जेटली के डिनर से बीजेपी में खलबली

अरुण जेटली का डिनर न्यौता चौंकाने वाला था। तीस सितंबर को न जेटली का जन्मदिन। न पत्नी संगीता का जन्मदिन। न शादी की सालगिरह। संगीता और अरुण के न्यौते ने बीजेपी में हलचल मचा दी।  हफ्ताभर लोग पूछताछ करते रहे। वेंकैया नायडू जब अध्यक्ष बने। तो उनने सालाना लंच-डिनर का सिलसिला शुरू किया। खास तेलुगू स्टाइल के व्यंजन। उससे पहले अपने रामदास अग्रवाल ही भोज राजनीति करते रहे। आडवाणी ने कभी भोज दिया हो। अपन को याद नहीं आता। चाट-पकौड़ी, गोल-गप्पों के लिए जरूर बुलाते रहे। आडवाणी को लंच-डिनर पसंद नहीं। चटपटा ज्यादा पसंद। हां, कभी कभार साऊथ इंडियन भी परोसा। जेटली को वर्किंग कमेटी का मेंबर बने सोलह साल हो गए। नौ साल पहले केंद्र में मंत्री बन गए थे। वेंकैया नायडू पार्टी के अध्यक्ष बने। तो महामंत्री भी बन गए थे। पर जेटली को कभी लंच-डिनर डिप्लोमेसी याद नहीं आई। न्यौते में संगीता का नाम भी था। सो अपन ने सबसे पहले दोनों का बायोडाटा ढूंढा। पर कुछ पल्ले नहीं पड़ा। तो बेचैनी ज्यादा बड़ी। अपन ने बीजेपी के लीडरों को टटोला। तो वह अपन से ज्यादा बेचैन दिखे। राजनाथ ने जबसे जेटली के पर कुतरे। तब से जेटली-राजनाथ टकराव जग जाहिर। जेटली एक बार तो नागपुर जाकर शिकायत भी कर चुके। यों मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से हटाने की बात हो। या जेटली को प्रवक्ता पद से हटाने की। राजनाथ संघ की सहमति बता अपने फैसले का बचाव करते रहे। जेटली भले दिल्ली यूनिवर्सिटी को छोड़ कोई सीधा चुनाव नहीं लड़े। पर चुनावी प्रबंधन के झंडे गाड चुके। अपनी महारथ उनने गुजरात, मध्य प्रदेश, पंजाब में दिखाई ही। दिल्ली नगर निगम में भी दिखाई। यूपी का मोर्चा जेटली को नहीं देकर राजनाथ मजा चख चुके। आडवाणी ने बहुत समझाया था। पर राजनाथ का पहला निशाना था- आडवाणी खेमे को ध्वस्त करना। जो उनने मोदी-जेटली का कद घटाकर किया। पर यूपी की हार से जब खुद का कद ही घटा। तो राजनाथ को वह कहानी याद दिलाई गई। जिस पेड़ पर बैठे हो, उसकी टहनी काटने वाली। सो अबके उनने वक्त रहते ही गुजरात का मोर्चा जेटली को सौंप दिया। तो क्या डिनर गुजरात चुनाव प्रचार की तैयारी के सिलसिले में था। पर ऐसा होता। तो नरेंद्र मोदी भी डिनर में आते। तो क्या राजनाथ सिंह के खिलाफ मोर्चेबंदी के लिए था। पर डिनर में जब राजनाथ खुद ही आ धमके। तो अटकल भी वह गुंजाइश भी जाती रही। लगता है- आडवाणी खुद जानबूझकर नहीं आए। आडवाणी खेमे के वेंकैया, अनंत, सुषमा भी शायद जानबूझकर नदारद रहे। पर राजनाथ खेमा पूरा मौजूद था। हैरानी वाली हाजिरी मुरली मनोहर जोशी की रही। जेटली का पहला डिनर कौतुहल का मुद्दा बना। सो जिसे न्यौता मिला। वह नहीं चूका। कौतुहल डिनर के समय भी बना रहा। अपन ने काला कुर्ता पहने जेटली से पूछा। तो उनने मंजे हुए पॉलीटिशियन वाला जवाब ही दिया- 'आप लोगों को खाना खिलाने की इच्छा हुई, बस।' पर मंजे हुए वकील जेटली को इस सवाल का जवाब नहीं सूझा- 'यह डिनर अब ही क्यों?' डिनर की बात है, तो मीनू बताते जाएं। खास कश्मीरी स्टाइल की सब्जियां। न्यौते में संगीता भी शामिल थी। ताकि सनद रहे सो बताते जाएं। संगीता कश्मीर सरकार में कांग्रेसी मंत्री रहे गिरधारी लाल डोगरा की बेटी। सो कश्मीरी कहवे की भी तैयारी थी। पर वह तैयारी धरी रह गई। पतंगों ने भी दिल्ली पर हमले का यही दिन चुना। इंडिया हैबिटेट सेंटर के टैरेस पर पतंगों का हमला हुआ। तो कहवे का ढक्कन ही नहीं खुला। जेटली की कैंडिल लाइट डिनर की योजना में भी विघ्न पड़ा। पर प्रबंधन के माहिर जेटली ने फौरन मोमबत्तियां बुझवा दी। जब मोमबत्तियों को फूंक मारी जा रही थी। तो जेटली के नए अवतार के जन्मदिन का आभास हुआ।

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