कंधार और हजरतबल यानी हमाम में दोनों नंगे

आडवाणी की लोकप्रियता बढ़ी या घटी। यह हिसाब तो एनडीए लगाए। नफा-नुकसान एनडीए का ही होगा। आडवाणी ने अपनी किताब से इतने विवाद खड़े नहीं किए। जितने किताब की प्रमोशन में दिए इंटरव्यू से। एनडीटीवी का 'वाक दि टाक' तो गले का फंदा बन गया। 'वाक दि टाक' को भी इतनी मशहूरी किसी और नेता ने नहीं दी। जितनी संघ परिवार के दो नेताओं ने। संघ प्रमुख सुदर्शन ने 'वाक दि टाक' में ही अटल-आडवाणी से इस्तीफा मांगा था। अब आडवाणी ने जसवंत सिंह की कंधार यात्रा से पल्ला झाड़ा। तो सवालों की बौछार शुरू हो गई। सोनिया अब तक चुप थी। वह गुरुवार को राजस्थान में जाकर बोली। पहले अपनी वसुंधरा ने सुंधा माता, हिंगलाज माता, गोलासन हनुमान जी से आशीर्वाद ले चुनावी डुगडुगी बजाई। अब सोनिया ने सोम-माही-जाखम नदियों के संगम वेणेश्वर धाम में जाकर अलख जगाई। वहीं पर सोनिया ने आडवाणी को ललकारा। आडवाणी दस जनपथ में कॉफी पीकर लौटे थे। तो सोचते थे- इस चुनाव में उतने पर्सनल हमले नहीं होंगे। पर सोनिया ने हमले शुरू कर दिए। आने वाले दिन और कड़वाहट वाले होंगे। वेणेश्वर से ज्यादा कड़वाहट का संदेश तो कोयम्बटूर से मिला। दूसरी बार महासचिव बनते ही प्रकाश करात ने संघ-बीजेपी को युध्द के लिए ललकारा। सबक सिखाने वाला निर्णायक युध्द। सो आने वाले दिनों में सारा देश केरल बने। तो अपन को हैरानी नहीं होगी। केरल, जहां लेफ्टिए एक साल में साठ संघियों का सिर कलम कर चुके। इसी के खिलाफ संघियों ने दिल्ली में सीपीएम दफ्तर पर तोड़फोड़ की। तो संसद में हंगामा हुआ। बुधवार को संघियों ने पुणे में दिल्ली दोहराया। यानी दोनों तरफ से तलवारें खिंच चुकी। खून-खराबे की राजनीति के दिन आ गए। पर अपन बात कर रहे थे सोनिया के प्रहारों की। उनने कहा- 'आडवाणी कैसे गृहमंत्री थे। जिन्हें आतंकियों के साथ जसवंत सिंह के कंधार जाने की जानकारी नहीं थी। क्या पीएम ने आडवाणी को नहीं बताया? क्या पीएम को आडवाणी पर भरोसा नहीं था? बीजेपी बताए- कौन सी सरकार में आतंकियों की ऐसी मेहमाननवाजी की गई? बीजेपी को आतंकवाद पर बात का क्या हक। बीजेपी का कौन सा नेता आतंकवाद से लड़ता शहीद हुआ? इंदिरा गांधी और राजीव आतंकवाद से लड़ते हुए शहीद हुए।' आडवाणी कटघरे में। पर सोनिया का भाषण लिखने वालों की याददास्त भी कमजोर। अपन आपको याद करा दें। पहला सवाल मेहमाननवाजी का। तो भूल गए- पंद्रह अक्टूबर 1993 को हजरत बल में चालीस आतंकी घुसे। तो कांग्रेस की सरकार थी। जो महीनाभर आतंकियों को गोश्त का 'वाजवान' परोसती रही। वाजवान कश्मीर का शाही खाना। जो घरों में नहीं बनता। अलबत्ता विवाह-शादियों पर 'वाजा' बनाते हैं। 'वाजा' यानी बावर्ची। तब कांग्रेस सरकार ने आतंकियों की सेवा बारातियों जैसी की। बीजेपी का कौन सा नेता आतंकवाद से लड़ता शहीद हुआ? यह लिस्ट तो बीजेपी बताए। पर अपन सिर्फ इतना याद दिला दें। जरनैल सिंह भिंडरावाले को कांग्रेस ने ही पाला-पोसा। जो बाद में इंदिरा की हत्या का कारण बना। लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण तो दिल्ली आकर राजीव गांधी से मिले थे। जिस लिट्टे को राजीव सरकार ने पाला-पोसा। उसी लिट्टे ने बाद में उनकी हत्या की। आतंकवाद को हवा किसने दी? आतंकवाद से कौन लड़ा? इस सवाल का जवाब इन दोनों उदाहरणों में। पर अपने इन जवाबों से एनडीए कंधार मामले में बरी नहीं होती। तीन आतंकियों को छोड़ना भले ही वक्त की मजबूरी थी। पर अपन बता दें- आडवाणी इसके पक्ष में नहीं थे। वह इस्तीफे की हद तक चले गए थे। पर वाजपेयी भीड़तंत्र का शिकार हो गए। उनके घर के सामने भीड़ किसने जुटाई थी? इसकी जांच होती। तो मीडिया का चेहरा भी कालिख से पुता मिलता। पर आतंकियों के साथ उसी विमान पर विदेशमंत्री का जाना। तो वाजवान जैसी मिजाजपुर्सी बन गया। वह कैसी सरकार थी। जो दूसरे विमान का बंदोबस्त नहीं कर सकी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट