तेलंगाना में आग भड़की तो कबूतर ने आंखें मूंद ली

तेलंगाना पर आयोग बनाकर आग बुझाई थी। आयोग की शर्तों ने आग फिर भड़का दी। नौ दिसंबर कांग्रेस के जी का जंजाल बन गया। उस दिन सोनिया का जन्म दिन था। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता बधाई देने पहुंचे। तो तेलंगाना का रिटर्न गिफ्ट मांग लिया। सोनिया ने उसी दिन कोर कमेटी की धड़ाधड़ा मीटिंगे बुलाई। रात ग्यारह बजे तीसरी कोर कमेटी से निकले चिदंबरम ने कहा- 'सरकार तेलंगाना बनाने पर सहमत।' न सहयोगी दलों से पूछा। न केबिनेट से फैसला हुआ। नादिरशाही का जो नतीजा निकलना था। वही निकला। सोनिया ने सोचा था- तेलंगाना बनेगा। तो चंद्रबाबू और जगनरेड्डी कहीं के नहीं रहेंगे। दोनों सिर्फ चार जिलों वाले रायलसीमा के नेता रह जाएंगे। ग्यारह जिलों वाले तटीय आंध्र से कांग्रेस का नया नेतृत्व उभरेगा। तेलंगाना में राज्य बनाने का फायदा मिलेगा कांग्रेस को। सोचा था दोनों हाथों में लड्डू होंगे। पर अनाड़ियों के हाथ में तलवार वाली हालत हो गई। अपना ही गला काट लिया कांग्रेस ने। सोचा नहीं था- रायलसीमा-तटीय आंध्र से इतना विरोध होगा। इनका विरोध हुआ। तो इधर झुक गए। उनका विरोध हुआ। तो उधर झुक गए। सरकार डेढ़ महीना थाली का बैंगन बनी रही। आयोग बनाकर पिंड छुड़ाया। तो अपन ने तभी लिखा था- 'ठंडे बस्ते में डालने का इरादा है सरकार का।' अब शुक्रवार को जब आयोग की शर्तों का ऐलान हुआ। समय सीमा 31 दिसंबर बताई। तो अपनी बात सोलह आने सही निकली। यह तो थी पुरानी कहानी। अब सुनो नया बवाल। न माया मिली, न राम वाली हालत हो गई। आयोग की शतें जाहिर होते ही बवाल हो गया। दस-ग्यारह महीने की मियाद पर शायद इतना बवाल न होता। पर शर्तों के पहले नुकते ने ही आग भड़का दी। पहले नुकते में तेलंगाना का जिक्र हुआ। तो अखंड आंध्र के जवाबी आंदोलन का भी जिक्र। आयोग सिर्फ तेलंगाना के लोगों को नहीं सुनेगा। अखंड आंध्र के पैरवीकारों को भी सुनेगा। यानी तेलंगाना को ठुकराने की पूरी तैयारी। पिछड़े हैं, पर अकल से पैदल नहीं तेलंगाना वाले। सो टीआरएस तो भड़कनी ही थी। तेलंगाना के कांग्रेसी नेता भी भड़क गए। अपन कांग्रेसियों के मुखारविंद से निकले वचन सुनाएंगे। पहले टीआरएस प्रमुख चंद्रशेखर राव की बात। उनने आयोग की शर्तें फौरन ठुकरा दी। संसद और विधानसभा से इस्तीफे तो होंगे ही। शनि को तेलंगाना बंद का ऐलान भी हो गया। ज्वाइंट एक्शन कमेटी की मीटिंग भी बुला ली। स्टूडेंट्स ने भी मोर्चा संभाल लिया। आग तो शुक्रवार को भी भड़क चुकी थी। आज तो हैदराबाद में गैर तेलंगानियों की खैर नहीं। आंदोलन का हिंसक होना तय। एक वजह आयोग को इतना लंबा वक्त देना। दूसरा शर्तों से सरकार की बदनियति झलकना। सनद रहे, सो अपन बताते जाएं। जब मद्रास प्रांत से आंध्र को अलग करने का फैसला हुआ। तो कमेटी ने सिर्फ एक महीना लगाया था। कमेटी ने तब सिर्फ आंध्र के लोगों से राय ली थी। मद्रास के लोगों से नहीं। पर अपन बता रहे थे तेलंगाना के कांग्रेसियों का गुस्सा। सबसे पहले बात मधु याक्षी की। राहुल के करीबी हैं मधु याक्षी। शुक्रवार को दिल्ली में ही थे। अपन ने पूछा। तो फूट पड़े। बोले- 'केन्द्र के कांग्रेसी नेता रायलसीमा के नेताओं के हाथों बिक गए हैं। सोनिया के सिवा सब बिक गए हैं। मुझे अब भी सोनिया पर भरोसा। वह तेलंगाना देंगी।' मधु याक्षी के राजनीतिक कैरियर की अभी शुरूआत। सो उनने एक घर माफ किया। पर दिग्गज कांग्रेसी नेता वेंकटस्वामी ने यह घर भी माफ नहीं किया। वह आपे से बाहर थे। बोले- 'तेलंगाना में सोनिया के लिए सम्मान था। पर हमें सबने धोखा दिया।' केशवराव की जुबां बंद थी। आंखों में आलाकमान के प्रति गुस्सा झलक रहा था। रायलसीमा के एक नेता की बात भी करते जाएं। केंद्र सरकार में मंत्री हैं रायलसीमा के साईं प्रताप। वह भी गुस्से में थे। वजह थी- रायलसीमा की अनदेखी। बोले- 'शर्तों में रायलसीमा का जिक्र नहीं। हम न तटीय आंध्र के साथ खुश, न तेलंगाना के साथ। हमारी बात भी सुने आयोग। हमें भी अलग करें।' अब आज ज्वाइंट एक्शन कमेटी की मीटिंग में देखना। तेलंगाना के कांग्रेसी भी होंगे। टीडीपी वाले भी। इस्तीफों की होड़ लगेगी। हिंसा भड़केगी। कैसे चलेगा आंध्र का बजट सेशन। राष्ट्रपति राज की ओर बढ़ रहा है आंध्र। जैसा पिछली बार हुआ था। आग भड़की। तो कांग्रेस ने शुक्रवार को भी ब्रीफिंग रद्द कर दी। पर कबूतर के आंख बंद करने से बिल्ली नहीं भागती।

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