अभिभाषण में इतना हल्ला पहले नहीं देखा

तो हो गया अपनी प्रतिभा ताई के भाषण का श्रीगणेश। सब ठीक रहा। तो अगले साल दूसरा अभिभाषण भी यूपीए सरकार लिखेगी। अगले साल ताई को दो अभिभाषणों का मौका। सब ठीक-ठाक न रहा तो। सरकार इसी साल धड़ाम हुई, तो अलग बात। अपन पहली फरवरी को अपना अंदेशा बता चुके। जब अपन ने लिखा- 'चुनाव ही न करा दे रामसेतु-एटमी करार।' अपन ने तब लिखा था- 'मनमोहन फरवरी में लेफ्ट से पंगा नहीं लेंगे। पहले बजट निपटाएंगे। फरवरी तो चिदंबरम-चिदंबरम करते निकल जाएगी। पर मार्च में करात-मनमोहन आमने-सामने होंगे।' अपना अंदाज सही साबित होने लगा। इधर बजट सत्र का श्रीगणेश हुआ। उधर वियना में आईएईए से फाइनल बातचीत शुरू हुई। अबके बातचीत करने काकोड़कर नहीं आर बी ग्रोवर गए। महीने के आखिर तक चलेगी बातचीत। यानी मार्च में मनमोहन-करात आमने-सामने। पूत-कपूत के पांव तो पालने में ही पहचाने जाते हैं। अभिभाषण से ही लेफ्ट की भौंहें तनने लगी। अभिभाषण में एटमी करार के जिक्र पर येचुरी का चेहरा तमतमाया ही। तरक्की के ख्याली पुलाव पर तो भौंहे तनी। येचुरी बोले- 'मनमोहन सरकार को भी इंडिया साइनिंग दिखने लगा। सरकार हकीकत से कोशों दूर। गरीबी के पायदान पर भारत दो कदम और नीचे खिसक गया। पर सरकार जीडीपी के गुण गाने में मस्त।' पर बात एटमी करार की। मनमोहन अपने वादे से मुकरते दिखने लगे। उनने कहा था- 'जब तक लेफ्ट से सहमति नहीं बनेगी। एटमी करार पर आगे नहीं बढ़ेंगे।' पर अभिभाषण में एटमी करार का जिक्र। मनमोहन की नियत साफ हो गई। वह करार पर टकराव के मूड में। येचुरी ने अपना स्टेंड फिर दोहरा दिया। अभिषेक मनु सिंघवी का बयान अपन को फिर नहीं जचा। बोले- 'इस मुद्दे पर लेफ्ट-यूपीए असहमति पर फिर से सहमत।' सिंघवी शायद मनमोहन का वादा भूल गए। पर बात प्रतिभा ताई के अभिभाषण की। जिसमें सरकार के पुराने प्रोग्रामों के गुणगान के सिवा कुछ दिखा। तो मुस्लिम वोटों को लुभाने की कसरत। अभिभाषण का ज्यादातर हिस्सा मुस्लिम-एससी-एसटी को लुभाने के लिए। तीनों वर्ग कांग्रेस की कमर तोड़ चुके। मुस्लिम तीसरे खेमे में जा चुके। एससी-एसटी ज्यादातर बीजेपी के साथ। सो कांग्रेस का एजेंडा तीनों को लुभाने का। चिदंबरम का बजट तो चुनावी होगा ही। अभिभाषण भी चुनावी रंग में रंगा दिखा। पहली भनक तो राहुल को पहली बेंच पर बिठाने से मिली। यों परंपरा के मुताबिक पहली बेंच प्रमुख मंत्रियों, विपक्ष के नेताओं और राजनीतिक दलों के लीडरों की। पर जब लोकसभा में ही परंपरा टूट चुकी। अपने सोमनाथ दादा ने उसकी परवाह नहीं की। तो सेंट्रल हाल में क्या कानून-कायदा। राहुल को पहली बेंच में सोनिया की बगल में बिठाना कांग्रेसी रणनीति का हिस्सा। बात सेंट्रल हाल की चली। तो अटल बिहारी वाजपेयी की गैर मौजदूगी खली। पिछले अभिभाषण में मौजूद थे वाजपेयी। यों पिछले सत्र में इक्का-दुक्का बार ही दिखे। पर इस सत्र में दिखें, तो खुशी ही होगी। वाजपेयी अब बीजेपी पार्लियामेंट्री बोर्ड की मीटिंगों से भी कन्नी काटने लगे। वर्किंग कमेटी की पिछली दो मीटिंगों में भी नहीं आए। पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के अभिभाषण का श्रीगणेश हुआ। तो देवी सिंह शेखावत भी वीआईपी गैलरी में दिखे। बात अपने पहले से बताए अंदेशे की। वही हुआ, श्रीगणेश बिना बाधा संभव नहीं हुआ। अपने दासमुंशी बिहारी सांसदों को पटाने में तो कामयाब रहे। राज ठाकरे वाला मुद्दा किसी ने नहीं उठाया। पर टीआरएस के चार सांसदों ने हल्ला कर ही दिया। अपनी भविष्यवाणी सही निकली। चंद्रशेखर राव, रवि नाइक, वी. विनोद कुमार, मधुसूदन रेड्डी ने हल्ला तो किया ही। तेलंगाना का बैनर तो दिखाया ही। वाकआउट भी किया। यही अपन ने लिखा था। जब टीआरएस का हल्ला होता। तो गनीमत होती। शिवसेना के अनंत गीते महाराष्ट्र के किसानों पर उबले। प्रभुनाथ सिंह राष्ट्रभाषा के अपमान पर उबले। अठवाले बार-बार उठने की अपनी आदत सेंट्रल हाल में भी ले आए।

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