कर्नाटक में कांग्रेस को सिर मुड़ाते ही ओले पड़े

अपन को अरुण जेटली बता रहे थे- नेहरू की क्षमता चार सौ सीटों की थी। इंदिरा की घटकर तीन सौ रह गई। राजीव गांधी का 1984 छोड़ दें। तो असली क्षमता ढाई सौ बची थी। सोनिया की क्षमता डेढ़ सौ रह गई। राहुल पचहत्तर-सौ पर टिकेंगे। जेटली कुछ भी कहें। राहुल कांग्रेस के युवराज। भले ही युवराज कहने पर राहुल खुद इनकार करें। पर कांग्रेसी युवराज से कम नहीं मानते। भले ही राहुल की राजनीतिक सूझ-बूझ गड़बड़ाने लगी हो। पर राहुल से पहले प्रियंका की बात। प्रियंका जेल में जाकर पिता की हत्यारिन नलिनी से मिली। तो प्रियंका की भावुकता का ढोल बजाया गया। पर जब मुलाकात का राज खुला। तो अपन ने सोलह अप्रेल को लिखा था- 'पहले सोनिया ने नलिनी को फांसी की सजा माफ कराई। अब प्रियंका की नलिनी से मुलाकात।' अपन ने कोई सवाल नहीं उठाया। पर शक की सुई तो घुमाई ही। राजनाथ सिंह ने तो मंगलवार को ही शक जाहिर किया- 'कांग्रेस की कोई नई राजनीतिक रणनीति।' बुधवार को ही खबर आ गई- 'नलिनी ने बाकी की सजा माफ करने की अर्जी लगाई।' कांग्रेस प्रवक्ता शकील अख्तर इसमें सोनिया परिवार की रणनीति नहीं मानते। बोले- 'नलिनी को अर्जी देने का संवैधानिक हक।' अपनी शक की सुई अभी भी जस की तस। अब बात राहुल की। तो राहुल का पहला राजनीतिक पैंतरा ही टांय-टांय फिस्स हो गया। बजट पर भाषण में बोले थे- 'किसानों के कर्ज माफी का दायरा बढ़ाया जाय।' यों तो पिछले हफ्ते शरद पवार ने ही ठुकरा दिया था। पर अभिषेक मनु सिंघवी को उम्मीद थी- 'चिदंबरम बजट पर जवाब देंगे। तो दायरा बढ़ा देंगे।' अब दोनों सदनों में चिदंबरम का जवाब भी हो गया। पर दायरा नहीं बढ़ाया। बात बजट की चली। तो बताते जाएं। राज्यसभा में जसवंत सिंह बोले- 'चिदंबरम ने बजट के अलावा देश पर तीन लाख करोड़ रुपए का बोझ डाला। इससे देश की माली हालत बिगड़ेगी। बेहतर हो चिदंबरम खुद इस्तीफा दे दें। ताकि उनकी बर्खास्तगी की नौबत न आए।' ताकि सनद रहे सो बताते जाएं। बजट में कर्ज माफी के साठ हजार करोड़। सब्सिडी के साठ हजार करोड़। तेल बांडों के दस हजार करोड़। वेतन आयोग के तीस हजार करोड़ के बोझ का जिक्र ही नहीं। चिदंबरम राहुल बाबा की बात मानते। तो वह कहावत सही उतरती- 'पल्ले नहीं दाने, अम्मा चली भुनाने।' बात कांग्रेस की चल ही पड़ी। तो कर्नाटक का जिक्र करते चलें। अपने अरुण जेटली ने वहीं पर बिसात बिछा दी। डेक्कन हैरल्ड-सीएनएन आईबीएन का पहला चुनावी सर्वेक्षण आया। तो उसकी खिल्ली उड़ाते बोले- 'सर्वेक्षण कर्नाटक में नहीं, म्यांमार में हुआ होगा। जब वोटर महंगाई को मुद्दा न मानें। तो समझो सर्वेक्षण भारत में कहीं नहीं हुआ।' हू-ब-हू यही बात बेंगलुरु में अपने अनंत कुमार ने कही। बात सर्वेक्षण की। तो कांग्रेस को 39 फीसदी वोट बताए। बीजेपी को 28 फीसदी। देवगौड़ा की जेडीएस को 20 फीसदी। मायावती की बीएसपी को दो फीसदी। पर बकौल अरुण जेटली हालात एकदम उल्टे। जेटली को बीजेपी के पाले में 38-39 फीसदी वोटों की उम्मीद। इसकी वजह उनने जातीय समीकरण बताया। बकौल जेटली चुनाव चौकोने होंगे। बीएसपी कम बड़ा फैक्टर नहीं। जहां तक बात जेडीयू की। तो नीतीश कुमार-जार्ज ने अनिल हेगड़े के लिए फोन किया। जेटली तैयार हो गए। पर अनिल ने आकर बीजेपी का टिकट मांग लिया। जेडीएस ने जो चौबीस सीटों की लिस्ट दी। उसमें ग्यारह पर बीजेपी के सीटिंग एमएलए थे। सो तालमेल कैसे बैठता। बात कर्नाटक की चल ही रही है। तो बता दें- जाफर शरीफ कैसे मानें। सोनिया ने चुनावों के बाद राज्यसभा का लॉलीपाप दे दिया। कर्नाटक की एक बात और। कांग्रेस का श्रीगणेश तो बाजा बजाने वाला हुआ। उत्तरी देवनगेरे से उम्मीदवार का पर्चा ही खारिज हो गया। इसे कहते हैं सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना।

यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि

यह बिडम्बना ही कही जायेगी कि भारत के उपर कांग्रेस के रूप में गुलामी की तलवार लटक रही है। यदि समय रहते भारत के लोग नहीं चेते तो आने वाली पीढ़ियों को गुलामी का इतिहास फिर दोहराना पड़ेगा।

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