अब लालू का शाइनिंग इंडियन रेल भुलावा

अपने नरेंद्र मोदी के सामने कांग्रेस का 'चक दे गुजरात' नहीं चला। पर लालू ने 'चक दे रेलवे' बजट पेश किया। चुनावी साल में लालू भी चिदंबरमी हो गए। गुरुदास दासगुप्त की यह टिप्पणीं लालू को नागवार गुजरी होगी। चिदंबरम के एलान देखन में भले लगे, घाव करे गंभीर। भले लगने की बात चली। तो लालू ने भी इस बार कुलियों से खूब वाह-वाही लूटी। कुली फिल्म में अमिताभ बच्चन ने कहा था- 'सारी दुनिया का बोझ हम उठाते हैं। लोग आते हैं, लोग जाते हैं। और हम यों ही खड़े रह जाते हैं।' सो लालू ने कुलियों को गैंगमैन की नौकरी का एलान किया। तो सालों से प्लेटफार्म पर दौड़-भाग करते कुली चहक उठे। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक। लखनऊ से लेकर पटना तक। जयपुर से लेकर बेंगलुरु तक। लालू जिंदाबाद के नारे गूंजे। पर शाम होते-होते कुलियों के चेहरे मुर्झाने लगे। कुलियों को चिदंबरमी बजट समझ आ गया। देशभर में लाखों कुली। पर नौकरी मिलेगी सिर्फ नौ हजार को। बात नौकरियों की चली। तो बताते जाएं- रेलवे में एक लाख पद खाली। पर लालू की चुप्पी बरकरार रही। देश में 18 हजार दो सौ मौत के सौदागर क्रासिंग। इन पर गेटमैन नहीं। नए गेटमैनों की भर्ती भी नहीं होगी। पर लालू सभी क्रासिंगों पर गेटमैन लगाएंगे। कुली बनेंगे गैंगमैन। गैंगमैन बनेंगे गेटमैन। हां, सत्तावन सौ पुलिसियों की भर्ती जरूर होगी। महिला आरक्षण के विरोधी लालू का नया रुख देख अपन चौंके। उनने कहा- 'पांच फीसदी पद महिलाओं को।' सत्तावन सौ का पांच फीसदी हुआ दो सौ पिचासी। दो सौ पिचासी महिलाओं को नौकरी। और फब्ती कसी महिला आरक्षण के पैरवीकार आडवाणी पर। बोले- 'वे सिर्फ बात करते हैं। मैं नौकरी देता हूं।' लालू का बजट भाषण निपटा। तो सुषमा बोली- 'हमें पांच-दस फीसदी नहीं। हमारा हक पचास फीसदी।' बात भर्ती की चल पड़ी। तो भर्ती का सांप्रदायिक एजेंडा भी जाहिर हुआ। लालू बोले- 'रेलवे भर्ती बोर्ड में एक मुस्लिम मेंबर जरूर होगा।' यों भी ऐसी कभी मनाही नहीं थी। मुस्लिम हो या इसाई। काबिलियत के आधार पर हर जगह पहुंचते रहे। रेलवे भर्ती बोर्ड में पहले भी अल्पसंख्यक रह चुके। पर लालू के लिए मुस्लिम ही अल्पसंख्यक। कांग्रेस के लिए मुस्लिम के साथ इसाई भी। पर लालू के बिहार में इसाई गिनती के। लालू की निगाह बजट पर कम, वोटों पर ज्यादा रही। राजनीतिक भेदभाव भी खूब हुआ। तभी तो गुजरात, उड़ीसा, यूपी की अनदेखी हुई। इस अनदेखी पर हुआ हल्ला सबने देखा। सांसदों को वाकआउट भी करना पड़ा। पर लालू की सेहत पर कोई असर नहीं। अब बात लालू की गरीब रथों की। जो उनने इस बार दस और चलाए। पर गरीब रथ गरीबों को अभी नसीब नहीं। गरीबों के नाम पर मध्यम वर्ग को ही फायदा। लालू के बजट में कुछ अच्छी बातें भी। जैसे लालू ने स्टेशनों के आधुनिकीकरण की सुध ली। पर बताते जाएं- रेल ट्रैक सुरक्षा पर कोई ध्यान नहीं। टिकट रिजर्वेशन आसान बनाने की सुध ली। पर यह वादा पिछले साल भी किया था। लालू समेत तीन रेल मंत्रियों की चालीस हजार करोड़ की परियोजनाएं पहले से पेंडिंग। पासवान ने गंगा पर पुल के प्रोजेक्ट का एलान किया। पीएम के हाथों शिलान्यास भी हुआ। पर तब से एक ईट नहीं लगी। बाकियों की बात छोड़ों। लालू ने पिछले साल वादा किया था- बैंकों से ट्रेनों के टिकट मिलेंगे। हर सीट गद्दे वाली होगी। कुल्लहड़ से कुम्हारों का फायदा हुआ। तो ट्रेनों में पर्दे खद्दर के लगेंगे। ताकि हथकरघा का फायदा हो। यूपी में कोच फैक्ट्री लगेगी।' अब हकीकत सुनो। न कोच फैक्ट्री लगी, न बैंकों से ट्रेनों के टिकट मिले। न हर सीट गद्देदार हुई, न खद्दर के पर्दे लगे। लालू की कुल्लहड़ योजना पहले ही पिट चुकी। पर लालू का चुनावी बजट खूब चमचमाता पेश हुआ। स्टील के शाइनिंग डिब्बों का एलान हुआ। तो अपन को लालू शाइनिंग इंडियन रेल दिखाते दिखे। लालू की शाइनिंग इंडियन रेल से कांग्रेसी भी भौंचक।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट