लिब्राहन की रपट, 356 और विपक्ष की एकता

छह दिसम्बर दूर नहीं। बाबरी ढांचे की 17वीं बरसी होगी। पर इस बार छह दिसम्बर इतवार को। पांच दिसम्बर को भी संसद नहीं बैठेगी। सत्रह साल कांग्रेस गैर भाजपाई दलों का फायदा उठाती रही। इस बीच गैर भाजपाई सरकारें भी रह चुकी। भाजपाई सरकार भी रह चुकी। पर छह दिसम्बर का हंगामा कभी नहीं रुका। लंबे अर्से बाद विपक्ष गन्ने के मुद्दे पर एकजुट दिखा। तो कांग्रेस के होश फाख्ता थे। इसीलिए लीक की गई लिब्राहन रपट। पर गले की हड्डी बन गई। तो तुरत-फुरत संसद में पेश करनी पड़ी। फिर भी लिब्राहन रपट विपक्षी एकता तोड़ने में उतनी कारगर नहीं हुई। दो-चार दिन ही सेक्युलर दलों का एका दिखा। यों इस बात पर बीजेपी जरूर खफा होगी। बीजेपी किसी को सेक्युलर दल नहीं मानती। आडवाणी कहा करते हैं- सब छ्दम धर्मनिरपेक्ष। असली धर्मनिरपेक्ष तो बीजेपी है। पर अपन इस बहस में नहीं पड़ते। सवाल संसद में विपक्षी एकता का। जो अपन को लिब्राहन रपट आने के बाद भी यदा-कदा दोनों सदनों में दिखी। वैसे जब आज से लिब्राहन रपट पर बहस होगी। तो बीजेपी - शिवसेना अकेली दिखेंगी। पर इस बार हमले कांग्रेस पर ज्यादा होंगे। लिब्राहन ने नरसिंह राव को बरी करके मसाला थमा दिया। वैसे लिब्राहन से यही उम्मीद थी। आखिर नरसिंह राव ने ही उन्हें आयोग की कमान सौंपी थी। जिस पर वह सत्रह साल जमे रहे। वैसे राव के बरी होने से कांग्रेस भी कम शर्मसार नहीं। बाबरी ढांचे की वजह से ही 1998 में राव का टिकट कटा था। सीताराम केसरी तो मोहरा थे। सोनिया का इशारा न होता। तो टिकट न कटता। पर अब जब राव बरी हुए। तो अपने ही कटघरे में कांग्रेस। पर अपन बात कर रहे थे विपक्षी एकता की। जो सोमवार को बंगाल के मुद्दे पर भी दिखी। यह तो आपको पता ही होगा- ममता जबसे बंगाल के चुनावी राजनीति में हावी हुई। तब से केंद्र पर 356 लगाने का दबाव। ममता के दबाव में चिदंबरम ने केंद्रीय टीम भेज दी। तो संसद में हंगामा होना ही था। लेफ्ट ने प्रश्नकाल तक नहीं चलने दिया। प्रश्नकाल की बात चली। तो याद करा दें- जब तक भैरोंसिंह शेखावत राज्यसभा के चेयरमैन नहीं बने थे। तब तक तीन-चार सवाल ही हो पाते थे। शेखावत ने वक्त कम बर्बाद करने, ज्यादा काम करने का तरीका निकाला। तो नामजद सभी दस सवालों-जवाबों का रिकार्ड बना। पर एक रिकार्ड सोमवार को भी बना। जब लेफ्टिए हंगामा कर रहे थे। तब मीरा कुमार सवाल पूछने वालों के धड़ाधड़ नाम बोल रही थी। अपन तो देखकर दंग रह गए। बीस में से तीन सवाल ही पूछे जा सके। बाकी सत्रह सवाल पूछने वाले नदारद थे। कांग्रेस संसदीय दल में कह-कहकर थक गई सोनिया। निर्देश भेज-भेजकर आडवाणी भी थक चुके। पर सांसद हैं कि मानते नहीं। हाजिरी जरूर लगाएंगे, तनख्वाहें-भत्ते उठाएंगे। चुनाव जीतने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाएंगे। काले धन से 'पेड न्यूज' भी छपवाएंगे। आपने देखा- अंग्रेजी के एक अखबार ने अशोक चव्हाण की पोल खोल दी। महाराष्ट्र के दर्जनों अखबारों में एक ही मजमून से पूरे-पूरे पेज छपे। तय है- पेज बनाकर दिए थे। उसकी कीमत अदा की होगी। पर चुनाव आयोग को दिए खर्चे में जिक्र तक नहीं। करोड़ों का खर्च, पर जमा खर्च जरा नहीं। चुनाव जीतने के लिए ऐसी-ऐसी हरकतें। पर सदन से गैर हाजिर रहेंगे। अब यह बात सिर्फ अशोक चव्हाण की नहीं। भूपेंद्र सिंह हुड्डा के भी दर्जनों पेज चुनावों में छपे। खैर बीजेपी को अच्छा मौका मिला। अब चुनाव आयोग क्या करेगा। नवीन चावला का आयोग करेगा भी क्या। पर बात विपक्षी एकता की। जो बंगाल में 356 की साजिश दिखते ही दिखी। लेफ्ट का हंगामा तो जायज। पर लालकृष्ण आडवाणी भी 356 के खिलाफ खड़े हुए। यों वह लेफ्ट का डबल स्टेंडर्ड याद कराना नहीं भूले। बाबरी ढांचा टूटने के बाद बीजेपी की राजस्थान, मध्यप्रदेश, दिल्ली, हिमाचल सरकारें गिराई थी। तो लेफ्ट कांग्रेस के साथ थी। पर विपक्षी एकता में इस बार बीजेपी अड़चन नहीं बनेगी। भले एफडीआई का मामला हो। लेफ्ट की लाइन अपनाएगी बीजेपी भी।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट