जनता बेहाल महंगाई से नेता तू-तू, मैं-मैं में मशगूल

अपनी मनमोहन सरकार का यह आखिरी बजट तो नहीं। पर क्या पता लगता है। चुनावी साल में मनमोहन ज्यादा फिक्रमंद। लोकसभा जितने ही महत्वपूर्ण हैं इस साल के विधानसभा चुनाव। गुजरात नतीजों की हार से सोनिया अब तक नहीं उबरी। अब मनमोहन गलतियां सुधारने के मूड में। बजट में रियायतों का पिटारा खुलेगा। चिदंबरम की ऐंठ भी अब खत्म। वरना आम आदमी की हर योजना में अड़ंगा लगाते थे। अबके कांग्रेस दफ्तर आए। तो मजबूरियां नहीं गिनाई। अपने मनमोहन सिंह शुक्रवार को महाराष्ट्र में थे। वही महाराष्ट्र जहां किसानों की आत्म हत्याएं नहीं रुक रही। पिछले साल विदर्भ में 35 हजार करोड़ का ऐलान किया। पर आत्म हत्याएं फिर भी नहीं रुकी। असल में सरकारी ऐलान लोक दिखावा। आम आदमी तक नहीं पहुंचती राहत। जब तक साहूकार का कर्ज न निपटे। किसान की हालत नहीं सुधरनी। इस समस्या का चिदंबरम के पास तो कोई हल नहीं। फिर भी अहमद नगर में मनमोहन बोले- 'मुझे किसानों के कर्जदार होने का पता है। वित्त मंत्री चिदंबरम जल्द ही कोई फैसला करेंगे।' अपन को याद आई कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों की मीटिंग। नैनीताल में हुई मीटिंग के वक्त अपन विलासराव देशमुख से मिले। तो उनने कहा था- 'कर्जदार किसानों की तादाद ज्यादा नहीं।' दो साल बीत गए। हुआ-गया कुछ नहीं। कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने गुरुवार को ही कहा- 'यूपीए सरकार की नीतियों के कारण कृषि उत्पादन घटा। सरकार कृषि क्षेत्र का विकास करने में पूरी तरह फेल रही।' अपन को पिछले लोकसभा चुनाव भी याद। किसानों की आत्महत्या जब सोनिया का खास मुद्दा बना। पर साढ़े तीन साल मनमोहन हवाई किलों पर सवार रहे। शुक्रवार की बात ही लो। ताजा खबर है- 'देश की आर्थिक हालत वैसी भी नहीं। जैसा ढिंढोरा मनमोहन-चिदंबरम ने पीटा। सालाना विकास दर साढ़े आठ फीसदी हो जाए। तो काफी।' आपको भी याद होगा। पिछले पखवाड़े चिदंबरम ने ढोल पीटा था- 'विकास दर साढ़े नौ फीसदी रहेगी।' तब अपने नरेंद्र मोदी ने चिदंबरम को चुनौती दी- 'पता नहीं उनने अर्ध्दवार्षिक विकास दर कैसे निकाली। अर्ध्दवार्षिक विकास दर निकलती ही नहीं। पता नहीं अर्थशास्त्री चिदंबरम से पूछते क्यों नहीं।' उनने चिदंबरम को एक और चुनौती दी- 'एनडीए सरकार की विकास दर निकालकर देखो। वाजपेयी सरकार से कम निकलेगी यूपीए की विकास दर।' विकास दर के साथ-साथ अपन बताते जाएं। मंदी का दौर शुरू हो गया। बीएसई का सेंसेक्स शुक्रवार को लगातार तीसरे दिन गिरा। अपन कोई चंडूखाने की रिपोर्ट नहीं बता रहे। शुक्रवार की महंगाई दर भी आसमान छू गई। आम आदमी तो नमक-दाल खाकर जी लेगा। पर नमक-दाल भी जेब लायक हो तब ना। पिछले छह महीने में महंगाई बढ़ी। ताजा मुद्रास्फीति की दर 4.11 फीसदी। पर राजनीतिक दलों में शब्दों के बाण जारी। वह भी महंगाई और किसान के मुद्दों पर नहीं। अलबत्ता आतंकवाद के मुद्दे पर। जो कांग्रेस की दु:खती रग। आतंकवाद पर कांग्रेस का रिकार्ड अच्छा नहीं। कांग्रेस को पोटा हमेशा मुस्लिम विरोधी लगा। कोई कानून किसी संप्रदाय के खिलाफ नहीं होता। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता। पर यूपीए ने आतंकवाद को धर्म से जोड़ दिया। मौजूदा आतंकवाद की यही बड़ी वजह। पोटा हो या अफजल। पर तर्क के जवाब में कुतर्क की लड़ाई। आडवाणी ने अफजल-पोटा का मुद्दा उठाया। तो मनमोहन-पाटिल-जायसवाल ने जवाब नहीं दिया। अलबत्ता बीजेपी की दु:खती रग पर हाथ रख दिया। सिंघवी से लेकर जायसवाल तक बोले- 'आडवाणी कंधार याद करें।' तो रविशंकर प्रसाद बोले- 'कांग्रेस ने तब तो मांग की थी- बंधकों को मुक्त कराने के उपाय किए जाएं। तब पूरे देश में बंधकों को मुक्त कराने की मांग थी।' रविशंकर कुछ भी कहें। केबिनेट में एक राय नहीं थी। अपने सामने आडवाणी भी कबूल कर चुके।

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