एक मशाल तिब्बतियों की आजादी के लिए भी

सुरेश कलमाड़ी की राजनीतिक दुकान नहीं चली। राहुल गांधी तो क्या। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट भी नहीं आए। ओलंपिक मशाल को राजनीतिक अखाड़ा बनाने पर तुले थे सुरेश कलमाड़ी। अपने यहां खेलों पर राजनीतिज्ञों का कब्जा भी लाजवाब। फुटबॉल पर कब्जा प्रियरंजन दासमुंशी का। हॉकी पर कब्जा के.पी.एस. गिल का। तीरंदाजी पर कब्जा विजय कुमार मल्होत्रा का। क्रिकेट पर कब्जा शरद पवार का। और भारतीय ओलंपिक संघ पर कब्जा सुरेश कलमाड़ी का। जो राष्ट्रवादी कांग्रेस से होकर दुबारा सोनिया कांग्रेस में आ चुके। सो उनने ओलंपिक मशाल के बहाने चाटुकारिता का मौका देखा। तो राहुल गांधी को न्यौता दे डाला। राहुल के साथ चार-पांच युवा सांसदों का नाम भी लिया। पर उनमें कोई गैर कांग्रेसी नहीं था। सो इसे अपन राजनीतिक दुकानदारी न कहें, तो क्या कहें। वह तो सोनिया-राहुल को घाटे का सौदा लगा। वरना कलमाड़ी ने चाटुकारिता में क्या कसर छोड़ी। बात चाटुकारिता की चली तो बता दें। अर्जुन सिंह क्या। जिसको मौका मिले, वही चाटुकारिता पर उतारू। पर बात आज चाटुकारिता की नहीं। बात मानवाधिकार की। जिनका गुरुवार को देशभर में हनन हुआ। अपने राजेंद्र बाबू इसका नोटिस लेंगे। अपन को रत्ती भर उम्मीद नहीं। जब सरकार खुद मानवाधिकारों का हनन कर रही हो। पर पूरा देश तिब्बतियों के साथ दिखा। तिब्बतियों ने तो किसी पर दबाव नहीं डाला। पर बाईचुंग भुटिया, किरण बेदी, सचिन तेंदुलकर, जसपाल राणा, अयान अली, सोहा अली खान ने मशाल का बॉयकाट किया। भले ही सबने बॉयकाट की वजह अपनी-अपनी बताई। पर सबके पीछे छिपी थी- तिब्बत की आजादी की मंशा। दिल्ली से लेकर मुंबई तक। कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक। सब जगह तिब्बतियों के समर्थन में जुलूस निकले। अपन तो तिब्बतियों के इस फैसले की दाद देंगे। जिनने दुनिया को जगाने का यह मौका चुना। माना- खेलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए। खेल भावना में राजनीति की घुसपैठ न हो। पर सारे राजनीतिज्ञ खेलों में हो सकते हैं। अपन ने ऊपर राजनीतिज्ञों की घुसपैठ का उदाहरण बताया। सवा महीना दुनियाभर में तिब्बतियों ने चीन का मुंह काला किया। यों भारत में भी सवा महीना प्रदर्शन होते रहे। पुलिस लाठियां भांजती रही। पर तिब्बतियों ने हिम्मत नहीं हारी। गुरुवार को तो सारी दिल्ली पुलिस से भर गई। जहां देखो, पुलिस ही पुलिस। सांसदों को संसद पहुंचने में दिक्कत हुई। विजय कुमार मल्होत्रा ने तो मामला उठाया ही। समाजवादी मोहन सिंह भी लोकसभा में बोले- 'यह कैसा देश है- जहां दूसरे देश का राजदूत हमारी सुरक्षा की समीक्षा करता है।' अपने होम मिनिस्टर शिवराज पाटिल शर्मसार होंगे। अपन को नहीं लगता। पर अपन तो शर्मसार। शांति और भाईचारा फैलाने का जरिया है ओलंपिक मशाल। पर यह मकसद धरा रह गया। अलबत्ता खून की होली खेलते हुए ओलंपिक मशाल चीन पहुंचेगी। पुलिस के साये में मशाल लेकर दौड़ते हुए खिलाड़ियों को किसी ने नहीं देखा। अपने खबरची चैनल न होते। तो किसी को मशाल लेकर दौड़ता कोई खिलाड़ी न दिखता। बात देश के बाकी हिस्सों की। तो बता दें। मुंबई में चीनी वाणिज्य दूतावास के पास प्रदर्शन हुआ। नगालैंड, मणिपुर, मेघालय में प्रदर्शन हुआ। हिमाचल, उत्तराखंड, यूपी, पंजाब, हरियाणा में प्रदर्शन हुआ। तिब्बत के सबसे करीब है लद्दाख। लद्दाख सीमा से सटे डेमचोक, कुयूल, चुसूल, तांगसे, योमा से लेकर लेह तक। लद्दाख और हिमाचल के लाहोल स्पीति तक में प्रदर्शन हुआ। लद्दाख में तो पूरी आबादी सड़कों पर उतर आई। तो यह है भारत की जनता का तिब्बत को समर्थन। प्रदर्शन नहीं हुआ। तो सिर्फ बंगाल और केरल में नहीं हुआ। जहां अब आजादी का कोई मतलब नहीं। मानवाधिकारों का कोई मतलब नहीं। अपनी दिल्ली तो चार घंटे कैदखाना बन गई। पर इस कैदखाने में भी जार्ज फर्नांडीज के साथ कीर्ति आजाद तिब्बत की आजादी की मशाल लेकर दौड़े। तो ओलंपिक मशाल पर भारी पड़ गई आजादी की मशाल।

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