तो सोनिया के लिए बेल्लारी के रास्ते बंद

ऑटो एक्सपो में लखटकिया कार दिखाने रतन टाटा खुद आए। तो बोले- 'कार के नाम की बात चली। तो सुझाव आया- बुध्दू रखा जाए।' यों बुध्ददेव भट्टाचार्य सिंगूर मामले में बुध्दू तो साबित नहीं हुए। पता नहीं यह सुझाव क्यों आया? टाटा ने भले सुझाव नहीं माने। पर चुटकी तो कर ही गए। उनने कहा- ''दूसरा सुझाव 'ममता' नाम का था। आखिर ममता के बावजूद कार आएगी।'' पर वह बुध्ददेव-ममता के चक्कर में नहीं फंसे। कार का नाम 'नैनो' रखा। सत्तर के दशक में संजय गांधी ने छोटी कार बनाई। तो नाम 'मारुति' रखा। कार आने में बहुत वक्त लगा। तब चुटकीबाज वाजपेयी कहा करते थे- 'यह मारुति नहीं, बेटे के लिए मां-रोती है।' मारुति की तरह चुटकी से शुरूआत हुई। सो मारुति की तरह छाएगी। पर तब और अब में कितना फर्क। तब अपनी आबादी पचास करोड़ भी नहीं थी। अब सौ करोड़ के पार। आबादी का गांवों से शहरों में कूच। किसी भी महानगर में निकल जाइए। साईकिल चलाने की जगह नहीं। एक वक्त आएगा। जब कहीं जल्दी पहुंचना होगा। तो कार छोड़ पैदल चलना होगा। गांवों से शहर में भागादौड़ी का ही असर। जो आबादी का संतुलन बिगड़ गया। सो अपन को निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन करना पड़ा। छोटी कार, बढ़ती आबादी और परिसीमन का सीधा नाता। तीनों बातें सत्तर के दशक में एक साथ हुई। संजय गांधी को मारुति बनाने का ख्याल आया। बढ़ती आबादी पर नकेल के लिए नसबंदी की मुहिम चलाई। लोकसभा-एसेंबलियों की सीटें नहीं बढ़ाने का फैसला भी तभी हुआ। इमरजेंसी में ही सन् 2000 तक सीटों का जस-का-तस बना रहना तय हुआ। सन् 2001 आया। तो वाजपेयी की सरकार थी। वाजपेयी ने सीटें तो जस-की-तस बनाए रखी। पर असंतुलन दूर करने को परिसीमन आयोग बना दिया। तारीफ करनी पड़ेगी जस्टिस कुलदीप सिंह की। जिनने वक्त पर काम निपटाया। वरना कोई आयोग बन जाएं। तो समझो गई भैंस पानी में। बाबरी ढांचे के लिब्राहन आयोग को ही लो। चौदह साल बीत गए। भगवान राम चौदह साल का वनवास काटकर लौट आए थे। पर आयोग की रिपोर्ट नहीं आई। पर जस्टिस कुलदीप ने पिछले साल जुलाई में ही रपट दे दी थी। रपट से यूपीए में घमासान मचा। सो पांच महीने ठंडे बस्ते में पड़ी रही। वह तो मामला सुप्रीम कोर्ट में गया। तब जाकर मनमोहन सिह को फैसला करना पड़ा। अब फिर छोटी कार और परिसीमन एक ही दिन। इधर अपने रतन टाटा ने 'नैनो' पेश की। उधर अपने मनमोहन सिंह ने परिसीमन को हरी झंडी दी। पर राजनीति फिर आड़े आ गई। सो असम, अरुणाचल, मणिपुर, नगालैंड का परिसीमन ठप्प। झारखंड का परिसीमन हो चुका था। वहां लागू नहीं होगा। लागू हो, तो आदिवासी सीटें घटेंगी। यही हाल नार्थ-ईस्ट के चारों राज्यों का। यों इन चारों राज्यों के परिसीमन पर कोर्ट का स्टे था। स्टे हटा, आयोग ने काम शुरू किया। तो गुरुवार को कैबिनेट ने फैसला ले लिया- 'नार्थ-ईस्ट के चारों राज्यों में परिसीमन नहीं होगा। झारखंड का परिसीमन लागू नहीं होगा।' देखी वोट बैंक की राजनीति। आयोग का काम वक्त से पहले खत्म। अब ऑर्डिनेंस आएगा। ऑर्डिनेंस में सरकार को हक होगा- पांच राज्यों का नोटिफिकेशन रोक सके। पर लाख टके का सवाल दूसरा। क्या कर्नाटक चुनाव के ऐलान तक नोटिफिकेशन होगा? सुनते हैं सीईसी गोपालस्वामी की सलाह मार्च तक नोटिफिकेशन रोकने की। ताकि तब तक कर्नाटक के चुनावों का ऐलान हो जाए। बजट सत्र 21 फरवरी से होगा। सो संसद में परिसीमन पर झक-झक के बाद ही नोटिफिकेशन हो। तो अपन को हैरानी नहीं। पर एक बात बता दें। तेरह रिजर्व सीटें बढ़ेंगी। यानी इतनी ही जनरल सीटें कम होंगी। सोमनाथ, पाटील, कल्याण सिंह, राजबब्बर, लालू, सचिन को सीटें बदलनी पड़ेंगी। धर्मेन्द्र तो वैसे भी बीकानेर से नहीं लड़ते। पर सोनिया चाहकर भी बेल्लारी से नहीं लड़ पाएंगी। बेल्लारी रिजर्व।

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