कामनवेल्थ फैडरेशन पहुंची तो पीएम के होश हुए फाख्ता

जिनने 1984 का चुनाव नहीं देखा। उनने चुनावों में सांपों-बिच्छुओं का इस्तेमाल नहीं देखा। अपन यहां लाहौर की कहावत का इस्तेमाल मुनासिब नहीं समझते। पर लाहौर की कहावत बताना वक्त की जरूरत। वहां एक कहावत है- 'जिन्ने लाहौर नहीं वेख्या, ओ जाम्या ही नहीं।' यानी जिसने लाहौर नहीं देखा, वह पैदा ही नहीं हुआ। आजादी के बाद दूर दराज के कस्बों-गांवों में जितना मोह दिल्ली देखने का। उतना आजादी से पहले लाहौर देखने का था। कम से कम उत्तर भारत में तो था ही। पर अपन बात कर रहे थे चुनाव की। महाराष्ट्र के चुनावों में चूहों-बिल्लियों-सांपों-मेढकों का इस्तेमाल हुआ। तो अपन को 1984 के चुनाव याद आए। जब कांग्रेस ने इश्तिहारों में अपने विरोधियों को कहीं बिच्छू। तो कहीं सांप दिखाया था। अब महाराष्ट्र के चुनाव में वही आलम। शुरूआत बालठाकरे से हुई। उनने किसी जानवर से तो तुलना नहीं की। पर अपने भतीजे राजठाकरे को जिन्ना का अवतार कहा। पर बेटा बाप पर भारी पड़ गया। उध्दव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई को चूहा कहा। बोले- 'राजठाकरे बीजेपी-शिवसेना पर हमलावर। पर कांग्रेस-एनसीपी के खिलाफ नहीं बोलते। डरते है, कहीं चूहे के तरह पिंजरे में न डाल दें।' अपने चचेरे भाई को कांग्रेस का दलाल बताते हुए उध्दव ने कहा- 'वह सुपरमैन नहीं। अलबत्ता सुपारीमैन हैं। कांग्रेस ने उसे बीजेपी-शिवसेना को हराने की सुपारी दी है।' पर बात हो रही थी चुनावों में जानवरों की। तो सीएम अशोक चव्हाण भी पीछे नहीं रहे। उध्दव ने उन्हें चूहा कहा। तो चव्हाण ने राजठाकरे को मेढक कहा। जो चुनाव में निकल आए हैं। बात चुनाव की हो ही रही है। तो बताते जाएं- मायावती भी अब महाराष्ट्र में कांग्रेस का तम्बू फाड़ेगी। सुप्रीम कोर्ट से पड़ रही लताड़ से बेहद खफा है मायावती। अपन बता दें- याचिकाकर्ता के वकील हैं कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी। मंगलवार को तो अदालत की अवमानना का नोटिस हो गया। पर मायावती को इस नोटिस से क्या। वह अब महाराष्ट्र में कांग्रेस को दलित विरोधी बताने जाएगी। यों भी दलितों की रहनुमा आरपीआई इस बार कांग्रेस के साथ नहीं। सो काशीराम-मायावती के बुतों के मामले में लेने के देने न पड़ें। महाराष्ट्र की चुनावी जंग अपने शबाब पर होगी। तो अपन ताजा किस्से बताते रहेंगे। फिलहाल बात हो रही थी लाहौर की। तो बता दें- पाकिस्तानी पंजाब से उजड़कर ज्यादातर पंजाबी दिल्ली में बसे। तो आजादी के बाद दिल्ली भी लाहौर जैसी हो गई थी। वह तो 1982 के एशियाई खेलों ने दिल्ली बदल दी। अब जब कामनवेल्थ के खेल सिर पर। तो दिल्ली एक बार फिर तेजी से बदल रही। सोनिया गांधी भले सादगी मंत्र का कितना पाठ पढ़ाएं। पर अपन कामनवेल्थ की तैयारियों में करोड़ों-अरबों की बर्बादी देख रहे। फिर भी कामनवेल्थ में पिछड़ रही है दिल्ली। तेरह सितंबर को कामनवेल्थ गेम फेडरेशन के चीफ माइकल फेनेल दिल्ली आए। तो तैयारियों की सुस्त चाल देख भड़क गए थे। उनने इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के मुखिया सुरेश कलमाड़ी को लिखा- 'पीएम से मेरी मुलाकात तय की जाए। ताकि सुस्त तैयारियों पर बात कर सकूं।' चिट्ठी पढ़ कलमाड़ी के होश उड़ गए। शीला दीक्षित फौरन मौका मुआइना करने दौड़ी। खेल मंत्री गिल भी पीछे-पीछे दौड़े। कलमाड़ी ने पीएम से मिलकर वक्त पर तैयारियों की दुहाई दी। शीला और गिल भी तैयारियों का भरोसा दिलाने में जुटे। पर अब जब मंगलवार को फेडरेशन के नुमाइंदे दिल्ली पहुंचे। तो तैयारियों की पोल खुलने लगी। बता दें- मंगल की शाम तक तेईस देशों के नुमाइंदे पहुंच चुके। बुध तक 71 देशों के पहुंच चुके होंगे। तो अब पीएम की नींद हराम हुई। कहीं टल ही न जाएं कामनवेल्थ गेम। सो उनने आनन-फानन में सबको पीएमओ तलब किया। पर सुरेश कलमाड़ी को नहीं बुलाया। शीला दीक्षित, जयपाल रेड्डी, एमएस गिल तलब हुए। मोंटेक सिंह आहलुवालिया और टीके नायर भी बुलाए गए। सुनते हैं पीएम ने जमकर खाट खड़ी की। तो देर रात जयपाल रेड्डी के दफ्तर में मीटिंग चलती रही। अब जयपाल रेड्डी तैयारियों की कमान संभालेंगे।

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