अंदरूनी लोकतंत्र से ही उपजेगा जनाधार

अगर इस साल लोकसभा चुनाव नहीं भी हुए, तो भी आम चुनावों में अब सिर्फ सवा साल बाकी रह गया है। राजग ने छह साल केंद्र में सरकार चलाई, लेकिन आखिरी दिनों में भारतीय जनता पार्टी की इतनी बुरी हालत नहीं हुई थी, जितनी इस समय कांग्रेस की दिखाई देने लगी है। दिसंबर 2003 में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनाव जीतने से भारतीय जनता पार्टी इतनी उत्साहित थी कि लोकसभा चुनाव वक्त से पहले करवा दिए। लोकसभा चुनावों में भाजपा से आठ सीटें ज्यादा जीतने से कांग्रेस इतनी उत्साहित थी कि उसे जनादेश मान बैठी। लेकिन पिछले पौने चार सालों में कांग्रेस की लगातार हार से अब यह एकदम साफ हो गया है कि जनादेश कांग्रेस के साथ तब भी नहीं था, आज भी नहीं है। यह ठीक है कि राजग सरकार के समय कांग्रेस की विधानसभाएं नौ से बढ़कर चौदह हो गई थी, जिसे कांग्रेस ने अपनी नेता सोनिया गांधी का करिश्मा समझ लिया। लेकिन पिछले 44 महीनों में कांग्रेस की राज्य सरकारों की तादाद फिर से घटकर दस हो गई है। इस बीच उड़ीसा, गुजरात, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश के चुनावों में सोनिया गांधी का इम्तिहान हुआ और वह फेल रही। कांग्रेस जब केंद्र में सत्तारूढ़ हुई तो कर्नाटक, हिमाचल, पंजाब, उत्तराखंड में कांग्रेस सरकारें थीं, जो अब कांग्रेस के नियंत्रण में नहीं हैं। सिर्फ आंध्र प्रदेश, पांडिचेरी और हरियाणा में ही कांग्रेस ने क्षेत्रीय दलों पर जीत हासिल करके अपनी सरकारें बनाई हैं। कांग्रेस विधानसभाई चुनावों में सिर्फ असम और दिल्ली में अपनी सरकारें बरकरार रख पाई। गोवा और महाराष्ट्र में गठबंधन सरकारें दुबारा बनी, लेकिन दोनों ही विधानसभाओं में कांग्रेस की सीटें घटी।

कुल मिलाकर कांग्रेस को केंद्र में सत्तारूढ़ होकर जिस फायदे की उम्मीद थी, वह कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। फायदा तो दूर की बात, अलबत्ता कांग्रेस का आधार लगातार घट रहा है। यह इस के बावजूद हुआ है कि सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी भी राजनीति में सक्रिय हो चुके हैं। पहले राहुल गांधी को लोकसभा चुनाव लड़वाने से कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में जनाधार बढ़ने की उम्मीद थी, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अस्सी में से सिर्फ नौ सीटें हासिल हुई। राहुल गांधी के लोकसभा चुनाव लड़ने का उत्तर प्रदेश में कुछ असर नहीं हुआ तो उन्हें पार्टी में महासचिव बनाकर भावी प्रधानमंत्री के रूप में दिखाने की कोशिश की गई, ताकि कांग्रेस का खत्म हो चुका जनाधार लौट सके। राहुल गांधी के कांग्रेस महासचिव बनने के बाद उत्तर प्रदेश, गुजरात और हिमाचल विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं और तीनों ही राज्यों में कांग्रेस को बुरी तरह हार मिली। राहुल गांधी को भावी प्रधानमंत्री के तौर पर स्थापित करने के लिए गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले नवंबर में कांग्रेस का दिल्ली में अधिवेशन किया गया। यह अधिवेशन इस दृष्टि से एकदम अलग इसलिए था क्योंकि किसी के महासचिव बनने पर इस तरह अधिवेशन नहीं होते। यह अधिवेशन राजकुमार की ताजपोशी के लिए हुआ था, ताकि कांग्रेसजनों और नेहरू-गांधी परिवार में आस्था रखने वालों को कांग्रेस के नए नेतृत्व का संकेत दिया जा सके। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में राहुल गांधी को राजकुमार की तरह घुमाया गया और उनके रोड-शो करवाए गए। लेकिन कांग्रेस का जनाधार बढ़ने का सपना चकनाचूर हो गया, तो कांग्रेस अब पूरी तरह हतोत्साहित हो चुकी है। सोनिया गांधी की हाल ही की बीमारी को भी हताशा का नतीजा समझा गया।

सोनिया गांधी के अध्यक्ष पद संभालने पर कांग्रेसी दिग्गजों को उम्मीद थी कि पार्टी एकजुट होगी और कांग्रेस का पुराना वैभव लौट आएगा। जब ऐसा नहीं हुआ, तो परिवार के दूसरे राजकुमार राहुल को राजनीति में उतारा गया। लेकिन कांग्रेसजन यह भूल गए कि नेहरू-इंदिरा के जमाने के मतदाताओं की तादाद अब दस फीसदी भी नहीं रही। देश पूरी तरह बदल गया है और नई पीढ़ी को लोकतंत्र में राज परिवार जैसी अवधारणा रास नहीं आ रही है। कांग्रेस को इस बात का मंथन करना होगा कि परिवारवाद के रथ पर दुबारा सवार होने और केंद्र में सत्ता आने के बाद भी उसका जनाधार क्यों नहीं बढ़ रहा है। कांग्रेस को समझना पड़ेगा कि लोकतंत्र में कोई भी राजनीतिक दल सिर्फ एक परिवार के वारिसों के बूते नहीं चल सकता। अलबत्ता कांग्रेस के भीतर वही पुराना अंदरूनी लोकतंत्र कायम करना होगा, जो आजादी से पहले था। सोनिया गांधी को भी यह बताने की जरूरत है कि आजादी से पहले की कांग्रेस में ब्लॉक स्तर से लेकर राष्ट्रीय अध्यक्ष स्तर तक सांगठनिक चुनाव हुआ करते थे, नियुक्तियां नहीं। यही वजह थी कि कांग्रेस एक पार्टी नहीं बल्कि आंदोलन बन गई थी। अंदरूनी लोकतंत्र को खत्म करके कोई भी पार्टी जनाधार कायम नहीं रख सकती। कांग्रेस अगर अपने संविधान के मुताबिक पार्टी की सदस्यता और संगठनात्मक चुनाव ही करवाने लग जाए तो कोई अन्य पार्टी उसका मुकाबला नहीं कर सकेगी। कांग्रेस को सबसे पहले अपने पदाधिकारियों के चुनाव का अधिकार सोनिया गांधी को देने का सर्वसम्मत प्रस्ताव करने की प्रवृत्ति छोड़नी होगी। सोनिया गांधी जब कांग्रेस की अध्यक्ष बनी थी तो शुरू-शुरू में उन्होंने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन उनके इर्द-गिर्द मंडराने वाले चापलूसों ने उसे लागू नहीं करने दिया। सोनिया गांधी दस जनपथ के इर्द-गिर्द मंडराने वाले सत्ता के दलालों से घिरी हैं और हर फैसला उन्हीं की इच्छा के मुताबिक हो रहा है, जिस कारण पार्टी का जनाधार नहीं बन पा रहा है। भविष्य की चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए वीरप्पा मोईली की रहनुमाई में बनाई गई कमेटी की बैठक में राहुल गांधी ने संगठन में ऊपर से नियुक्तियों की प्रवृत्ति खत्म करने की बात कही है। लेकिन अहम सवाल यही है कि क्या सोनिया गांधी और राहुल कांग्रेस को जनाधारित पार्टी बनाने में कामयाब हो पाएंगे?

गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव हारने के बाद कांग्रेस निराशा के दौर से गुजर रही है। मार्च महीने में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के चुनाव हो रहे हैं, लेकिन यह चुनाव देश की दिशा तय करने में कोई भूमिका नहीं निभा सकते। कांग्रेस की निगाह इसके बाद होने वाले कर्नाटक और इस साल के आखिर में होने वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के चुनावों पर लगी है। कांग्रेस के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे हैं कि कर्नाटक भले ही कांग्रेस की झोली में न पड़े, भारतीय जनता पार्टी के कब्जे वाले मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में उसका पलड़ा भारी होगा और लोकसभा चुनावों से ठीक पहले इन तीनों राज्यों के नतीजे कांग्रेस का मनोबल बढ़ा देंगे। लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी अगले लोकसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है और उसे भी पता है कि इन तीन राज्यों की विधानसभाएं पंद्रहवीं लोकसभा के लिए कितने अहम हैं। हालांकि कांग्रेस गुजरात और हिमाचल के विधानसभा चुनाव नतीजों को यह कहकर झेंप मिटाने की कोशिश कर रही है कि विधानसभा चुनाव नतीजों का लोकसभा चुनावों पर कोई असर नहीं पड़ता। कांग्रेस के नेता अपने तर्क के पक्ष में 2003 की इन तीनों विधानसभा चुनावों के नतीजों को उदाहरण के तौर पर पेश करते हैं, इन तीनों ही विधानसभाओं में जीत से उत्साहित होकर भारतीय जनता पार्टी ने चौदहवीं लोकसभा के चुनाव वक्त से पहले करवा दिए थे, लेकिन उसे हार का मुंह देखना पड़ा। लेकिन यही तर्क अगले लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के उलट भी जाता है, अगर इस साल के आखिर में होने वाले इन तीनों राज्यों में कांग्रेस जीत भी जाए, तो इसका मतलब यह नहीं होगा कि हवा उसके पक्ष में बहनी शुरू हो जाएगी और पंद्रहवीं लोकसभा का नतीजा उसके पक्ष में जाएगा।

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