राज की लगाई आग में मीडिया ने डाला घी

राज ठाकरे की लगाई आग में गुरुवार को मीडिया ने घी डाला। यों घी डालने का ठीकरा फोड़ा गया लेफ्टिनेंट गवर्नर तेजेंद्र खन्ना के सिर। संवैधानिक हस्तियों के साथ भी खिलवाड़ कर सकता है विजुअल मीडिया। अपनी टीआरपी के लिए कुछ भी करेगा। यह इसका ताजा उदाहरण। दिल्ली की ट्रेफिक प्राब्लम कौन नहीं जानता। आए दिन ब्ल्यू लाइन का कहर हजार भर जानें ले चुका। रेड लाइट क्रासिंग रोकने की सारी कोशिशें नाकाम। दूर मत जाओ। आप दिल्ली का चंडीगढ़ से ही मुकाबला कर लो। मुंबई से करोगे। तो दिल्ली वाले शर्मसार होंगे ही। चंडीगढ़ हो या दिल्ली। बेंगलुरु हो या चेन्नई। रेड लाइट तो दूर की बात। कोई येलो लाइट भी क्रास नहीं करता। जैसे ही येलो लाइट हुई। ब्रेक लग जाती है। पर दिल्ली में जैसे ही येलो लाइट होती है। चालक ब्रेक पर पांव नहीं दबाता। रेस पर पांव दबा देता है। अपने लेफ्टिनेंट गवर्नर ने ट्रेफिक पुलिसियों के जमावड़े में यही तो कहा- 'यहां लोग कानून तोड़ने में गर्व महसूस करते हैं। कानूनी कार्रवाई नहीं होती। तो शेखी बघारते हैं। यहां के मुकाबले दक्षिण में हालात बेहतर। वहां लोग कानून का पालन करते हैं। लोगों को कानून का डर होना चाहिए।' अब बताओ इसमें उत्तर भारतीयों के खिलाफ क्या गलत कहा। सच कहना अगर गलत है। तो अपने तेजेंद्र खन्ना ने जरूर गुनाह किया। पर विजुअल मीडिया ने लेफ्टिनेंट गवर्नर के भाषण को ऐसा तोड़ा-मरोड़ा। पूछो मत। तेजेंद्र खन्ना तब भी बेवजह विवाद में घेरे गए। जब उनने दिल्ली में पहचान पत्र लाजमी करने की बात कही। यह बात सही- पहचान पत्र जरूरी हो। पर पहले सबको पहचान पत्र तो दिए जाएं। आडवाणी ने कितना पहले कहा था- 'देश के सभी नागरिकों को नागरिकता पहचान पत्र मिले।' पर बात तेजेंद्र खन्ना के ताजा भाषण की। उनने तो उत्तर भारतीयों का नाम ही नहीं लिया। पर विजुअल मीडिया में तो एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़। हर चैनल में दिनभर चलता रहा- 'राज की लगाई आग में तेजेंद्र खन्ना ने घी डाला।' पर असली घी तो खुद मीडिया डाल रहा था। अपने राजनीतिक नेताओं में भी भेड़चाल। किसी ने तेजेंद्र खन्ना के भाषण को नहीं सुना। भाषण की टेप नहीं सुनी। पर विजुअल खबरचियों के कहे को ही ब्रह्म वाक्य मान लिया। अपने प्रियरंजन दासमुंशी यों तो सूचना प्रसारण मंत्री। पर न सही सूचना। न सही प्रसारण की फिक्र। उनने भी बिना सच जाने टिप्पणीं दे डाली। बोले- 'इस तरह के बयान पर कार्रवाई होगी।' क्या कोई मंत्री लेफ्टिनेंट गवर्नर के खिलाफ बयान दे सकता है? संवैधानिक मर्यादा तोड़ने पर मंत्री को पद पर रहना चाहिए? पर यह फिक्र भाजपाईयों ने भी नहीं की। वे भी लगे लेफ्टिनेंट गवर्नर के खिलाफ बोलने। सबसे पहले रवि शंकर प्रसाद बोले। फिर राजीव प्रताप रूढ़ी बोले। दोनों बिहारी। राज ठाकरे ने बिहारियों पर आपत्तिजनक टिप्पणीं की। पर इसका मतलब यह तो नहीं, जो कोई सच भी नहीं बोल सकता। अपन को तारीफ करनी पड़ेगी सलमान भाई की। सलमान खुर्शीद खबरची के धोखे में नहीं आए। उनने कहा- 'जब तक मैं लेफ्टिनेंट गवर्नर को सुन ना लूं। उनने क्या कहा। तब तक मैं नहीं मानता। तेजेंद्र खन्ना गंभीर और सुलझे हुए आदमी। वह क्षेत्रवाद की कोई टिप्पणीं कर ही नहीं सकते। किसी भाषण की एक-दो लाइनें निकालकर बात का बतंगड़ बनाना ठीक नहीं।' बात का बतंगड़ बना रहे मीडिया को क्यों जचता। सो सलमान फोकस से बाहर हो गए। विजुअल मीडिया को झटका तब लगा। जब आम आदमी तेजेंद्र खन्ना की हिमायत में उतर आया। तेजेंद्र खन्ना ने कहा- 'मैंने किसी क्षेत्र के बारे में टिप्पणीं नहीं की। मेरी टिप्पणीं दिल्ली के ट्रेफिक नियमों के उल्लंघन पर थी।' पर यह बात तो उस मीडिया को पहले भी पता थी। जिसने राज ठाकरे के साथ बेमेल जोड़ा।

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