को सत्ताईस पढ़ गए। तो इसे अंग्रेजी पढ़ाई का कसूर समझिए। जैसे अपन ने लाख कोशिश की। पर अपन अपनी बेटी को डेढ़ और ढाई नहीं समझा पाए। एक बार तो टीवी केबल वाले ने डेढ़ सौ मांगा। तो ढाई सौ थमा दिए थे। वह लेकर चलता बना। पर बात अफजल की माफीनामे वाली अर्जी की। मनीष तिवारी कांग्रेस के नए-नए प्रवक्ता। पर इतिहास में बेहद कमजोर। तो अपन याद कराएं। चौदह साल की हेतल पारेख के बलात्कारी-हत्यारे धनंजय ने माफी की अर्जी दी। तो मनमोहन सरकार ने एक महीने में निपटा दी थी। अर्जी आई थी- पच्चीस जून 2004 को। निपट-निपटाकर चौदह अगस्त को तो फांसी पर चढ़ गए थे धनंजय। इससे पहला किस्सा राजीव की हत्यारिन नलिनी का। सोनिया की सिफारिश पर कुछ महीनों में माफी दे दी थी वाजपेयी सरकार ने। इंदिरा के हत्यारे केहर-सतवंत-बलबीर की अर्जी भी तुरत-फुरत निपटी। फिर जनरल वैद्य के हत्यारों सुक्खा-जिंदा की अर्जी याद करो। जो सिर्फ 36 घंटे में निपटा दी गई थी। नौ अक्टूबर 1992 को फांसी पर लटका दिए गए। और तमिलनाडु के पत्थर मारकर हत्या करने वाले ऑटो शंकर को याद करो। दो महीने में निपट गई थी अर्जी। पर अफजल के मुद्दे पर कांग्रेस को चंडूखाने की नई दलील सूझी।

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