माया-मुलायम खिचड़ी न पकी, न पकेगी

यूपी में है दम। जुर्म यहां है कम। अमिताभ बच्चन का यह नारा चुनाव में खूब चला। पर अमिताभ का यह नारा जमीनी हकीकत से दूर था। सो मुलायम सिंह निपट गए। अपन असल बात कहें। तो मुलायम सिंह मंत्रियों-विधायकों की गुंडागर्दी से ही निपटे। पर मंत्रियों-विधायकों के मुंह में खून लग जाए। तो सपा क्या, बसपा क्या। सो अब मायावती भी उसी रोग की शिकार। पर माया-मुलायम में एक फर्क। मुलायम अपनों के मददगार थे। भले ही वे जुर्म करके आ जाएं। पर मायावती इस मामले में मुलायम के उलट। क्रप्शन के लिए रोकती नहीं। जुर्म करने पर छोड़ती नहीं। मुलायम राज में बिगड़े मंत्री-विधायक अब मुश्किल में। मायावती अब तक तीन मंत्री निपटा चुकी। एक भू-माफिया सांसद उमाकांत यादव भी निपटाया। याद न हो, तो याद करा दें। मायावती ने उमाकांत को अपने घर पर बुलाकर गिरफ्तार करवाया। मंत्रियों-विधायकों-सांसदों के लिए चेतावनी थी। पर जो ना समझे, वे अनाड़ी थे। सो अब तक एक सांसद-तीन मंत्री निपट चुके। सबसे पहले अनंत सेन यादव निपटे। फिर डाक्टर संख्वार निपटे। अब यमुना निषाद। पर अपन ने बात शुरू की थी अमिताभ बच्चन से। जिनका अब यूपी से वैसा नाता नहीं। जैसा मुलायम राज में था। मुलायम राज को याद करें। तो तिकड़ी का दबदबा खूब रहा। अमर-अमिताभ-सुब्रत की तिकड़ी ऐसी थी। जैसे अमर-अकबर-एंथनी की थी। जुर्म के मामले में तो अमिताभ की खूब लानत-मलानत हुई। अमर सिंह मुकदमों में फंस गए। रहे सुब्रत राय सहारा। 'मुलायम' राज गया। तो 'माया' की शक्ति शुरू हुई। माया सरकार की रिजर्व बैंक को एक चिट्ठी गई। रिजर्व बैंक फौरन हरकत में आया। सहारा फाइनेंशियल कार्पोरेशन पर रोक लगा दी। इधर 'सहारा' कोर्ट में गया। रिजर्व बैंक के फैसले पर रोक की गुहार लगाई। उधर मुलायम पहुंचे मायावती के घर। यों मायावती ने बुलाया था- मानवाधिकार आयोग का अध्यक्ष तय करने के लिए। कानून के मुताबिक कमेटी में सीएम और विपक्ष का नेता भी। मुलायम चाहते, तो न जाते। पर मायावती का फोन आया। तो जा पहुंचे। अब तेरह साल बाद माया-मुलायम आमने-सामने बैठे। तो कलमकारों ने हवाई उड़ानें शुरू कर दी। किसी को तेरह साल बाद बर्फ पिघलती दिखी। तो किसी को 'सहारा' की मदद का चक्कर दिखा। लगे राजनीति के हवाई किले बनाने। अब हुआ भी यह। इधर माया-मुलायम मिले। उधर यूपी सरकार से रिजर्व बैंक को नई चिट्ठी चली गई। जिसमें पहली चिट्ठी वापस लेने की बात। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी रिजर्व बैंक को दुबारा सुनवाई का हुकम दे दिया। अपन को अब रिजर्व बैंक का फैसला पलटने की उम्मीद ज्यादा। सिर्फ माया-मुलायम मुलाकात नहीं। सोनिया-मुलायम नजदीकी भी हो चुकी। पर बात माया-मुलायम मुलाकात पर हुई हवाई उड़ानों की। यों राजनीति में जो कहा जाए। वह असल में हो भी, कोई जरूरी नहीं। पर अमर सिंह मंगलवार को खुलकर सामने आए। अखबारनवीसों की हवाई उड़ानों की धज्जियां उड़ाते बोले- 'मायावती के साथ कोई राजनीतिक समझौता नहीं हो सकता। उसका हाथ अतीक अहमद, मुख्तार अंसारी, डीपी यादव जैसों के सिर पर। उसने दो बार बीजेपी से मिलकर सरकार बनाई। वह अब भी बाकी राज्यों में बीजेपी की मददगार। वह नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर बैठी।' सोचो, कुछ पक रहा होता। तो अमर सिंह मशीन में भुन रहे पॉपकार्न की तरह न फड़फड़ाते। अमर सिंह शहरी कल्चर के न होते। तो अपन भड़भूंजे की भट्टी का जिक्र करते। पर अमर सिंह कुछ भी कहें। मुलायम राज में जुर्म कम नहीं थे। अपने तीन मंत्रियों की बलि देकर मायावती ने बदमाशों में दहशत मचा दी। मंगलवार को मायावती विधायकों-सांसदों-मंत्रियों-पदाधिकारियों की मीटिंग में बोली- 'कानून अपने हाथ में लेने वाले संभल जाएं।' पर बात माया-मुलायम मुलाकात की। लोग कैसी भी हवाई उड़ानें भरें। अपन को ना तो बर्फ पिघलती नजर आई। न कोई नए राजनीतिक समीकरणों की उम्मीद।

बहुत पहले एक उपन्यास पढा था

बहुत पहले एक उपन्यास पढा था 'सबसे बडा गुण्डा'। इसका मुख्य पात्र (एक पुलिस इंसपेक्टर) पहले अपने इलाके के गुण्डो का सफाया करता है और फिर कुछ बडे गुण्डो को उस इलाके मे क्राइम करने का ठेका दे देता है। कहीं यू पी भी इसी रास्ते तो नही??

खेल है माया का. माया भी माया

खेल है माया का. माया भी माया में फस गई, दुसरी चिट्ठी भेज दी, सहारा को सहारा मिला.

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट