मार्केट सुधारने पर जोर राष्ट्रीय सुरक्षा दांव पर

शेयर बाजार को अपन ज्यादा नहीं जानते। अलबत्ता जानते ही नहीं। सो अपन कभी इस पचड़े में नहीं पड़े। पर जब कभी शेयर बाजार ने भूचाल मचाया। अपन को भी क-ख-ग समझना पड़ा। वाजपेयी के वक्त तब सिर्फ एक बार बवाल मचा। जब सिंगापुर रूट से मार्केट में उछाल आया। यशवंत सिन्हा की बेटी सिंगापुर में थी। सो संसद में ऊंगली सिन्हा पर उठी। सिन्हा तब वित्त मंत्री थे। बाद में वाजपेयी ने धीरे से विदेश मंत्रालय भेज दिया। जिस एनपी रूट ने बुधवार को भूचाल मचाया। वह सिन्हा ने ही 2001 में बनाया। पर एनडीए राज में मार्केट ने इतने उछाल नहीं भरे। जितने मनमोहन राज में भर लिए। ताकि सनद रहे सो बताते जाएं। एनडीए राज आया। तो सेंसेक्स 5,000 से नीचे था। छह साल के राज में सेंसेक्स 6,000 ही पार हुआ। पर मनमोहन के आते ही मार्केट उछलने लगी। अपने कान तो तब खड़े हुए। जब अपने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने कहा- 'मार्केट में आतंकवादियों का पैसा लगने का शक।' तब तक मनमोहन-चिदंबरम  शेयर मार्केट को ही तरक्की का थर्मामीटर बता रहे थे। आप जरा चिदंबरम की शेयर मार्केट का रंग देखिए। जून 2005 तक सेंसेक्स 7,000 पर ही था। छह महीने बाद जब साल खत्म हुआ। तो 9,500 क्रास कर गया। जनवरी की शुरूआत 10,000 से कम पर हुई। पर फरवरी में 10,000 क्रास। मार्च में 11,000 क्रास। अप्रेल में 12,000 क्रास। अक्टूबर में 13,000 क्रास। दिसंबर में 14,000 क्रास। यानी साल भर में करीब-करीब पांच हजार का उछाल। अब इस साल की कहानी सुनिए। जुलाई तक तो मार्केट टाइट रही। पर जुलाई में सेंसेक्स 15,000 क्रास हुआ। सितंबर में 16,000 पार। अक्टूबर में तो गजब हो गया। सत्रह, अट्ठारह, उन्नीस हजार का आंकड़ा सोलह दिन में पार। और सत्रहवें दिन मार्केट धड़ाम से गिरी। अपन ने टटोला। तो पता चला- चिदंबरम ने सुरक्षा सलाहकार नारायणन की चेतावनी पर जरा गौर नहीं किया। मंगलवार को गौर करने का अजीब-ओ-गरीब बयान आया। तो बुधवार को मार्केट डगमगा गई। मंगलवार को सेबी ने कहा- 'पार्टिसिपेट्री नोट यानी पीएन रूट पर शिकंजे के पक्ष में।' अगर इसी रूट के जरिए आतंकियों का पैसा आया। तो सेबी को बयान देने की क्या जरूरत पड़ी थी। अचानक नीति बदल देती। सेबी के इसी बयान ने मार्केट में हड़कंप मचाया। खुलते ही मार्केट 1744 अंक गिर गई। शेयर बाजार का रूल- दोपहर से पहले मार्केट दस फीसदी गिरे। तो एक घंटा बाजार बंद। पंद्रह फीसदी गिरे। तो दो घंटे बंद। दोपहर बाद दस फीसदी गिरे, तो गिरे। पर पंद्रह फीसदी गिरे। तो एक घंटे के लिए बंद होगा। सो रूल के मुताबिक दोपहर से पहले बाजार बंद हुआ। अपन बताते जाएं। पिछले पंद्रह साल में सिर्फ दस बार बाजार बंद हुआ। छह साल के एनडीए राज में सिर्फ एक बार चार अप्रेल 2000 को। राव सरकार में जब मनमोहन एफएम थे। तो हर्षद मेहता घोटाले के वक्त अप्रेल-मई 1992 में तीन बार बाजार बंद हुआ। मनमोहन सरकार में बुधवार को सातवीं बार बाजार बंद हुआ। कोई गड़बड़ घोटाला तो जरूर। सो बीजेपी ने जेपीसी की मांग कर डाली। बकौल प्रकाश जावड़ेकर- 'विदेशी निवेश 3,53,484 करोड़ का। जिसका इक्यावन फीसदी पीएन रूट से आया।' उनने कहा- 'एनडीए ने पीएन रूट बंद करने का फैसला कर लिया था। यूपीए राज की लाहरी कमेटी ने भी ऐसी सिफारिश की। पर यूपीए सरकार सुरक्षा सलाहकार के बयान पर भी नहीं जागी।' उल्टे मार्केट सुधारने के लिए पी चिदंबरम बोले- 'सरकार एनपी रूट के खिलाफ नहीं।' तब जाकर मार्केट सुधरी। अब आप इसी से अंदाजा लगाइए। मार्केट में कितनी हॉट मनी लगी होगी। हॉट मनी यानी आतंकियों का पैसा, ड्रग माफिया का पैसा। चिदंबरम का यह बयान मार्केट भले सुधार ले। पर नारायणन की चेतावनी मार्केट से ज्यादा खतरनाक। बेहतर होता अपन मार्केट को गिराकर राष्ट्रीय सुरक्षा पर गौर करते।

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