असली रंगभेदी तो हैं अंपायर

अपन को क्रिकेट का कोई बुखार नहीं। सो अपन क्रिकेट के पंडित भी नहीं। पर इतने भी घसियारे नहीं। जो स्टीव बकनर और मार्क बेनसन की टुच्चई न समझ सकें। अंपायरों की टुच्चई पर बाद में चर्चा करेंगे। पहले अपने हरभजन सिंह भज्जी की बात। भज्जी ने नस्लभेदी टिप्पणीं की या नहीं। अपन नहीं जानते। पर आईसीसी का फैसला जरूर नस्लभेदी। अपने होठों को सफेद रंगने वाले साइमंड ने कहा- 'भज्जी ने मुझे मंकी कहा।' अंपायर कह रहे थे- उनने कुछ नहीं सुना। पर आईसीसी ने अपने भज्जी को तीन मैचों में सस्पेंड कर दिया। रंगभेदी कौन? अपने भज्जी या आईसीसी। अपन को नहीं लगता- भज्जी ने गुस्से में अंग्रेजी बोली होगी। गुस्से में गाली कभी विदेशी भाषा में नहीं निकलती। भज्जी कहते भी तो बांदर (बंदर) या खोता (गधा) कहते। जो पंजाबी आमतौर पर कहता दिखेगा। और बांदर या खोता कहते। तो साइमंड को समझ भी नहीं आता। पर समझने की बात तो तब उठती। जब भज्जी ने कुछ कहा हो। भज्जी कहते हैं- 'मैंने तो कुछ कहा नहीं।' और अंपायरों ने कुछ सुना नहीं। तो फैसला नस्लभेदी नहीं, तो क्या। आईसीसी ने मुकदमा दायर होने से पहले ही फैसला कर रखा था। आईसीसी के भेदभाव का इम्तिहान तो अब होगा। ब्राड हॉग ने अपने कप्तान अनिल कुंबले को 'बास्टर्ड' कहा। अंग्रेजी के इस बास्टर्ड शब्द का मतलब है- 'हरामजादा।' डार्विन की थ्योरी थी- 'मनुष्य के पूर्वज बंदर थे।' अपने भज्जी ने अगर साइमंड को मंकी कहा भी। तो वह गाली नहीं। पर 'बास्टर्ड' तो अंग्रेजों की पुरानी गाली। अपन को तो हैरानी इस बात की। बीसीसीआई ने पहले शिकायत क्यों नहीं की? अब बात आस्ट्रेलियाई टीम की। आस्ट्रेलियाई खेल को कभी खेल भावना से नहीं लेते। जंग का मैदान समझते हैं। आस्ट्रेलिया का इतिहास उठाकर देख लो। समुद्री डाकुओं का देश है आस्ट्रेलिया। सो पूर्वजों का मुख्य धंधा अब भी खून में। मैच को जीतने की बजाए लूटने का जोर। क्रिकेट कभी भद्र पुरुषों का खेल हुआ करता था। कहते थे- क्रिकेट इज दि गेम ऑफ जेंटलमेंस। पर आस्ट्रेलियाई टीम को देख लगता है क्रिकेट अब लुच्चों और लंपटों का खेल। पर आईसीसी ने जब भज्जी को सस्पेंड किया। तो बीसीसीआई ने फौरन वैसा हल्ला नहीं मचाया। जैसा मचाना चाहिए था। वह तो देशभर में बवाल हुआ। तब जाकर शरद पवार ने भज्जी पर अपील के फैसले तक टूर सस्पेंड किया। अपन को तो पवार की लीडरशिप पर ही संदेह। इधर गेहूं महंगा हो रहा है। उधर आस्ट्रेलिया में पिट रहे हैं। आईसीसी कूदती है बीसीसीआई के पैसे पर। दुनिया में सबसे ज्यादा अमीर है बीसीसीआई। पर अपने साथ ही नाइंसाफी कर रही है आईसीसी। बीसीसीआई आंख दिखाए। तो आईसीसी की फिरकी बन जाए। आईसीसी के न सिर्फ फैसले भारत विरोधी, रंगभेदी। अलबत्ता अंपायर भी रंगभेदी। स्टीव बकनर और मार्क बेनसन की टुच्चई बार-बार दिखी। सौरव गांगुली की गेंद पोंटिंग के बल्ले पर लगी थी। विकेट कीपर धोनी ने गेंद को लपका। पर अंपायर बेनसन ने पोंटिंग को आउट नहीं किया। फिर एंड्रयू साइमंड ने इशांत शर्मा की गेंद पर बल्ला घुमाया। धोनी ने फिर गेंद लपक ली। इस बार बकनर ने टुच्चई की। साइमंड आउट होता। तो आस्ट्रेलियाई टीम जीतती ही नहीं। बकनर ने दूसरे दिन भी साइमंड को बख्श दिया। साइमंड तीन बार क्लीयर कट आउट था। माइकल हसी भी तीन बार क्लीयर आउट था। पर अंपायर तो जैसे रिश्वत खाकर बैठे थे। इसका सबूत बाद में भी मिला। जब बकनर ने राहुल द्रविड़ को साइमंड की गेंद पर आउट किया। गेंद बल्ले से लगी ही नहीं थी। पर विकेट कीपर गिलक्रिस्ट के गेंद लपकने पर आउट दे दिया। हद तो तब हो गई। जब बेनसन ने आस्ट्रेलियाई कप्तान पोंटिंग के इशारे पर गांगुली को आउट किया। अब बताओ। अपने भज्जी रंगभेदी, या आईसीसी के अंपायर।

कहीं ऐसा तो नहीं कि ये

कहीं ऐसा तो नहीं कि ये आस्ट्रेलियन कोच न रखने की झल्लाहट हो, जिसका बदला भज्जी को बेन करने की साजिश के रुप में सामने आ रहा है।

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