गुर्जरों को एसटी दर्जे पर ऐसे कन्नी काटी कांग्रेस

सौ साल पहले गुर्जर चाहते थे- उन्हें क्षत्रीय माना जाए। आज कह रहे हैं- 'हमें अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिले।' पर गुर्जर हैं क्या? अपन इतिहास के पन्ने पलटें। तो गुर्जरों की कई कहानियां मिलेंगी। पहली कहानी- हूण दो गुटों में बंट गए। रेड हूण और सफेद हूण। रेड हूण यूरोप चले गए। सफेद हूण ऑक्सेस घाटी पार कर काबुल में घुसे। काबुल में उनने किशन साम्राज्य पर कब्जा किया। फिर भारत में घुस आए। कहानी है- वे जॉर्जिया से आए। जो अंग्रेजी में 'जी' से शुरू होता है। जॉर्जिया का अपभ्रंश ही गुर्जर- गुज्जर हुआ। वे जॉर्जिया से मध्य एशिया, इराक, ईरान, अफगानिस्तान से खैबर दर्रा पार कर भारत में घुसे। दूसरी कहानी- गुर्जर असल में राजपूत थे। मुगलों ने भारत पर हमला किया। तो औरंगजेब से राजपूतों का एक समझौता हुआ। समझौता था- 'राजपूत युध्द में हार गए। तो उनका एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम बन जाएगा।' अब भारत में ज्यादातर गुर्जर मुस्लिम। यों हिंदू, सिख और जैनी गुर्जर भी। गुर्जर भारत-पाकिस्तान-अफगानिस्तान में मौजूद। गुर्जरों की बोलियां-गुजरी, उर्दू, हिंदी, पंजाबी, पश्तो, पहाड़ी, कश्मीरी, कुच्ची, खोजकी, गुजराती, खोवर, बाल्टी। भारत में गुर्जर सिर्फ राजस्थान में नहीं। अलबत्ता दिल्ली, हरियाणा, जम्मू कश्मीर, पंजाब, हिमाचल, उत्तराखंड, राजस्थान, यूपी, एमपी, गुजरात, महाराष्ट्र में भी। पर सवाल यह- गुर्जर हैं क्या? राजपूत या पिछड़े या एसटी। छटी शताब्दी में गुर्जरों का राज कई जगह था। दादरी में दरगही सिंह गुर्जर राजा थे। जिनका शासन 133 गांवों में था। मेरठ का परिलक्षितगढ़ किला गुर्जर राजा नैन सिंह ने बनवाया। राजस्थान में भीनमाल गुर्जर साम्राज्य की राजधानी थी। जिसकी सीमाएं गुजरात तक फैली थीं। गुजरात के सौराष्ट्र में जगह है भरूच। जिसे एक चीनी इतिहासकार ने छटी शताब्दी में गुर्जरों का देश लिखा। केएम मुंशी खुद गुर्जर थे। उनने लिखा है- 'परमदास और सोलंकी गुर्जरों के राजघराने थे।' सोलंकी गुजरात में क्षत्रीय। गुर्जरों का इतना समृध्द इतिहास। फिर वे एसटी कैसे होंगे? गुर्जरों की भूल-भूलैया यहीं खत्म नहीं होती। गुर्जर हिमाचल-जम्मू कश्मीर में एसटी। पर राजस्थान-मध्यप्रदेश में ओबीसी। गुर्जरों का आजादी के पहले आंदोलन में अहम रोल था। अंग्रेजों के खिलाफ मेरठ में 1857 का आंदोलन शुरू हुआ। ब्रिटिश गजेटियर के मुताबिक अगुवाई गुर्जरों-मुस्लिम राजपूतों ने की। सो अंग्रेजों ने गुर्जरों को क्रिमिनल ट्राइब घोषित कर दिया। यों मीणाओं को भी अंग्रेजों ने क्रिमिनल ट्राइब लिखा। दोनों ने 1857 में अंग्रेजों को लूटा। इसलिए अंग्रेजों ने इन्हें क्रिमिनल ट्राइब कहा। पर गुर्जरों का शासकीय इतिहास उन्हें सिडयूल ट्राइब नहीं बताता। पर लाख टके का सवाल यह- 'गुर्जरों के मौजूदा आंदोलन का हल क्या? क्या आंदोलन का राजनीतिकरण कर हालात बिगाड़े जाएं? क्या इसे भी वोट बैंक का जरिया बना लें? जैसे लालू-मुलायम-पासवान-मायावती का इरादा।' इन चारों ने गुर्जरों को एसटी दर्जा देने की वकालत की। सोचो, राजस्थान में बीजेपी सरकार न होती। तो इन चारों का स्टेंड क्या होता? पर इन चारों में दो तो केंद्रीय मंत्री। जो अपनी सरकार का स्टेंड तो बताएं। अपन को हैरानी केंद्रीय मंत्रियों की हिंसक आंदोलन को शह पर। बैंसला ने आंदोलन की शुरूआत ही हिंसा से की। रेल पटरियां उखड़वा दीं। अब तो नेशनल हाइवे भी जाम कर दिया। तो क्या सरकारें हिंसा के आगे झुक जाएं? क्या सरकारें इतनी कमजोर हो चुकी? अगर हिंसा बात मनवाने का जरिया बन गया। तो अपना देश भुरभर्रा कर गिर जाएगा। अपन सारा पूर्वोत्तर गवां बैठेंगे। जम्मू कश्मीर गंवा बैठेंगे। अपन तो हैरान सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पर। जो वसुंधरा को धमकियां दे रही हैं। बैंसला के हिंसक आंदोलन को खुल्लम-खुल्ला समर्थन। पर गुर्जरों को एसटी दर्जा देने पर जुबान नहीं खोल रही। मनीष तिवारी सीएम वसुंधरा को तानाशाही कह रहे थे। तो अपन ने उनसे पूछा- 'कांग्रेस का स्टेंड तो बताओ?' वह बोले- 'सवाल एसटी दर्जे का नहीं। सवाल वसुंधरा सरकार की तानाशाही का।' असली सवाल से ऐसे कन्नी काटी कांग्रेस।

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