जेहादियों की निगाह पाक के एटम बम पर

आखिर वही हुआ। जिसका अपन ने अंदेशा जताया। अपन ने लिखा था- 'अमेरिकापरस्ती बनी बेनजीर की मौत।' शुक्रवार को वाया इटली खबर आई- 'अल कायदा ने हत्या की जिम्मेदारी ले ली।' अल कायदा के कमांडर मुश्तफा अबू अल याजीद ने कहा- 'हमने अमेरिका की वह सबसे महत्वपूर्ण नेता खत्म कर दी। जिसने मुजाहिद्दीन को खत्म करने की कसम खाई थी।' याजीद ने यह भी बताया- 'बेनजीर का काम तमाम करने का हुक्म अल कायदा के नंबर दो- अल जवाहरी ने दिया था।' पर पाकिस्तान में ज्यादातर लोगों को मुशर्रफ पर शक। मुशर्रफ अपने रास्ते के रोड़े हटाने में माहिर। यों भी भुट्टो परिवार का फौज से छत्तीस का आंकड़ा रहा। फौज-आईएसआई ने भुट्टो परिवार को कभी पसंद नहीं किया। अब जब दिखने लगा- बेनजीर पीएम बन सकती है। तो तालिबान-अल कायदा-आईएसआई-मुशर्रफ ने मिलाजुला खेल कर दिया। अल कायदा ने यह भी कहा- 'हत्या के लिए कई गु्रप बनाए गए। जिसमें से लश्कर-ए-झांगवी सफल रहा।' तालिबान-आईएसआई गठजोड़ की बात अपन पहले भी लिख चुके। बेनजीर की वापसी न तालिबान को पसंद थी। न आईएसआई को। परवेज मुशर्रफ को भी बेनजीर की वापसी कहां पसंद थी। बेनजीर को तो बुश ने मुशर्रफ पर लादा। जो मुशर्रफ को तो रास नहीं आया। अपन पहले भी लिख चुके। अब तो अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने भी कहा- 'मुशर्रफ की तालिबान से सांठ-गांठ।' इन खबरों के बाद ही मुशर्रफ ने स्वात घाटी पर धावा बोला। स्वात पर धावा मुशर्रफ को उल्टा पड़ा। तालिबान-अल कायदा ने उन सबको मजा चखाने की ठानी। जो अमेरिका के साथ। तालिबान की बात चली। तो अपन इतिहास बताते जाएं। बेनजीर जब प्रधानमंत्री थी। तो उनने ही अफगानिस्तान में तालिबान को खड़ा किया। तालिबान की सारी टे्रनिंग तब पाक में ही हुई। अपन ने कल भी लिखा था। आज फिर बता दें। राजीव और बेनजीर की जिंदगी एक जैसी। राजीव जब पीएम थे। तो लिट्टे आतंकियों को भारत में टे्रनिंग दी गई। बाद में लिट्टे आतंकियों ने ही राजीव गांधी की हत्या की। पर बड़ा सवाल दूसरा। पाकिस्तान में अब क्या होगा। चुनाव होगा या नहीं। चुनाव हुआ तो पीएम कौन होगा। यों अपन को चुनाव की उम्मीद नहीं। आज नहीं तो कल मुशर्रफ- सुमरु को यह फैसला लेना होगा। पर चुनाव जब भी हों। लोकतंत्र के पांव जमने की उम्मीद नहीं। यों भी जब तक मुशर्रफ विरोधी सरकार नहीं आए। जो 1973 का संविधान बहाल करे। तब तक पाक में लोकतंत्र को फर्जीवाड़ा समझिए। जैसा इराक में लोकतंत्र का अमेरिकी तमाशा। वैसा पाकिस्तान में। पर दूसरा सवाल। पीपीपी का क्या होगा। पीपीपी का सदर बेनजीर की बहन सनम होगी। या बेनजीर का पति आसिफ जरदारी। जहां तक बेनजीर के बच्चों बिलावल, बख्तावर, आसिफा का सवाल। तो तीनों अभी छोटे। यों सनम की बात चली। तो बता दें- जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी पर चढ़ाया गया। तो पहले भुट्टो की दूसरी बीबी नुसरत पीपीपी की सदर थी। बेनजीर बाद में बनी। कुछ दिन तो बेनजीर और मुर्तजा में कशमकश रही। नुसरत भी अपने बेटे मुर्तजा के साथ हो गई थी। पर जब मुर्तजा की हत्या हो गई। तो परिवार का यह संकट खत्म हुआ। पर फिलहाल बड़ी बात दूसरी। मुस्लिम कट्टरपंथी आतंकी क्या यहीं पर रुक जाएंगे? अपन अमेरिकी अखबार वाल स्ट्रीट जनरल पर भरोसा करें। तो जेहादियों का मकसद पाक पर कब्जा करना। कब्जा करके एटम बम अपने कब्जे में लेना।

अच्छा लिखा है आपने. माफ़

अच्छा लिखा है आपने. माफ़ कीजियेगा, आप [और तमाम भारतीय चैनल] एक एंगल बार-बार मिस्स करते दिख रहे हैं - अमरीका की भी पाकिस्तान को बरबाद रखने और उसके न्यूक्लियर बमों में उतनी ही दिलचस्पी है जितनी तालीबान या अलकायदा की. बेनज़ीर की मौत से अमरीका को भी उतना ही फ़ायदा है. यहां - hindini.com/eswami/?p=152 इस बारे में लिखा है.

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