नगालैंड वाला फैसला गोवा में क्यों नहीं

अपन को लगता है कांग्रेस ने अभी सबक नहीं सीखा। सत्ता हथियाने के बेजा तरीकों ने कांग्रेस को कमजोर किया। नौ साल बाद सत्ता में लौटी। तो देश को उम्मीद थी कांग्रेस ने सबक सीख लिया होगा। सत्ता के लिए लोकतंत्र से बलात्कार अब नहीं करेगी। पर सत्ता में आते ही कांग्रेस फिर वही करने लगी। लोकतंत्र से बलात्कार के लिए गवर्नरों, स्पीकरों का बेजा इस्तेमाल। पहले बूटा सिंह-सिब्ते रजी ने सुप्रीम कोर्ट की डांट खाई। अब नगालैंड के बाद गोवा ताजा मिसाल। नगालैंड साठ सीटों की विधानसभा। गोवा चालीस की। एक-दो एमएलए भी इधर-उधर हो जाएं। तो सरकार पर संकट। छोटे राज्यों से सबक लेना चाहिए। यों अपन छोटे राज्यों के खिलाफ नहीं। तेलंगाना, विदर्भ और बुंदेलखंड के अपने सपने। पर छोटी विधानसभाएं मजबूत सरकारें नहीं देती। पिछले पखवाड़े नगालैंड का उदाहरण आया। जब तीन जनवरी को नगालैंड एसेंबली भंग कर दी गई। कांग्रेस ने एसेंबली से जो राजनीतिक बलात्कार किया। वह सबने देखा। जून में गोवा के कांग्रेसी स्पीकर प्रताप सिंह राणे ने तीन एमएलए सस्पेंड किए। तब जाकर कामत सरकार बची थी। पर नगालैंड के स्पीकर ने वही किया। तो कांग्रेस ने एसेंबली भंग करा दी। नगालैंड में कांग्रेसी सरकार होती। तो क्या एसेंबली भंग होती। अब फिर गोवा में बगावत हुई। तो कांग्रेस का दोहरा मापदंड फिर उजागर। कामत सरकार बुधवार को सात महीने में दूसरी बार दिगम्बर हुई। जून में कांग्रेस की एक मात्र महिला विक्टोरिया बागी हुई थी। मंत्री नहीं बनाया। सो इस्तीफा दे दिया था। कांग्रेसी स्पीकर ने इस्तीफा मंजूर नहीं किया। एमजीपी के दो एमएलए भी साथ छोड़ गए। पर प्रताप सिंह राणे ने खेल किया। बहुमत का इम्तिहान हुआ। तो तीनों को वोट नहीं डालने दिया। ताकि सनद रहे सो बताते जाएं- पिछले ही हफ्ते स्पीकर ने नया खेल किया। जब एमजीपी के दोनों एमएलए बहाल कर दिए। विक्टोरिया का इस्तीफा भी नामंजूर कर दिया। यानी एसेंबली में सभी 39 वोट देने लायक हो गए। स्पीकर समेत चालीस का सदन। उधर स्पीकर ने तीनों को वोट देने लायक किया। इधर सरकार फिर संकट में। अपने कान खड़े हुए। कहीं स्पीकर के ताजा फैसले का लिंक तो नहीं। इस्तीफों का ताजा चक्र बताएं। पहले स्पीकर प्रताप सिंह राणे का इतिहास बता दें। एसेंबली चुनाव हुए। तो प्रताप सिंह राणे सीएम थे। अपने बेटे को टिकट नहीं दिला पाए। तो निर्दलीय खड़े होने को उकसाया। वह जीत गया, तो दोनों हाथों में लड्डू आ गए। सीएम तो नहीं बन पाए। पर खुद स्पीकर और बेटे को मंत्री बनवा लिया। सुनते हैं ताजा बगावत में स्पीकर का ही हाथ। बुधवार शाम तीन मंत्रियों का इस्तीफा हुआ। तो उसमें स्पीकर का बेटा विश्वजीत राणे भी था। इस्तीफा देने वाली बाकी दो मंत्री एनसीपी के। रात होते-होते कांग्रेसी एमएलए श्याम सतारडेकर ने इस्तीफे का मन बना लिया। एनसीपी के तीन एमएलए। सो जमा-घटाओ के बाद दिगम्बर के पास बचे सोलह। बीजेपी के चौदह और एमजीपी के दो भी हुए सोलह। कांग्रेस के गलियारों में तो खबर थी- सारी साजिश प्रताप सिंह राणे की। स्पीकर राणे का बेटा विश्वजीत कोई यों ही नहीं गया होगा। आखिर बाप का आशीर्वाद तो होगा ही। जैसे ना-ना करते भी एचडी देवगौड़ा अंदर से थे कुमारस्वामी के साथ। पर बात लोकतंत्र से बलात्कार की। गुरुवार को दिल्ली गोवा की तरफ भागी। पवार ने स्पीकर को चिट्ठी लिखी- 'एनसीपी एमएलए सरकार का समर्थन न करें। तो सस्पेंड कर दें।' पार्टी बचाने प्रफुल्ल पटेल को गोवा भेजा। सोनिया ने सरकार बचाने को बीके हरिप्रसाद डिस्पेच किए। पर गुरुवार की शाम तक सरकार बचती नहीं दिखी। तो बची खुची कैबिनेट ने सत्रावसान की सिफारिश कर दी। और एससी जमीर ने पूछा ही नहीं- 'जब बहुमत नहीं तो कैबिनेट की सिफारिश कैसी।' उनने तो घुग्घी मार दी। लोकतंत्र से बलात्कार का एक और उदाहरण।

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