गालिब उठो, सलाम करो लेफ्ट का जुलूस आया है

विपक्ष को फिक्र मंहगाई की। तो कांग्रेसपरस्तों को फिक्र राहुल की। सोमवार को नया बवाल खड़ा हुआ। किसी कांग्रेसी ने नहीं कहा- 'सोनिया-मनमोहन नहीं, अलबत्ता आडवाणी के मुकाबले राहुल को प्रोजैक्ट किया जाए।' पर खबरची पहुंच गए राहुल को प्रोजैक्ट करने का एजेंडा लेकर। ओबीसी आरक्षण के बाद अर्जुन आजकल मीडिया के चहेते। सो सवाल हुआ- 'क्या राहुल गांधी को चुनाव में प्रोजैक्ट किया जाना चाहिए?' सोचो, अर्जुन सिंह क्या जवाब दे सकते थे। यों ही अर्जुन परिवार के भक्त। सो उनने कहा- 'इसमें बुराई क्या है।' उनने अपनी तरफ से राहुलबाजी नहीं की। जब शरद पवार का बयान बताकर पूछा- 'उनने कहा है, मनमोहन के रहनुमाई में चुनाव लड़ा जाए।' तो अर्जुन बोले- 'कई व्यक्तिगत राय हैं। यूपीए को तय करना है। मेरी कोई राय नहीं। जो पार्टी की राय होगी। वही मेरी राय होगी।' पर सबसे टेढ़ा सवाल आडवाणी की काट का नहीं। जैसा कम्युनिस्टों ने तिब्बत के बारे में कहा- 'यह कांग्रेस का अंदरुनी मामला।' राजीवबाजों को अर्जुन सिंह ने भी समझाया- 'मंहगाई चुनाव पर असर डालेगी।' शायद राजीवबाजों को समझ आए- आज का प्रमुख मुद्दा मंहगाई। मंहगाई कांग्रेस का ही बाजा बजा देगी। फिर क्या मनमोहन, क्या राहुल। देख लेना, आज संसद सब्जी मंडी बनेगी। वैसे सचमुच सब्जी मंडी बन जाए। तो मजा आ जाए। कम से कम सत्र तक तो सब्जियां सस्ती मिलेंगी। सोचो, संसद में सब्जी मंडी लग जाए। तो दुकानदार कौन होंगे। एक दुकान खुली होगी- मनमोहन-चिदम्बरम् एंड कंपनी सब्जीवाले। सारा फायदा कांग्रेस न उठा ले। सो लालू अपना ठेला अलग लगाएंगे। वैसे यूपीए सरकार के मंत्री कितना बौरा गए। शरद पवार कहते हैं- 'मैं ज्योतिषी तो नहीं। जो बता दूं- कीमतें कब गिरेंगी।' कपिल सिब्बल कहते हैं- 'हमारे पास कोई जादू की छड़ी तो नहीं।' लालू कहते हैं- 'मंहगाई पर ऐसे हंगामा हो रहा है। जैसे लंका में आग लग गई हो।' मनमोहन सिंह सच बोल रहे हैं- 'मंहगाई को रोकना मुश्किल।' पर सोनिया गांधी को समझ नहीं आ रहा। वह कहती हैं- 'मंहगाई राज्य सरकारें घटाएं।' लालू ने मंहगाई का ठीकरा भाजपाई दुकानदारों के सिर फोड़ा। तो कांग्रेस को अच्छा मौका मिला। दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र में दुकानदारों पर छापे शुरू कर दिए। पर पी. चिदम्बरम् ने वर्ल्ड बैंक की मीटिंग में लालू की पोल खोली। वह सोमवार को वहां बोले- 'मंहगाई को रोकना बहुत जरूरी।' आखिर कर्नाटक के चुनाव सिर पर। उनने कांग्रेस की समस्या वर्ल्ड बैंक में उठा दी। तो वर्ल्ड बैंक भी फिक्रमंद दिखा। वर्ल्ड बैंक का बयान आया- 'दुनियाभर में खाने-पीने की चीजों की कीमतें न घटी। तो सामाजिक अशांति की हवा चलेगी।' अब तो वर्ल्ड बैंक से भी कांग्रेस को समर्थन मिल गया। सो आज कांग्रेस के पास बचाव का एक हथियार तो होगा ही। सत्तर के दशक वाला नारा- 'सारी दुनिया में बढ़ रही है मंहगाई।' मनमोहन कहें- 'मंहगाई के साथ जीना सीखो,' तो अपन को हैरानी नहीं होगी। पर अपन बात कर रहे थे- संसद में होने वाले हंगामे की। आडवाणी ने मऊ में ताल ठोक ही दी- 'संसद में मंहगाई एनडीए का मुख्य मुद्दा।' यह मुद्दा यूएनपीए का भी होगा। मुलायमवादी मोहन सिंह ने काम रोको का नोटिस थमा भी दिया। यों तो मंहगाईपरस्त-अमेरिकापरस्त सरकार खुद लेफ्ट ने बनवाई। सरकार है भी लेफ्ट की बैसाखियों पर। पर लेफ्ट का दोहरा चरित्र भी आज दिखेगा। जब अपनी ही सरकार के खिलाफ जुलूस निकालकर संसद जाएंगे। लेफ्टिए सीताराम येचुरी बोले- 'यूपीए ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया।' जब पूछा- फिर समर्थन वापस क्यों नहीं लेते। तो बोले- 'बीजेपी-कांग्रेस दोनों की आर्थिक नीतियां एक सी।' फिर वही बीजेपी का डर। अपना तो लेफ्टियों को सलाम करने का दिल करा। जो अपनी ही सरकार के खिलाफ जुलूस की नौटंकी करेगी। गालिब उठो, सलाम करो, लेफ्ट का जुलूस आया है।

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