आरक्षण पर अभी खत्म नहीं हुआ टकराव

सीमित अंकों की छूट, क्रीमी लेयर, पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सों में प्रवेश पर विधायिका और न्याय पालिका में टकराव के आसार कांग्रेस को ऊंची जातियों के मध्यम वर्ग की नाराजगी का डर सताने लगा।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछड़ी जातियों को उच्च शिक्षा में आरक्षण के लिए किए गए 93वे संविधान संशोधन को उचित ठहराकर कांग्रेस की अर्जुन सिंह खेमे को ताकत दी है। दूसरी तरफ संविधान संशोधन के समय पूरी तरह भ्रांति में रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ज्ञान आयोग के जरिए देश की प्रतिभाओं को उभारने की मुहिम को धक्का लगा है। यह कहना कि कांग्रेस में पिछड़ी जातियों को शिक्षा में आरक्षण को लेकर एकमत था, ठीक नहीं होगा। पिछड़ा वर्ग कांग्रेस का वोट बैंक नहीं है, अलबत्ता अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक जरूर कांग्रेस का वोट बैंक रहे हैं। संविधान सभा में जब आरक्षण की बात चल रही थी, तब भी कांग्रेस एकमत नहीं थी और अंतत: पिछड़ी जातियों को शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का फैसला नहीं हुआ था। आजादी के पच्चीस साल बाद सामाजिक दबाव के चलते इंदिरा गांधी ने पिछड़ी जातियों के आरक्षण पर नए सिरे से विचार करने के लिए मंडल आयोग बनाया था, लेकिन कांग्रेस में कड़े विरोध के चलते आयोग की सिफारिशें ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी। अनुसूचित जाति, जनजाति और अल्पसंख्यक वर्ग के अलावा ऊंची जातियां कांग्रेस का वोट बैंक रही हैं, जो पिछड़े वर्गों को आरक्षण के खिलाफ दबाव बनाती रही हैं। इंदिरा गांधी के बनाए मंडल आयोग की सिफारिशों को भी गैर कांग्रेसी वीपी सरकार ने लागू किया था। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर देश में जातीय संघर्ष शुरू हुआ और ऊंची जातियों के युवाओं ने खुद को चौराहों पर अग्नि की भेंट चढ़ाकर आरक्षण को रोकने की कोशिश की। उस आंदोलन को पर्दे के पीछे से कांग्रेस और भाजपा का मध्यम वर्ग वोट बैंक पूरी तरह समर्थन कर रहा था। कांग्र्रेस ने आरक्षण लागू किए जाने के तौर-तरीके का सार्वजनिक विरोध किया था। नौकरियों में आरक्षण संबंधी मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने पर भी सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी गई थी। इंदिरा साहनी केस के तौर पर मशहूर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों पर आधारित पूर्ण पीठ के फैसले को आरक्षण के मामले में मील का पत्थर माना जाता है। शिक्षा में आरक्षण पर आए पांच जजों की खंडपीठ के फैसले को भी उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी इंदिरा साहनी केस के फैसले से प्रभावित है। यूपीए सरकार ने 93वां संविधान संशोधन करने के बाद शिक्षा में आरक्षण का कानून बनाते समय इंदिरा साहनी केस को ध्यान में रख कर क्रीमी लेयर को आरक्षण में शामिल न किया होता तो पिछले साल ही आरक्षण लागू हो जाता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब भी क्रीमी लेयर का विवाद खत्म नहीं हुआ है, अर्जुन सिंह की रहनुमाई वाला कांग्रेस का वही वर्ग सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहा है, जिसके दबाव में क्रीमी लेयर को आरक्षण बिल में शामिल किया गया था। अर्जुन सिंह यूपीए के घटक दलों द्रमुक, पीएमके, राजद और लोजपा के साथ मिलकर क्रीमी लेयर पर फैसले को चुनौती देने का दबाव बना रहे हैं। संसद सत्र में क्रीमी लेयर के अदालती फैसले को चुनौती देने का दबाव न्याय पालिका और विधायिका में टकराव के हालात पैदा कर सकता है। पिछड़े वर्ग के सांसद सुप्रीम कोर्ट की इस राय से उत्तेजित हैं, जिसमें सांसदों और विधायकों को क्रीमी लेयर में मानते हुए उनके बच्चों को आरक्षण से वंचित रखने का सुझाव दिया है।

वैसे सरकार के पास अदालत के फैसले को बड़ी वेंच में चुनौती देने का विकल्प खुला हुआ है लेकिन क्रीमी लेयर को आरक्षण में शामिल करना कांग्रेस के एक ताकतवर खेमे को घाटे का सौदा लगता है। ऐसा करने पर ऊंची जातियों का मध्यम वर्ग कांग्रेस से छिटक सकता है और भाजपा उनको लपकने को तैयार बैठी है। फिलहाल वह अकेली पार्टी है जो क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने के पक्ष में है। पिछड़ों को आरक्षण की पैरवी कर रहे जनता दल(यू) के अध्यक्ष शरद यादव अपने स्तर पर क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित करने का विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि नौकरियों में आरक्षण के मामले में क्रीमी लेयर लागू होने के कारण अभी तक पिछड़ों का कोटा भरा नहीं जा सका। उनकी तो यहां तक मांग है कि सरकार पिछले चौदह सालों में ओबीसी को नौकरियों में मिले आरक्षण का श्वेत पत्र जारी करे। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट की भी राय है कि पिछड़े वर्ग की जातियों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिए और क्रीमी लेयर में आ चुकी जातियों को पिछड़े वर्ग से बाहर किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के सत्ताईस फीसदी आरक्षण को उस तरह भी नहीं मान लेना चाहिए, जिस तरह सरसरी तौर पर माना जा रहा है। पिछड़े वर्ग को अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की तरह आरक्षण तय नहीं किया गया है। अलबत्ता प्रवेश में कुछ अंकों की छूट देने की बात की गई है, इस बाबत सरकार को अपने मापदंड तय करने होंगे। जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर ने अपने-अपने फैसले में कहा है कि कोई व्यक्ति वर्ग या धर्म राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता इसलिए प्रतिभाशाली छात्रों को ही तकनीकी संस्थानों और मेडिकल कालेजों में प्रवेश के लिए चुना जाना चाहिए। उन्होंने पिछड़े वर्ग के छात्रों को स्नातक के कोर्सो में प्रवेश के लिए पांच अंक की राहत देने की बात कही है, जबकि जस्टिस भंडारी ने दस अंक तक छूट की बात कही है। पांच में से तीन जजों ने सत्ताईस फीसदी सीटें आरक्षित किए जाने के बावजूद पांच से दस नंबरों तक की अधिकतम छूट की बंदिश भी लगा दी है। इसका मतलब यह भी है कि पिछड़े वर्ग की आरक्षित सीटें खाली होने पर कोई प्रवेश का हकदार नहीं हो जाएगा। पिछड़े वर्ग के सांसद अदालती फैसले के अध्ययन के बाद इस मुद्दे पर भी टकराव की नौबत पैदा कर सकते हैं।

सिर्फ इतना ही नहीं, क्रीमी लेयर से बड़ी मुश्किल तो पोस्ट ग्रेजुएट स्तर के कोर्सो में आरक्षण को लेकर खड़ी हो गई है। मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह इस मुद्दे पर न्याय पालिका से टकराव के मूड में आ गए हैं। जस्टिस अरजीत परसायत और जस्टिस ठक्कर ने अपने फैसले में कहा है कि क्रीमी लेयर को लेकर समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए। जस्टिस भंडारी ने हर पांच साल बाद समीक्षा की बात कही है तो चीफ जस्टिस बालाकृष्णन और जस्टिस रविंद्रन ने आठ अप्रेल 1993 के सरकारी आदेश में बताए गए क्रीमी लेयर के सिध्दांत को उचित माना है। लेकिन यूपीए सरकार के सामने नई मुसीबत शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा घोषित करने के मुद्दे पर आई अदालती राय से पैदा हुई है। अदालत के सामने एक सवाल था कि शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा किसे माना जाए। इस पर जस्टिस भंडारी ने स्पष्ट राय रखी है कि स्नातक की डिग्री हासिल करने वाला शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा नहीं माना जा सकता। जस्टिस भंडारी ने कहा है कि एक बार जब कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री हासिल कर लेता है तो वह शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा नहीं रहता और संविधान के अनुच्छेद 15 (5) के तहत उच्चत्तर शिक्षा में आरक्षण का हकदार नहीं रहता। यानी स्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद कोई भी पिछड़ी जाति का व्यक्ति आगे शिक्षा में आरक्षण का हकदार नहीं रहेगा। डाक्टरी और इंजीनियरी की उच्च शिक्षा बारहवीं के बाद शुरू हो जाती है, इसलिए पिछड़ी जातियों के बच्चों को इन दोनों श्रेणियों में आरक्षण का हक मिलेगा। लेकिन मैनेजमेंट की पढ़ाई स्नातक की डिग्री के बाद शुरू होती है और मैनेजमेंट की पढ़ाई को स्नातकोत्तर माना जाता है, इसलिए उसमें आरक्षण का हक नहीं होगा। इसका मतलब यह हुआ कि आईआईटी और एमबीबीएस कोर्सो में तो आरक्षण मिलेगा लेकिन आईआईएम और एमबीए के बाकी संस्थानों में आरक्षण नहीं मिलेगा। अर्जुन सिंह इसे सिर्फ एक जज की राय मानकर खारिज करना चाहते हैं, लेकिन जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर ने कहा है कि स्नातक स्तर तक शैक्षणिक तौर पर पिछड़ा माना जाना चाहिए। अगर जस्टिस भंडारी की राय को जस्टिस पसायत और जस्टिस ठक्कर से जोड़कर देखा जाए तो पोस्ट ग्रेजुएट कोर्सो में प्रवेश में आरक्षण लागू नहीं होगा।

अब पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा में भी आरक्षण की पैरवी करने वाले दलील दे रहे हैं कि क्या ग्रेजुएट होने पर पिछड़े वर्ग के आरक्षण से वंचित किए जाने वाले इस वर्ग के तहत नौकरियों में आरक्षण के हकदार भी नहीं होंगे। हालांकि यह फैसला सिर्फ शिक्षा में आरक्षण के संबंध में है, जहां तक नौकरियों में आरक्षण का सवाल है, उस बाबत इंदिरा साहनी केस एकदम स्पष्ट है। जिसके तहत 1993 में सरकारी आदेश से बनाई गई क्रीमी लेयर में नहीं आने वाले सभी पिछड़े नौकरियों में आरक्षण के हकदार हैं। लेकिन पोस्ट ग्रेजुएट शिक्षा में आरक्षण के पैरवीकार इस मुद्दे पर न्याय पालिका और विधायिका में टकराव खड़ा करने की कोशिश में जुट गए हैं। मानव संसाधन मंत्रालय पोस्ट ग्रेजुएशन शिक्षा में आरक्षण का आदेश जारी करके एक और अदालती टकराव की तैयारी में जुटा दिखाई दे रहा है।

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