भाजपा का अश्वमेघ घोड़ा कहीं रास्ते में न रुके
गुजरात-हिमाचल में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी में नया उत्साह आ गया है। लोकसभा चुनावों में हार के बाद से पार्टी में मुर्दनी छाई हुई थी। इस बीच पार्टी में कई प्रयोग हुए लेकिन कार्यकर्ताओं में उत्साह नहीं भरा जा सका था। भाजपा को निराशा के चक्रव्यूह में फसाने का काम राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विवादास्पद फैसलों से हुआ था। उत्तर प्रदेश में भाजपा की करारी हार के बाद संघ ने भाजपा पर अपनी नीतियां-निर्देश थोपने की गलती कबूल की और लाल कृष्ण आडवाणी का विरोध छोड़ दिया। आडवाणी को प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करके अगले लोकसभा चुनाव लड़ने का फैसला इसी समीक्षा से निकला। स्वाभाविक तौर पर संघ परिवार के बदले रुख से भाजपा में नए सिरे से उथल-पुथल शुरू हो चुकी है। राजनाथ सिंह अपने स्तर पर अपनी समझ से पार्टी को चला रहे थे, लेकिन अब उन्हें सभी फैसले लाल कृष्ण आडवाणी से सलाह मशविरा करके करने पड़ेंगे। ऐसा नहीं है कि राजनाथ सिंह पहले आडवाणी से सलाह मशविरा नहीं करते थे, लेकिन आडवाणी न तो कोई सलाह दे रहे थे, और न ही किसी फैसले का विरोध कर रहे थे। आडवाणी ने पार्टी पदाधिकारियों की सूची में नरेंद्र मोदी को संसदीय बोर्ड से हटाने और अरुण जेटली को प्रवक्ता पद से हटाने पर न तो सहमति दी थी और न ही विरोध जताया था। कर्नाटक में जदस से गठबंधन पर भी उन्होंने अपनी राय नहीं दी थी, हालांकि उनके खास समझे जाने वाले अनंत कुमार शुरू से गठबंधन के खिलाफ थे। संघ परिवार के फैसले पर शुरूआती टकराव के बाद (भोपाल में वाजपेयी की चिट्ठी लाने की घटना) राजनाथ सिंह ने भी खुद को परिस्थितियों के मुताबिक ढालना शुरू कर दिया है।
पार्टी का संसदीय बोर्ड लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित कर चुका है और पार्टी के सभी फैसले आम सहमति से होने लगे हैं। गुजरात के चुनावों के दौरान ही कर्नाटक और राजस्थान की दो बड़ी घटनाएं हुई और दोनों ही जगह फैसला आम सहमति से लिया गया। कर्नाटक में अनंत कुमार की इच्छा के खिलाफ आडवाणी ने देवगौड़ा परिवार से मिलकर येदुरप्पा सरकार बनाने की सहमति दी। न सिर्फ सहमति दी, बल्कि खुद शपथ ग्रहण में भी मौजूद थे। इसी तरह राजस्थान में वसुंधरा राजे विरोधी खेमे ने प्रदेश अध्यक्ष महेश शर्मा को निशाना बनाया, तो आडवाणी ने अपने शुरूआती विरोध के बाद गुजरात विधानसभा चुनावों के बाद बदलाव पर सहमति दे दी। महेश शर्मा को हटाने का फैसला उस समय भी हो सकता था, लेकिन उसका सीधा असर गुजरात के चुनावों पर पड़ता क्योंकि ओम माथुर वहां के प्रभारी महासचिव थे। बदलाव के फैसले का संदेश लेने के बाद ही राजस्थान के असंतुष्टों ने अपनी तलवारें म्यान में डाल ली थी और वसुंधरा राजे सरकार की चौथी सालगिरह धूम-धाम से मनाई जा सकी।
गुजरात-हिमाचल का चुनाव जीतने पर भाजपा में उत्साह तो है लेकिन कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ का खतरा भी सिर पर मंडरा रहा है। इन चारों ही राज्यों में पार्टी भयंकर फूट का शिकार है, अगर वक्त रहते फूट पर काबू नहीं पाया गया, तो लोकसभा चुनाव आते-आते सारा उत्साह काफूर हो चुका होगा। इसलिए जहां एक तरफ अरुण जेटली, अनंत कुमार, सुषमा स्वराज, सुधीन्द्र कुलकर्णी, अरुण शौरी पार्टी के पक्ष में वातावरण बनाए रखने की रणनीति और चुनाव घोषण पत्र तैयार करने में जुट गए हैं वहां इन चारों राज्यों को संभालने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। कर्नाटक को छोड़ दिया जाए, जहां येदुरप्पा पार्टी के चुनावी हीरो के तौर पर चुनाव प्रचार की कमान संभालेंगे, बाकी तीनों राज्यों में भाजपा के किसी मुख्यमंत्री की हैसियत नरेंद्र मोदी जैसी नहीं है, जो विद्रोहियों को ठेंगा दिखाकर अपनी लोकप्रियता के आधार पर पार्टी की नैय्या पार लगा सके। इसलिए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विद्रोहियों को शांत करके संगठन-सरकार में तालमेल बिठाने की रणनीति शुरू हो गई है। पार्टी जानती है कि तीनों ही राज्यों में संगठन को दर-किनार करके चुनाव नहीं जीता जा सकता। भाजपा आलाकमान छत्तीसगढ़ को सबसे मजबूत (वह भी कांग्रेस में फूट के कारण, जहां सोनिया गांधी ने अजीत जोगी की इच्छा के खिलाफ विद्याचरण शुक्ल को कांग्रेस में लेकर दो गुट खड़े कर दिए हैं) मान रहा है और मध्यप्रदेश को सबसे कमजोर। राजस्थान में स्थिति इतनी बुरी नहीं कि संभाली न जा सके, लेकिन सिर्फ वसुंधरा राजे के भरोसे चुनाव नहीं जीत सकते। पार्टी का छत्तीसगढ़- राजस्थान में नेतृत्व परिवर्तन का कोई इरादा नहीं है, लेकिन मध्यप्रदेश में चाहकर भी नेतृत्व परिवर्तन में हिचक है, क्योंकि चार साल में तीन मुख्यमंत्री पहले ही बदले जा चुके हैं। हिमाचल की तरह भाजपा तीनों ही राज्यों में बसपा पर निगाह टिकाए बैठी है, बसपा हिमाचल में कांग्रेस को हराने और भाजपा कों सत्ता दिलाने में काफी सहायक रही है।
भाजपा एक साथ दोतरफा तैयारियों में जुटी हुई है, जहां एक तरफ लोकसभा चुनाव की तैयारी, तो दूसरी तरफ चारों राज्यों के चुनावों की तैयारी। राजग के घटक दलों ने लाल कृष्ण आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को मंजूर कर लिया है। शिव सेना, अकाली दल, बीजू जनता दल ने लाल कृष्ण आडवाणी को बाकायदा बधाई दी है, जनता दल के अध्यक्ष शरद यादव की ओर से आपत्ति की गुंजाइश भी खत्म हो चुकी है। हालांकि उन्होंने उत्साह नहीं दिखाया, लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि जनता दल को आडवाणी के नाम पर कोई एतराज नहीं है। जहां तक ममता बनर्जी का सवाल है, वह बार-बार फैसले बदलती रही हैं, और फिलहाल भी राजग से बाहर जाने का रास्ता देख रही हैं। लोकसभा चुनावों की तैयारी का दूसरा चरण राजग में बड़े पैमाने पर पुनर्गठन और फेरबदल की प्रक्रिया से शुरू होगा। राजग के चेयरमैन अटल बिहारी वाजपेयी स्वास्थ्य कारणों से दिसम्बर 2005 में ही चुनावी राजनीति से संन्यास का ऐलान कर चुके थे, लेकिन मीडिया ही उन्हें उम्मीदवार घोषित किए हुए था। अब स्वास्थ्य कारणों के आधार पर प्रधानमंत्री पद की दौड़ से बाहर होकर उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी को आगे कर दिया है, तो सवाल खड़ा हो रहा है कि जब वाजपेयी का स्वास्थ्य इतना ही खराब है, तो चुनावों से पहले राजग की बागडोर भी किसी अन्य के हवाले की जानी चाहिए। वाजपेयी की तरह राजग के संयोजक जार्ज फर्नाडीस का स्वास्थ्य भी अब उनका साथ नहीं दे रहा है। वैसे भी उनकी हैसियत अब उनकी अपनी पार्टी में वैसी नहीं रही। जार्ज फर्नाडीस को जनता दल अध्यक्ष के पद से चुनाव में हराने वाले शरद यादव की निगाह राजग के चेयरमैन या संयोजक के पद पर है और यह स्वाभाविक भी है कि दोनों में से एक पद गैर भाजपा नेता के पास रहे। लाल कृष्ण आडवाणी भी चाहेंगे कि राजग का एक पद गैर भाजपा नेता के पास रहे, ताकि घटक दलों में समन्वय का काम सुचारू रूप से चलता रहे। भैरोंसिंह शेखावत हालांकि उपराष्ट्रपति पद से हटने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल नहीं हुए, लेकिन उन्हें भाजपा के नेता के तौर पर ही देखा जाता है। शेखावत सक्रिय राजनीति में लौटने का ऐलान कर चुके हैं, राजग के पास भी उन जैसा लोकप्रिय चेहरा नहीं है। देशभर में उनकी स्वीकार्यता अटल बिहारी वाजपेयी जैसी ही है, इसलिए लाल कृष्ण आडवाणी उन्हें राजग का चेयरमैन बनाकर उनकी निर्विवाद छवि का फायदा उठाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
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