जैसे भ्रष्टाचार नेताओं का जन्मसिध्द अधिकार हो

बीजेपी आलाकमान ने खाट खड़ी की। तो इतवार की रात एमपी भवन में मीटिंग हुई। रात बारह बजे तक चली मीटिंग। सीएम शिवराज चौहान के साथ मौजूद थे नरेंद्र तोमर और माखन सिंह। हेल्थ मिनिस्टर अजय विशनोई भी तलब किए गए। रास्ता नहीं बचा था। सो अजय विशनोई से इस्तीफा मांगा गया। भले ही इस्तीफे के बाद सीएम ने ना-नुक्कर की। ना-नुक्कर का मतलब अपने मंत्री को दूध का धुला बताना। पर इस्तीफे का फरमान खुद दिल्ली से लेकर गए थे। अजय विशनोई शुक्रवार को सुर्खियों में आए। जब विशनोई के भाई पर इनकम टेक्स के छापे पड़े। मंत्री बनने से पहले विशनोई का धंधा भी हेल्थ से जुड़ा था। मंत्री भी हेल्थ के बना दिए गए। वैसे राजनीतिक मर्यादा इसकी इजाजत नहीं देती। पर कहां रही मर्यादा? केंद्र के मंत्री प्रेमचंद को ही लो। जिनकी अपनी कंपनियों पर ढेरों मुकदमे। पर मनमोहन सिंह ने कंपनी मामलों का मंत्री बना दिया। सो अपने शिवराज चौहान ने भी वही किया। भाई पर छापा पड़ा। तो आरोपों के छींटे अजय विशनोई पर भी पड़े। खुद देना होता, तो शुक्रवार को ही इस्तीफा दे देते। यों भी मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं। प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल आरोपों में घिरे रहे। प्राइमरी स्कूल के टीचर थे। इस जहां से गए। तो करोड़पति थे। अपने बृजेश मिश्र के पिता डी पी मिश्र को तो इस्तीफा देना पड़ा था। एमपी के ही श्रम मंत्री हुआ करते थे वीवी द्रविड़। वह भी भ्रष्टाचार में निपटे। एमपी से ही केंद्र में संचार मंत्री थे खुर्शीद लाल। मुंबई के एक जौहरी से चांदी का टी-सैट लेकर फंसे। तो नेहरू ने इस्तीफा ले लिया। विंध्या के उद्योगमंत्री शिव बहादुर सिंह का किस्सा तो आज भी लोगों की जुबान पर। हीरों की खदान की लीज बढ़ाने में पच्चीस हजार रुपए की रिश्वत लेते पकड़े गए। सरदार पटेल ने गिरफ्तारी का आदेश दिया। आखिर उनने दिल्ली के कांस्टीटयूशन क्लब में आत्म हत्या कर ली। भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस हो या बीजेपी। दोनों के नेता दागदार। जनता शासन याद करो। संचार मंत्री हुआ करते थे बृजलाल वर्मा। उनने तो चैक से रिश्वत लेने का रिकार्ड बनाया। मोरारजी देसाई ने निकाल बाहर किया। बीजेपी के पहले सीएम वीरेंद्र सकलेचा को ही लो। भ्रष्टाचार के बेहिसाब आरोप लगे। तो बीजेपी आलाकमान को छुट्टी करनी पड़ी। तभी सकलेचा की जगह पर पटवा की लाटरी खुली थी। सकलेचा पार्टी छोड़ गए। फिर बहुत देर बाद बामुश्किल लौटे। यह तो रही पुरानी-पुरानी बातें। नरसिंह राव का शासन याद करो। वह मशहूर हवाला कांड। हालांकि बाद में सब बरी हो गए। पर मध्यप्रदेश की बड़ी-बड़ी मछलियां शामिल थी। तीन मंत्रियों को तो नरसिंह राव ने निकाल बाहर किया था। लोकसभा का टिकट भी काट दिया। कमलनाथ ने अपनी पत्नी को टिकट दिलाया। अरविंद नेताम ने अपनी पत्नी को। माधव राव सिंधिया को राव का फैसला नहीं जंचा। तो वह कांग्रेस छोड़ चुनाव में कूदे। लिस्ट में नाम तो श्यामाचरण, विद्याचरण, पुरुषोत्तम कौशिक, चंदूलाल चंद्राकर, मोती लाल वोरा का भी था। मोती लाल वोरा की बात चली। तो ताजा किस्सा सुनाएं। स्कार्पियन घोटाला इसी यूपीए सरकार का। अभिषेक वर्मा पर वार-रूम लीक का मामला। वार-रूम लीक का स्कार्पियन घोटाले से जुड़ाव। कांग्रेस के पूर्व सांसद दंपत्ति श्रीकांत वर्मा-रीता वर्मा के सुपुत्र हैं अभिषेक वर्मा। अभी-अभी तीस लाख की जमानत पर छूटे। तो शनिवार को मोती लाल वोरा के पांव छूने गए। किसी के पांव छूने में कोई बुराई नहीं। पर अपन बता रहे थे मध्यप्रदेश के जांबाज किस्से। अजय विशनोई को पूरा हक- वह खुद को पाक-साफ बताएं। नरसिंह राव का मशहूर जुमला था- 'जब तक आरोप साबित न हो, तब तक आरोपी बेगुनाह।' हवाला घोटाले में कांग्रेस के तीन दर्जन नेता फंसे। तो सरकार बचानी मुश्किल हो गई। तब राव का जुमला था- 'कानून अपना काम खुद करेगा।' अजय विशनोई के मामले में भी वही।

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