दिया जब रंज कांग्रेस ने तो थर्ड फ्रंट याद आया

त्रिपुरा में जीतकर सीपीएम फिर शेर हो गई। त्रिपुरा ने हिम्मत जरूर बढ़ाई। न भी जीतते, तो भी एटमी करार पर कड़वाहट कम न होती। त्रिपुरा में राज करते पंद्रह साल हो गए। फिर भी लेफ्ट की ताकत पिछली एसेंबली से बढ़ी। सो नंदीग्राम-सिंगूर के बावजूद लेफ्ट को बंगाल में ताकत बने रहने का भरोसा। लेफ्ट के करार विरोधी तेवरों में कोई फर्क नहीं आना। अपन कुछ बातें पहले ही कह चुके। जैसे- लोकसभा जून में भंग होने के आसार। जैसे- मार्च में करात-मनमोहन आमने-सामने होंगे। करात ने पंद्रह मार्च तक मीटिंग का एल्टीमेटम दे ही दिया। सो अब मीटिंग संसद सत्र के दौरान होगी। तो कांग्रेस-लेफ्ट तू-तू, मैं-मैं तेज होगी ही। पर अपन त्रिपुरा की बात करते-करते मेघालय की बात भी कर लें। जैसा अपन ने सात मार्च को लिखा। हू-ब-हू वही हुआ। लंगड़ी एसेंबली आ गई। यह अलग बात। जो पी ए संगमा की दाल नहीं गलेगी। त्रिपुरा में लेफ्ट की ताकत बढ़ी। तो मेघालय में कांग्रेस की ताकत बढ़ी। पिछली एसेंबली में 22 सीटें थीं। जो अब बढ़कर 25 हो गई। संगमा एनसीपी की ताकत 14 से आगे नहीं खिसका सके। वहीं के वहीं अटक गए। चुनाव से पहले कांग्रेस का साथ छोड़ यूडीपी भी फायदे में रही। नौ से बढ़कर ग्यारह हो गए। सो कांग्रेस को अब संगमा की दरकार नहीं। सेंटर में सरकार अपनी। शिलांग में गवर्नर अपना। सो यूडीपी साथ आया तो ठीक। नहीं आया तो पांच इंडीपेंडेंट, दो एचएस पीडीपी, एक केएचएनएएम मिलकर 33 होंगे। संगमा को यूडीपी-बीजेपी पर भरोसा था। पर तीनों मिलकर 26 पर अटक गए। संगमा ने पांचों इंडीपेंडेंट पटा लिए। तो करिश्मा ही होगा। पर अपन बात कर रहे थे लोकसभा चुनावों की। वीरप्पा मोईली गुरुवार को दिल्ली में बोलकर गए। वही बात शुक्रवार को बेंगलुरु में बोले। कहा- 'सरकार खतरे में नहीं। लोग लेफ्ट से पूछेंगे- सरकार गिरानी थी। तो पहले ही करार पर इतना आगे क्यों बढ़ने दिया? क्या सरकार गिराकर लेफ्ट बीजेपी को सत्ता में आने का मौका नहीं देगा? क्या लेफ्ट नहीं चाहता- किसानों को बिजली मिले?' ऊपर से तुर्रा कि करार न हुआ, तो भारत की भद्द पिटेगी। अपन तो यह सवाल पहले ही उठा चुके। अगर करार अटकने पर भारत की भद्द पिटी। तो जिम्मेदार मनमोहन सिंह होंगे। जिनने जानते-समझते हुए कि बहुमत नहीं। अमेरिका से करार किया। पर अपन ने जो मतलब मोईली के बयान से निकाला। वही बात शीला दीक्षित ने शुक्रवार को केरल में जाकर कही। बोली- 'एटमी करार पर सरकार गिरी। तो भाजपा आ जाएगी।' यानी कांग्रेस ने भाजपा का हव्वा दिखाना शुरू कर दिया। अपन दिल्ली में एक थ्री व्हीलर के पीछे लिखा पढ़ा करते थे- 'भागो-भागो, नरसिम्हा आया।' करीब-करीब वही बोली कांग्रेस के नेता बोलने लगे। जब दो बड़े नेताओं ने एक जैसा बयान दिया। तो इसे कांग्रेसी रणनीति का हिस्सा समझिए। राहुल गांधी इसीलिए भारत की खोज पर निकले। इस परिवार का हर नया बच्चा सिर्फ तब भारत की खोज पर निकलता है। जब राजनीति और चुनाव सिर पर आन पड़े। पर कांग्रेस चुनावों के लिए पूरी तरह तैयार। किसानों को बिजली का राग इसीलिए अलापा। वक्त से पहले ही बीजेपी लाने का ठीकरा लेफ्ट के सिर फोड़ना शुरू कर दिया। पर लेफ्ट भी ठान चुका। गुरुवार को ज्योति बाबू ने कहा- 'यह सरकार मजबूरी की। कांग्रेस-लेफ्ट दोनों को बीजेपी का खतरा।' पर लगता है अब दिन पूरे हो गए। सो सीपीएम ने शुक्रवार को भी रणनीति आगे बढ़ाई। शनिवार से सेंट्रल कमेटी शुरू होगी। पर उसका सरकार गिराने-बचाने से कोई मतलब नहीं। सो पोलित ब्यूरो-सेंट्रल कमेटी की कोर कमेटी शुक्रवार को बैठी। थर्ड फ्रंट बनाने की जिम्मेदारी ओढ़ ली। चार साल मुलायम थर्ड फ्रंट का राग अलापते रहे। तो लेफ्ट मुंह बिचकाता रहा। अब जब कांग्रेस ने चुनावी तैयारियां शुरू कर दी। तो लेफ्ट को थर्ड फ्रंट याद आया।

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