आडवाणी पर भविष्यवाणी करने वाले अब कहां हैं

अपनी स्पीकर मीरा कुमार जा रही हैं अमेरिका। उन्नीस नवंबर को लौटेंगी। तब सेशन से पहले मीटिंग का वक्त नहीं होगा। सो उनने आज ही मीटिंग बुला ली। सेशन से एक हफ्ता पहले। यों तो इस मीटिंग के मुताबिक सेशन नहीं चलना। मीरा कहेंगी-'सबको मौका मिलेगा। सेशन को हंगामों से बचाओ।' पर हंगामें तो होकर रहेंगे। मंहगाई पर अब विपक्ष जरूर एकजुट होगा। मुलायम को भी कांग्रेस से हाथ मिलाने की अकल आ चुकी। सोचो, एटमी करार पर सरकार गिर जाती। तो कांग्रेस को 206 सीटें मिल पातीं। कतई नहीं। अलबत्ता 1989 के हालात बनते। पर बात मंहगाई की। बीजेपी ने बुधवार को आरोपों की बौंछार कर दी। प्रकाश जावडेकर ने कहा- 'सटोरियों से चंदा लेकर मंहगाई बढ़ा रही है कांग्रेस।' अब तो चीनी आयात का घोटाला भी मुद्दा होगा। पिछले साल अपन ने 12 रुपए किलो के हिसाब से आयात की थी। इस बार 27 रुपए किलो करेंगे।  वैसे तो बीजेपी के साथ मुलायम भी मंहगाई को मुद्दा बनाएंगे। पर अबू आजमी की महाराष्ट्र एसेंबली में पिटाई उनका अहम मुद्दा होगा। अबू की पिटाई से राज ठाकरे फिर सुर्खियों में। सो देशभर की अदालतों में फिर मुकदमें दाखिल होंगे। वैसे मुकदमों से निकलना कुछ नहीं। एसेंबली-संसद में कुछ हो। तो कोर्ट कुछ नहीं कर सकती। नरसिंह राव के जमाने में सांसद बिक गए थे। तब भी अदालत ने मजबूरी बता दी थी। अबू आजमी का मामला क्या चीज। पर आजमी का जिक्र आएगा। तो शिवसेना भी चुप नहीं बैठेगी। लगते हाथों अपन बताते जाएं- अबू आजमी शिवसेना-एमएनएस को थोड़ा करीब तो ले ही आए। सो हंगामें तो जरूर होंगे। चीन पर भी होगा, वंदेमातरम् पर भी होगा। पर सीटीबीटी पर दस्तखत के दबाव पर भी होगी। पर कांग्रेस तो उपचुनावों के नतीजों से बल्ले-बल्ले। पर असम और केरल को छोड़ दो। तो कांग्रेस न बंगाल में जीती, न यूपी में। असम-केरल की पांचों सीटें तो पहले भी कांग्रेस की थीं। हिमाचल, राजस्थान, यूपी,बंगाल में कांग्रेस अपनी सीटें हार गई। यह हाल ऐरे-गैरों का नहीं। चार केंद्रीय मंत्री अपनी सीटें हार गए। वीरभद्र अपनी रोहडू कांग्रेस को नहीं दिला पाए। आरपीएन सिंह यूपी की अपनी सीट पडरौना नहीं जीता पाए। जतिन प्रसाद शाहजहांपुर की पोवाया सीट नहीं जीता पाए। प्रदीप जैन झांसी की सीट नहीं जीता पाए। ये चारों सीटें इन्हीं  के एमपी बनने से खाली हुई थीं। दासमुंशी की पत्नी के एमपी बनने से जो सीट खाली हुई। वह भी कांग्रेस हार गई। फिर भी कांग्रेस को बल्ले होने का पूरा हक। यूपी को लेकर कांग्रेस कुछ ज्यादा ही उत्साहित। पर उसने देखा नहीं। ग्यारह में से छह सीटों पर कांग्रेस की जमानत जब्त हुई। सो कांग्रेस के दफ्तर में भी ज्यादा डींगे हांकने वालों से लोग हैरान। अपन को कोई बता रहा था- 'फिरोजाबाद-लखनऊ ही नहीं। पडरौना-झांसी में भी गए थे राहुल।' मीठा-मीठा घप्प, कडवा-कडवा थू से राजनीति नहीं चलती। सो अभिषेक मनु सिंघवी ने माना- 'चाल धीमी है, पर दो साल में रफ्तार पकड़ लेंगे।' बात चुनाव नतीजों की हो रही। तो जरा बीजेपी की पड़ताल भी कर लें। यूपी में ग्यारह सीटों पर हुए थे चुनाव। बीजेपी की आठ सीटों पर जमानत जब्त हुई। अब खंडूरी-वसुंधरा को भी हार का ठीकरा यूपी के दिग्गज के सिर फोड़ने का हक। बात दिग्गज की चली। तो बताते जाएं। राजनाथ सिंह बुधवार को आरएसएस हेडक्वार्टर गए। मोहन भागवत से मुलाकात की। संघ आजकल कुछ ज्यादा ही सुर्खियों में। मोहन भागवत का किसी गडकरी- परीकर को अध्यक्ष बनाने का फार्मूला। पर कोई मराठी अध्यक्ष बना। तो बिहार-झारखंड में नतीजे भुगतने पड़ेंगे। यह संघ नहीं जानता। संघ के किसी गडकरी-परिकर से तो बहुत भारी हैं नरेंद्र मोदी। संघ की बात चली। तो आडवाणी का जिक्र हो जाए। आठ नवंबर को जन्मदिन पर इस्तीफे की खूब खबरें उड़ाई। पर आडवाणी का इस्तीफा नहीं हुआ। बुधवार को सुषमा ने तो रतलाम में एलान कर दिया-'आडवाणी का इस्तीफा नहीं होगा।' यों अपन ऐसा नहीं मानते। पर राजनाथ सिंह के हटने तक तो नहीं होगा। अपन ने तो पहले भी यही लिखा था।

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