कल तो बच गए, आज कटघरे में होंगे जयराम

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तेलंगाना के डर से लोकसभा तो सिमट गई। पिछले शुक्रवार को ही सिमट गई। पर राज्यसभा अभी भी जारी। यों सत्रावसान 21 दिसंबर को होना तय था। इक्कीस की तारीख तय करने की वजह थी। वजह थी- कोपेनहेगन में हुए समझौते पर संसद में बयान देना। यह विपक्ष की मांग थी- सत्रावसान कोपेनहेगन पर बयान के बाद हो। सरकार तैयार हो गई। सो मनमोहन-जयराम के लौटने पर सत्रावसान तय हुआ। ऐसा होता तो लालकृष्ण आडवाणी का इस्तीफा भी 21 को होता। पर अपने ही बिछाए तेलंगाना जाल में कांग्रेस फंसी। तो लोकसभा से 18 को ही निजात पा ली। बीजेपी को भी अपनी पार्लियामेट्री पार्टी की मीटिंग 18 को बुलानी पड़ी। बीजेपी पार्लियामेंट्री पार्टी की मीटिंग 21 को होती। तो पार्लियामेंट्री बोर्ड 22 को बैठता। उस दिन पूरा होता राजनाथ सिंह का कार्यकाल। पर कांग्रेस तेलंगाना में फंसी। तो  बीजेपी का जलवायु परिवर्तन वक्त से पहले हो गया। पर तेलंगाना का लोकसभा जैसा बवाल राज्यसभा में भी होता। तो सरकार राज्यसभा का सत्रावसान करने में भी गुरेज न करती। पर विपक्ष से वादा किया था। राज्यसभा में बवाल भी नहीं था। सो जयराम रमेश का बयान करवाकर सत्रावसान की रणनीति बनी। सोमवार को राज्यसभा बैठती। जयराम रमेश का बयान होता। पर उससे पहले बीजेपी के मेंबर सूर्यकांत आचार्य के देहांत की खबर आ गई। सो सदन को श्रध्दांजलि देकर उठना पड़ा। अब राज्यसभा मंगलवार को भी बैठेगी। एक तो बिल पास करवाकर सरकारी काम निपटेगा। दूसरा- जयराम रमेश का बयान होगा। शीतसत्र में मोटे तौर पर दो-दो विदेश यात्राओं से गायब रहे पीएम। पर राज्यसभा में आखिरी दिन हाजिरी लगाकर मौजूदगी दिखाएंगे। पर बात जलवायु परिवर्तन की। तो भले ही कोपेनहेगन में हुआ समझौता बाध्यकारी नहीं। पर भारत ने चीन के साथ मिलकर जी-77 को गच्चा दे दिया। इसका अंदेशा शुरू से था। बाराक ओबामा ने मनमोहन को कोपेनहेगन बुलाया ही इसीलिए था। बाराक की रणनीति सफल रही। अमेरिका, भारत, चीन, ब्राजील समझौता हो गया। भले ही यह समझौता बाध्यकारी नहीं। पर सोमवार को व्हाइट हाऊस के प्रवक्ता डेविड एक्सलरॉड का बयान चौंकाने वाला। उनने कहा है- 'भारत और चीन पर निगाह रखेगा अमेरिका।' जब समझौता बाध्यकारी नहीं। तो अमेरिका को भारत-चीन पर निगाह रखने का क्या हक। पर पहला सवाल तो जी-77 को बीच मझधार में छोड़ने का। अमेरिका का पिछलग्गू बनकर भारत खुद को भी अमीर समझने लगा है। भारत तो नहीं समझता। पर मनमोहन सरकार समझने लगी है। वरना मनमोहन कोपेनहेगन में जी-77 को धोखा नहीं देते। जी-77 का स्टेंड था- 'अमीर देश 1990 के मुकाबले इमीशंस में तीस से चालीस फीसदी की कटौती करें। जलवायु परिवर्तन अमीर देशों की वजह से हो रहा। सो खामियाजा उनको ज्यादा भुगतना चाहिए।' पर समझौता हुआ है- 'बीस से पच्चीस फीसदी कटौती का।' ऐसा करके भारत ने दुनिया की अस्सी फीसदी आबादी से धोखा किया। गरीब देश चाहते थे- 'तापमान में बढ़ोत्तरी ज्यादा से ज्यादा डेढ़ डिग्री सेल्सियस तय हो। पर कोपेनहेगन में हुई दो डिग्री।' दूसरी तरफ मौसम के जानकारों का दावा है- औद्योगीकरण से पहले के स्तर को पैमाना बनाएंगे। तो तापमान में बढ़ोत्तरी होगी तीन फीसदी। आखिरी वक्त पर भारत-चीन के घुटने टेकना समझ नहीं आता। शायद चीन की वजह से वामपंथी मनमोहन-जयराम पर उतने हमलावर न हों। पर संसद में किया वादा तोड़ा है जयराम ने। सो कटघरे में तो खड़े होंगे ही। बीजेपी के भी, वामपंथियों के भी।