अब स्पीकर-विपक्ष में टकराव का नया एजेंडा

टीआर बालू के मुद्दे पर टकराव अभी थमा नहीं। सोमवार को राज्यसभा में तो घमासान होगा ही। विपक्ष ने मुरली देवड़ा का बयान कबूल नहीं किया। यों भी मुरली देवड़ा विशेषाधिकार हनन के लफड़े में फंस चुके। सदन में बयान बाद में आया। अखबारों में पहले छप गया। सो अपने बिहार वाले दिग्विजय सिंह ने नोटिस दे दिया। यों देवड़ा सदन में तो बोल ही नहीं पाए। लिखा हुआ बयान टेबल करना पड़ा। अपन ने तो उस दिन लिखा ही था- 'मुरली देवड़ा का बयान अंत नहीं होगा। वहां से तो सिर्फ शुरूआत होगी।' विपक्ष मनमोहन से जवाब मांग रहा है। मनमोहन ने भी वही गलती की। वह बुधवार की रात अपने घर पर मीडिया से बोले। संसद में नहीं बोले। यह भी संसद की अवमानना। पर अवमानना का सबसे बड़ा सवाल तो लोकसभा में। जहां अपने स्पीकर दादा सोमनाथ चटर्जी ने नया मोर्चा खोल लिया। सवाल वहां भी बालू-मनमोहन के खिलाफ नारेबाजी का। याद होगा, जब 28 अप्रेल को दादा ने सदन की बिजली गुल कराई। तभी दादा ने सदन के रिपोर्टरों को हिदायत दी थी- 'नारा लगाने वाले मेंबरों के नाम नोट करो।' अपन को तभी शक हुआ था- दादा अब नया टकराव मोल लेंगे। वही हुआ। उनने एनडीए के 21 मेंबरों के खिलाफ एक्शन शुरू कर दिया। इनमें आठ राजस्थान के। महावीर भगोरा, श्रीचंद कृपलानी, वीपी सिंह, भंवर सिंह डागावास, रामसिंह कस्वां, सुभाष महेरिया, सुशीला बंगारू, रामस्वरूप कोली। रूल 349 में नारेबाजी की इजाजत नहीं। लगते हाथों एनडीए के दस और मेंबर बाकी मुद्दों में निशाने पर। इनमें भी एक राजस्थानी किरण माहेश्वरी। बीएसपी के बृजेश पाठक ने बुंदेलखंड का मुद्दा उठाया। तो उस पर भी कार्रवाई शुरू। सभी 32 का मामला विशेषाधिकार कमेटी को। सो अपन को लगता है- स्पीकर-एनडीए टकराव होगा। टकराव कोई पहली बार नहीं होगा। दो बार तो दादा के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की नौबत आ चुकी। पहले नौबत आई 27 फरवरी 2005 को। जब लालू रेल बजट रख रहे थे। बीजेपी ने वाकआउट किया। शिवसैनिक वाकआउट कर रहे थे। तभी शिवसेना सांसद की स्पीकर से भिड़ंत हो गई। स्पीकर ने मनमोहन-प्रणव की तरफ देखते हुए कहा- 'आप इनकी बर्खास्तगी का प्रस्ताव क्यों नहीं लाते।' इस पर एनडीए ने स्पीकर के खिलाफ मोर्चा खोल लिया। मोर्चेबंदी अभी चल ही रही थी। स्पीकर ने झारखंड मुद्दे पर ज्यूडिशरी से टकराव ले लिया। उनने ज्यूडिशरी के खिलाफ स्पीकरों की मीटिंग बुला ली। वह तो चाहते थे- सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड के गवर्नर को जो हिदायत दी। उस पर मनमोहन सरकार राष्ट्रपति से गुहार लगाए। पर हंसराज भारद्वाज नहीं माने। तो स्पीकर को पीछे हटना पड़ा। तब एनडीए भी स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव नहीं लाया। फिर उसी साल अगस्त में ममता बनर्जी से टकराव हुआ। जब उनने बांग्लादेशियों की घुसपैठ पर काम रोको मंजूर नहीं किया। तब कुर्सी पर डिप्टी स्पीकर थे। जब ममता ने कागज फाड़े, इस्तीफा दे दिया। ममता के मुद्दे पर टकराव गंभीर मोड़ ले गया। जब रिटायर्ड सेक्रेट्री जनरल सुभाष कश्यप ने स्पीकर पर भेदभाव का आरोप लगाया। स्पीकर ने कश्यप के खिलाफ भी निंदा प्रस्ताव पास करवाया। फिर जब कम्युनिस्टों ने सिंगूर कांड किया। तो पांच दिसंबर 2006 को वहां पहुंचे राजनाथ सिंह की गिरफ्तारी हुई। स्पीकर ने लालकृष्ण आडवाणी को सदन में मुद्दा नहीं उठाने दिया। पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था। विपक्ष का नेता उठे, स्पीकर रोके। टकराव फिर अविश्वास प्रस्ताव की हद तक जा पहुंचा। एनडीए ने स्पीकर की सभी मीटिंगों का बायकाट किया। ऐसा विरोध आज तक किसी स्पीकर ने नहीं झेला। मनमोहन-प्रणव को बीच-बचाव करना पड़ा। फिर खरबला स्वेन के साथ टकराव हुआ। स्वेन ने भरे सदन में दादा पर पक्षपात का आरोप लगाया। और अब एनडीए के 31 सांसदों के खिलाफ स्पीकर की यह नई मोर्चेबंदी।

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