मुंबई के बाद हो गया पुणे, बात से फिर भी नहीं परहेज

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बारह फरवरी को अपन ने लिखा था- 'अमेरिकी दबाव में बात, पर आतंकियों का घर है पाक।' इसी में अपन ने खुलासा किया था- 'कुरैशी ने होलबु्रक को भारत में मुंबई नहीं दोहराने की गारंटी नहीं दी।' और तेरह फरवरी को पुणे में मुंबई दोहराया गया। कौन हैं कुरैशी। कौन हैं होलबु्रक। पाक के विदेशमंत्री हैं शाह महमूद कुरैशी। अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा के दक्षिण एशिया दूत हैं होलबु्रक। भले ही एसएम कृष्णा इंकार करें। या चिदंबरम और एंटनी। पर अपन को शक। बातचीत का न्योता होलबु्रक के हाथ ही गया था। अठारह-उन्नीस जनवरी को होलबु्रक दिल्ली में थे। बीस-इक्कीस को इस्लामाबाद में। चार फरवरी को न्योता भेजे जाने का खुलासा हुआ। तो कहा गया था- 'न्योता पंद्रह दिन पहले भेजा गया था।' अब हाथ कंगन को आरसी क्या, पढ़े-लिखे को फारसी क्या। कुरैशी ने वादा नहीं किया। अपन ने फिर भी न्योता वापस नहीं लिया। पुणे हो गया। अपन तो अब भी न्योता वापसी को राजी नहीं। सोमवार को सीसीएस बैठी। पर न्योता वापसी का फैसला नहीं हुआ। यानी पच्चीस फरवरी को सचिव स्तर की बातचीत होगी। अमेरिकी दबाव झलक-झलक कर दिख रहा। छह जनवरी 2004 को पाकिस्तान ने लिखित वादा किया था- 'पाकिस्तान की सरजमीं को भारत के खिलाफ आतंकवाद फैलाने के लिए इस्तेमाल नहीं होने देंगे।' इसके बावजूद कुरैशी वादा करने को तैयार नहीं। अपनी मनमोहन सरकार उस वादे की याद नहीं दिला रही। वादा पूरा नहीं, तो बातचीत कैसी। वह लिखित वादा ही बातचीत की शर्त थी। मुंबई में आतंकी हमले का पर्दाफास हो चुका। पाकिस्तान में रची गयी थी साजिश। वहीं से आए थे आतंकवादी। जनवरी 2004 के वादे की वादाखिलाफी। अब पुणे का सबूत लीजिए। अपन ने पांच फरवरी को खुलासा किया था- 'पाक में जेहाद के नारे, भारत में पाक से गुफ्तगू की तैयारी।' इसमें अपन ने खुलासा किया था- 'गुफ्तगू की खबर उसी दिन आई। जिस दिन मुजफ्फराबाद में जमात-उद-दावा के जलसे की खबर आई। पाक ने कार्रवाई नहीं की हाफिज सईद पर। अब वह जलसों में खुलेआम लगवा रहा है भारत के खिलाफ जेहाद के नारे।' तो उस दिन मुजफ्फराबाद में कश्मीर कांफ्रेंस का पहला जलसा था। दूसरा जलसा इस्लामाबाद में हुआ। फिर लाहौर, मुलतान और कराची में। पांच फरवरी को इस्लामाबाद में जब जमात-उद-दावा का जलसा हुआ। तो हाफिज सईद मंच पर थे। हाफिज सईद के डिप्टी कमांडर हैं अब्दुर रहमान मक्की। उनने अपने भाषण में कहा- 'एक समय जेहादियों के सामने कश्मीर ही लक्ष्य था। अब पानी के मुद्दे ने हमें दिल्ली, पुणे, कानपुर पर निशाना साधने का भी मौका दिया।' और आठवें दिन पुणे में निशाना साध दिया गया। इससे बड़ा सबूत क्या चाहिए। और क्या होता है पाकिस्तान की सरजमीं का भारत के खिलाफ इस्तेमाल। पुणे के धमाके में विदेशियों समेत नौ मरे। इतवार को पूरी दुनिया जब आतंकी वारदात की निंदा कर रही थी। पाक कश्मीर में युध्दविराम का उल्लंघन कर रहा था। अभी तो डेढ़ महीना हुआ है 2010 का। अब तक सत्रह बार घुसपैठ हुई। नौ बार युध्दविराम का उल्लंघन। मनमोहन सरकार मानती है तो माने। अपन नहीं मान सकते- बिना स्लीपिंग सेल की मदद से धमाका हुआ होगा। ना-ना करके आखिर पी चिदंबरम ने मुंबई हमले में भी स्लीपिंग सेल माना। इंडियन मुजाहिद्दीन ही है भारत में लश्कर-ए-तोएबा का स्लीपिंग सेल। इंडियन मुजाहिद्दीन के सब कर्ता-धर्ता आजमगढ़ के। जिस पर आजकल बिछी-बिछी जा रही है कांग्रेस। सोमवार को भी भोपाल में दिग्गी राजा ने कहा- 'मैंने आजमगढ़ जाकर कोई गुनाह नहीं किया।' रियाज भटकल-इकबाल भटकल हैं इंडियन मुजाहिद्दीन के फाउंडर। दोनों आजमगढ़ के। हेडली ने पूछताछ में भटकल भाईयों का खुलासा किया। दिग्गी राजा भटकल परिवार को ही दिलासा देने गए थे आजमगढ़। कहते हैं- जयपुर, अहमदाबाद, दिल्ली, मुंबई की आतंकी वारदातों का मुकदमा एक जगह सुना जाए। फास्ट ट्रेक अदालत के हवाले हो। ताकि इंडियन मुजाहिद्दीन को राहत मिले। पिछले साल जब इंडियन मुजाहिद्दीन का खुलासा हुआ। तो पकड़े गए इक्कीस में से ग्यारह आतंकी पुणे के थे। आतंकी ई मेल भेजने वाले मंसूर पीरभौय ने खुलासा किया था- 'पुणे के कुरान फाउंडेशन में उसे तैयार किया गया।' खुलासा यह भी था- 'पुणे को बनाया गया है मुजाहिद्दीन का हेड क्वार्टर।' फिर भी सावधान नहीं हुई पुणे पुलिस। पकड़ा गया एक शख्स था अकबर। उसने खुद खुलासा किया- 'मेरा भाई मोहसिन चौधरी पुणे में इंडियन मुजाहिद्दीन का चीफ।' भाई की गिरफ्तारी के बाद से गायब है मोहसिन। कहीं वही तो नहीं, लश्कर-ए-तोएबा का स्लीपिंग सेल।