प्रियंका-फातिमा नहीं राहुल-बिलावल

अपने यहां कांग्रेस-भाजपा में चुनावी तैयारियां। तो उधर पीपीपी-पीएमएल में गठजोड़ की खबर। आखिर नवाज शरीफ ने माना- 'पीपीपी-पीएमएल मिल जाएं। तो पाक में जमहूरियत का भला होगा। दोनों मिलकर उखाड़ सकते हैं तानाशाही।' पाकिस्तान में पीपीपी-पीएमएल हू--हू वैसे ही। जैसे अपने यहां भाजपा-कांग्रेस। अपने यहां पाक जैसी समस्या तो नहीं। जहां हर दूसरे-तीसरे साल फौजी तानाशाही का फच्चर। पर अपने यहां राजनीतिक हुड़दंग इतना हो गया। विकास की गाड़ी पटरी से उतर चुकी। सोचो, अपने यहां भी कांग्रेस-बीजेपी मिल जाएं। तो देश का कितना भला होगा। छोटी-छोटी पार्टियों की ब्लैकमेलिंग खत्म होगी। विकास की गाड़ी सरपट दौड़ेगी। पर कांग्रेस-बीजेपी का मिलना खालाजी का घर नहीं। पाक में हालात दूसरे। बेनजीर की हत्या ने हालात बदल दिए। अपना शक अभी भी वही का वही। हो-ना-हो- आईएसआई-तालिबान-अलकायदा की मिलीजुली खिचड़ी। ऊपर से परवेज मुशर्रफ की सहमति का छोंक। सोचो, अगर हत्या की साजिश में मुशर्रफ सरकार न होती। तो टोयटा कार की छत की लीवर चुभने का ऐंगल आता? सारी दुनिया बेनजीर पर हमले की खबर से वाकिफ। पर पाक सरकार के जावेद चीमा बोले- 'गोली या बम से नहीं, बेनजीर कार की लीवर से मरी।' यों तो बेनजीर की प्रवक्ता शेरी रहमान ने चीमा के दावे की धाियां उड़ा दी। अब टोयटा कंपनी ने भी खंडन कर चीमा के परखच्चे उड़ाए। जैसा अपन ने शुरू से लिखा। अब वही साबित होने लगा। मुशर्रफ सरकार अलकायदा-तालिबान के बचाव में उतर चुकी। इसलिए तो हिलेरी क्लिंटन ने अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की। बेनजीर के पति जरदारी की मांग भी वही। मुशर्रफ अलकायदा-तालिबान का बचाव करेंगे। मौत को हादसा बताएंगे। तभी तो बुश के प्रहारों से बचेंगे। बुश के प्रहार की बात चली। तो अपन बेनजीर का आखिरी भाषण याद कराएं। बेनजीर कह रही थीं- 'वे चाहते हैं, आतंकियों से पाक की रक्षा के लिए आएं। पर वे पाक की रक्षा क्यों करेंगे। पाक हमारा वतन है। पाक की रक्षा मैं करूंगी। पाक की रक्षा आप करेंगे।' बेनजीर का 'वे' यानी अमेरिका। बेनजीर की मौत से अमेरिका की पाक में घुसपैठ का बहाना बन चुका। सो मुशर्रफ आतंकियों के बचाव में उतर आए। पर बात पाक के लोकतंत्र की। अपने यहां सालों-साल लोकतंत्र गांधी-नेहरू परिवार के इर्द-गिर्द। अब पाक में भी तीन दशक से लोकतंत्र भुट्टो-शरीफ परिवारों के इर्द-गिर्द। अपन इंदिरा-भुट्टो परिवारों की समानताएं पहले भी बता चुके। उधर जुल्फिकार अली फांसी पर चढ़ाए गए। इधर इंदिरा की हत्या हुई। उधर मजबूरी बेनजीर को राजनीति में ले आई। इधर कांग्रेस ने मजबूरी में राजीव को अपनाया। राजीव के भाई संजय विमान हादसे में मरे। बेनजीर के भाई मुर्तजा की हत्या हुई। बात मुर्तजा की चली। तो मुर्तजा की बीवी घिनवा भुट्टो का शक बेनजीर पर रहा। पर अब बेनजीर नहीं रही। तो घिनवा ने बेनजीर को माफ कर दिया। पर घिनवा की बेटी फातिमा की शक्ल बेनजीर जैसी। जैसे प्रियंका गांधी की शक्ल, हाव-भाव इंदिरा जैसे। अपने यहां ऐसा मानने वालों की कमी नहीं। जो प्रियंका को इंदिरा का राजनीतिक वारिस समझते हों। पर न उधर फातिमा न इधर प्रियंका। इधर राहुल गांधी, तो उधर बिलावल भुट्टो जरदारी। दोनों तरफ राजनीति के अनाड़ी। लिखा हुआ भाषण-बयान पढ़ने वाले। जैसे भारत-पाक की राजनीति बच्चों का खेल हो। लोकतंत्र की जड़ें कितनी जमी, आप भी सोचो। अपने यहां कांग्रेस-भाजपा दोनों में धड़ाम-चौकड़ी। गुजरात-हिमाचल के नतीजों से दोनों दलों में हलचल। कांग्रेस जवां खून से अब बिदकने लगी। करुणाकरन की वापसी। विद्या भय्या आ ही चुके। भजन लाल पर बढेंग़े फिर डोरे। बीजेपी फिर से खुश फहमी के रथ पर सवार। पर बीजेपी को फख्र अनुभवी लीडर का। आडवाणी होंगे अनाड़ियों पर भारी।

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