महंगाई मुद्दा बना, तो कांग्रेस सस्ते में निपटेगी

अपन दो दिन दिल्ली छोड़ जमीन पर रहे। राजस्थान में पाकिस्तान के बार्डर तक गए। जहां गुजरात से नर्मदा राजस्थान में आई। वह सीलू गांव बार्डर से सिर्फ सोलह किलोमीटर। सो अपन आखिरी इलाके के आदमियों से पूछ आए। अपन को हर कोई महंगाई से दु:खी लगा। अपन ने भीलों के वे इलाके भी देखे। जहां न बंदा न बंदे की जात। आती-जाती गाड़ी दिख जाए। तो लूटपाट होना तय। अपन ऐसी गरीबी को देखकर दिल्ली लौटे। जगमग दिल्ली, जहां बैठकर ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। जब अपन को ऐसे भारत की कल्पना नहीं होती। तो पी. चिदंबरम को कहां से होगी। चिदंबरम तो यों भी सड़क पर सफर नहीं करते। लालगढ़ वह जगह थी। जहां वसुंधरा ने बटन दबाकर सीलू हैड का फाटक खोला। तो नर्मदा का पानी छल-छल करता बहने लगा। वहीं पर आई अनपढ़ औरतों से अपन ने पूछा- 'नर्मदा से आपकी जिंदगी में क्या फर्क पड़ेगा?' तो वह बोली- 'पानी मिलेगा, तो फसलें अच्छी होंगी। गरीबी से निजात मिलेगी।' अपन को ये तीन लाइनें सुनने में मशक्कत करनी पड़ी। स्कूल जा चुके 18 साल के लड़के ने सवाल पूछने में मदद की। अपन को जवाब बताने में मदद की। पानी से गरीबी को जोड़ सीलू की उस अनपढ़ औरत ने अपना दर्द उड़ेला। बात नर्मदा के पानी की चली। तो अपने अशोक गहलोत की टिप्पणीं बताते जाएं। उनने नर्मदा के पानी को वसुंधरा का चुनावी स्टंट कहा। अपन को गहलोत की टिप्पणीं पर सदमा लगा। नर्मदा का पानी नहर में आता अपन खुद देखकर न आते। तो चुनावी स्टंट मान ही लेते। पानी तो आ चुका। पीने को भी मिलेगा, खेतों की प्यास भी बुझाएगा। पाईपें नहीं बिछी। इस बात से अपन सहमत। पर पाईपें बिछाने का काम उतनी सुस्त रफ्तार से भी नहीं। जितने अपने गहलोत बाबू सोचते होंगे। तीस जून तक किसानों का कर्ज माफ हो गया। तो उसके इर्द-गिर्द पाईप लाइन भी बिछ गई होगी। बात कर्जमाफी की चली। तो राजनीतिक दलों के नए पैंतरे बता दें। राजस्थान की बात ही लो। वसुंधरा बता रही थी- 'राज्य में पैंतीस लाख किसान। पर कर्ज माफ होगा सिर्फ ढाई लाख का।' नर्मदा के पानी का राजनीतिक स्टंट तो अपन नहीं जानते। पर कर्जमाफी का राजनीतिक स्टंट सबके सामने। आप अपन पर भरोसा मत करिए। गहलोत के नेता राहुल बाबा की ही सुन लीजिए। कर्नाटक जाकर शुक्रवार को उनने भी बोल दिया- 'सबके कर्जमाफी पर सहमत नहीं।' कांग्रेस की बात चली। तो ताजा चुनाव नतीजा बताएं। यों राज्यसभा के चुनाव का आम चुनाव पर असर नहीं होता। फिर भी जब कांग्रेस राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ में फील गुड की शिकार हो। तो एक झटका ही काफी। जो शुक्रवार को मध्यप्रदेश में लगा। कांग्रेस खरीद-फरोख्त में पिट गई। कांग्रेस समर्थक उम्मीदवार विवेक तनखा हार गए। बीजेपी की मायासिंह के साथ प्रभात झा और रघुनंदन शर्मा जीत गए। पर बात चुनाव पर महंगाई के असर की। महंगाई घटने का नाम नहीं ले रही। सो बढ़ते सेंसेक्स के बावजूद चिदंबरम की बोलती बंद। यों अभी चुनाव नतीजों पर सोचना फिजूल की बात। पर चुनाव नजदीक हो। तो आम आदमी की राय देखनी ही पड़ेगी। अपन ने अपने चौपहिया चालक फारुख से पूछा। तो वह बोला- 'बीजेपी तो नहीं आएगी। उदयपुर में भी नहीं आएगी। राजसमंद में भी नहीं।' अपन बताते जाएं। उदयपुर अबके रिजर्व हल्का होगा। सो न तो किरण महेश्वरी मैदान में होंगी। न गिरिजा व्यास। पिछली बार महिला कांग्रेस की अध्यक्ष गिरिजा को हराया। तो किरण महेश्वरी एमपी के साथ महिला भाजपा की अध्यक्ष भी बनी। अब दोनों ब्राह्मण महिलाएं दर-बदर। किरण महेश्वरी ने तो बगल की राजसमंद पर निगाह टिका ली। तो क्या गिरिजा व्यास भी वहीं जाएगी। या चित्तौड़-भीलवाड़ा की तरफ झांकेंगी। अपन ने उदयपुर में भी लोगों से पूछा- 'चुनाव का मुद्दा क्या होगा?' तो ज्यादातर का जवाब था- 'विधानसभा में उम्मीदवार को देखकर वोट करेंगे। लोकसभा में महंगाई मुद्दा बनेगा।' महंगाई को बीजेपी मुद्दा बना ले गई। तो कांग्रेस की उम्मीदों पर देशभर में पानी फिरना तय।

लगता है राजस्थान से रानी

लगता है राजस्थान से रानी साहिबा का राज जाना तय है. बाकि राम जाने.

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