बीजेपी अध्यक्ष का चुनाव हो, तो मोदी जैसा कोई नहीं

संघ ने बंद मुट्ठी खोल ली। बीजेपी की साख बढ़ेगी या घटेगी। यह तो बीजेपी वाले या संघ वाले जाने। पर एनडीए का कुनबा बिखरेगा। एनडीए का आडवाणी को नेता मानना भी आसान नहीं था। पर शरद यादव-नीतीश कुमार जैसों ने आडवाणी को करीब से देखा था। तो आडवाणी को कबूल करना आसान हुआ। वरना मीडिया ने आडवाणी की ऐसी इमेज बना दी थी। अपन को तो वाजपेयी के बाद ही कुनबा बिखरने का अंदेशा था। आडवाणी का असली व्यक्तित्व मीडिया की बनाई इमेज से कोसों दूर। शरद यादव ने एक बार कहा था-'हमने आडवाणी के साथ छह साल काम किया। हमें उन्हें एनडीए का नेता मानने में कोई प्रॉब्लम नहीं।' मीडिया की नजर में मोदी की इमेज तो आडवाणी से भी बुरी। पर मीडिया की बनाई इमेज से एकदम अलग है मोदी की इमेज। गुजरात की जनता ने तीन बार फैसला यों ही नहीं सुनाया। अपन की डेमोक्रेसी में आस्था न हो। तो कुछ भी कहिए, कुछ भी लिखिए। पर बात आडवाणी-मोदी की नहीं। बात हो रही थी संघ की। जिसने बंद मुट्ठी खोल दी। पिछली बार जब सरसंघ चालक की प्रेस कांफ्रेंस हुई। तो हिंदुत्व पर एक शब्द नहीं छपा। न चैनलों पर दिखाया गया। बीजेपी पर पूछे सवालों के जवाब ही खबरें बनीं। अलबत्ता हफ्तों तक सवालों-जवाबों की चीर-फाड़ होती रही। सरसंघ चालक पहले ऐसे प्रेस कांफ्रेंसे नहीं करते थे। सो अब मोहन भागवत ने शुरू की। तो कोतूहल होना ही था। हेडगेवर मीडिया से दूर रहते थे। गुरुजी भी। बाला साहब देवरस ने विजयदशमी के सिवा शायद ही मीडिया से बात की हो। पर के. एस. सुदर्शन का 'वाक द टॉक' खूब चर्चित रहा। सुदर्शन के वक्त ही शुरू हुआ था टकराव। जी हां, आडवाणी से टकराव की बात कर रहे। जब सुदर्शन ने जिन्ना को मुद्दा बनाकर इस्तीफे का दबाव बनाया। पर यह दबाव ऐसे समय था। जब बीजेपी संकट के दौर से गुजर रही थी। सो बीजेपी को भारी कीमत चुकानी पड़ी। आडवाणी जैसे कद का नेता बीजेपी में तो क्या। कांग्रेस में भी नहीं दिखता। अपन कितना छुपाएं। पर चार साल आडवाणी-राजनाथ का टकराव सबने देखा। बीजेपी में ऐसा मानने वालों की कमी नहीं। जो मानते हैं- टकराव की जड़ में आरएसएस। पर अपन उस खुसर-फुसर में नहीं जाते। नरेंद्र मोदी को पार्लियामेंट्री बोर्ड से निकालना। अरुण जेतली को प्रवक्ता पद से हटाना। तो शुरुआत थी। फिर येदुरप्पा-अनंत टकराव हो। गडकरी-मुंडे टकराव हो। वसुंधरा-माथुर टकराव हो। खंडूरी-कोश्यारी टकराव हो। या कल्याण सिंह-उमा भारती का मामला। कदम-कदम आडवाणी-राजनाथ खेमों का टकराव दिखा। इसी टकराव में बीजेपी यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा में निपटी। अब राजनाथ सिंह का वक्त खत्म होने के कगार पर। तो मोहन भागवत की 'सीधी बात' का नया फच्चर। अपन ने जेतली-सुषमा-वैंकेया-अनंत से संघ की अरुचि तो कई बार बताई। गडकरी-परिकर ने दिलचस्पी भी बताई। यों बीजेपी कोई आरएसएस नहीं। जो किसी को भी अधिकारी बनाने से फर्क नहीं पड़ता। वाजपेयी-आडवाणी बनने में पांच-पांच दशक लग जाते हैं। जेतली-सुषमा, वैंकेया-अनंत बनने में तीन-तीन दशक लगते हैं। सोनिया माइनो को भी सोनिया गांधी बनने में एक दशक लगा। राष्ट्रीय राजनीतिक दल के अध्यक्ष का विजन होना चाहिए। एग्रीकल्चर, डिफेंस, फायनेंस, फॉरन अफेयर की समझ। देश-दुनिया की समझ। एटमी करार-सीटीबीटी, सुरक्षा परिषद की समझ। कम से कम प्रशासन की तो कोई समझ हो। गडकरी-परिकर तो किसी कसौटी पर खरे नहीं उतरते। दोनों में से कोई कभी राष्ट्रीय महासचिव तक नहीं रहा। पर गडकरी गुरुवार को दिल्ली आकर संघ प्रमुख से मिले। तो अपने कान खड़े हुए। किसी गडकरी-परिकर से तो नरेंद्र मोदी का कद कई ऊंचा। पार्टी के महासचिव रह चुके। दस साल तक गुजरात के सीएम रह चुके। मोदी भले मीडिया की पसंद न हो। बीजेपी के वोट बैंक की पसंद तो मोदी ही। बीजेपी अपना अध्यक्ष चुनने का प्रयोग करके देखे।

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