अमीर हो गए हैं लोग, मंहगाई का असर नहीं

अपन को भी पार्लियामेंट कवर करते दो दशक होने को। ऐसा ढुलमुल अभिभाषण किसी सरकार का नहीं सुना। अभिभाषण पढ़ते भले ही राष्ट्रपति हों। तैयार करती है सरकार। मंजूरी देती है केबिनेट। सो मनमोहन सरकार का अभिभाषण बेअसर सा रहा। ढुलमुल सा रहा। जैसे बचाव की मुद्रा में खड़ी हो सरकार। समस्याओं के बचाव में अजीबोगरीब दलीलें पेश हुई। कुछ समस्याओं से तो कबूतर की तरह आंख ही मूंद लीं। जैसे तेलंगाना का जिक्र तक नहीं। नौ दिसंबर का ऐलान कांग्रेस के जी का जंजाल बन चुका। न बनते बन पड़ रहा है, न उगलते। टाइमपास करने को कमेटी बनी। तो उसकी शर्तें बदनीयती की पोल खोल गई। अब तेलंगाना राष्ट्र समिति की मुखालफत तो अपनी जगह। तेलंगाना के कांग्रेसियों को भी अपने आलाकमान की नीयत पर शक। अपने प्रधानमंत्री की नीयत पर शक। बजट सत्र के पहले दिन ही कांग्रेस को मुखालफत का स्वाद चखना पड़ा। तेलंगाना के सत्रह कांग्रेसी सांसद संसद भवन में इकट्ठे हुए। तेलंगाना के पक्ष में जमकर नारेबाजी की। यों नारे तो जय तेलंगाना के साथ जय कांग्रेस के भी लगाए। पर वहीं पर मौजूद कांग्रेसी सांसद राजगोपाल रेड्डी ने कह दिया- 'तेलंगाना बनने तक आंदोलन जारी रहेगा। जरूरत पड़ी तो कांग्रेस छोड़ देंगे।' मधु याक्षी ने कहा- 'सरकार नौ दिसंबर का वादा निभाए।' यह तो रही संसद के अंदर की बात। बाहर भी कमाल हो गया। तेलंगाना के कोई दो हजार वकील 'जंतर-मंतर' में धरने पर आ बैठे। जब से 'इंडिया गेट से' धरने हटाए गए। तब से धरने देने वाले जंतर-मंतर पर ही। पर पुलिस आंदोलनकारियों को संसद मार्ग थाने से आगे नहीं बढ़ने देती। वहीं पर अपनी भड़ास निकालकर चले जाते हैं आंदोलनकारी। कभी-कभी ज्यादा जोश हो तो। पानी के फव्वारों की नौबत आती है। और भी ज्यादा जोश हो। तो हल्का लाठीचार्ज। आंदोलनकारी ज्यादा ही गुस्से में हों। तो रबड़ की गोलियों वाली फायरिंग। पर सोमवार को पुलिस गच्चा खा गई। वह काले कोट वालों को ही वकील समझती रही। पर वकील काला कोट उतारकर चुपके से आगे बढ़ गए। पार्लियामेंट एनेक्सी तक पहुंच गए। वहां जाकर फिर काले कोट पहनकर नारे लगाने लगे। तो पुलिस के होश ठिकाने आ गए। संसद के गेट से बस सौ मीटर दूर थे। तब जाकर बेरीकेड लगाकर रोका। पर शाम को जब ताजिए का जुलूस निकला। तो संसद की दीवार के साथ से होकर गुजरा। पर बात हो रही थी राष्ट्रपति के अभिभाषण की। जिसमें खेती पर खास तव्वजो पर जोर दिया। जीडीपी का लक्ष्य नौ फीसदी बताया। विदेशी यूनिवर्सिटियों की बात हुई। तो विदेशी धन लाने का बीडा भी उठाया सरकार ने। सरकार ने सड़क, शिक्षा, बिजली पर अपनी पीठ थपथपाई। तो आतंकवाद रोकने पर पाक से बात का जिक्र भी किया। जब प्रतिभा पाटिल अभिभाषण दे रही थीं। तो तीन बार हलचल भी हुई। पहली बार अल्पसंख्यकों की शिक्षा के मुद्दे पर। दूसरी बार पंचायतों में पचास फीसदी महिला आरक्षण पर। तीसरी बार जब कालेधन का जिक्र किया। वादा तो सांप्रदायिकता विरोधी बिल और महिला आरक्षण का भी हुआ। पर बात समस्याओं की। मंहगाई, नक्सलवाद, आतंकवाद, रोजगार पर कोई ठोस फार्मूला नही दिखा। मंहगाई पर तो सरकार की दलील गजब की रही। अभिभाषण में कहा गया- 'लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ चुकी।' लब्बोलुबाब यह कि लोग अमीर हो गए। इसलिए मंहगाई बढ़ी। विपक्ष ने आलोचना की। तो मनीष तिवारी ने भी सरकार का पक्ष लिया। बोले- 'यह बात तो सही है। लोगों की आमदनी बढ़ गई। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में खुशहाली आई। विपक्ष के पास आलोचना का कोई ठोस मुद्दा नहीं।' आपकी आमदनी भी मंहगाई पर भारी पड़ती हो। तो आप भी मंहगाई पर जश्न मनाइए। पर विपक्ष ऐसा नहीं मानता। मंहगाई बजट सत्र में विपक्ष का सरकार पर मारक हथियार। डरे तो पीएम भी हुए हैं। तभी तो अभिभाषण के बाद विपक्ष से अपील की- सहयोग करो।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट