तो नेता पुत्रों ने बाजी मार ली दस जनपथ पर

तो वही हुआ। जिसका सभी को अंदेशा था। सोनिया गांधी नेता पुत्रों के आगे झुक गई। वाईएसआर के बेटे जगनमोहन पर कड़ा रुख अपनाया। तो अपन को लगता था- एसेंबली चुनावों में भी नेता पुत्रों की शामत आएगी।  सोनिया के करीबी बता रहे थे- आंध्र से सबक लिया है आलाकमान ने। अब नेता पुत्रों को टिकट देने से पहले दस बार सोचेंगे। दस जनपथ से छन-छनकर खबरें छपती रही- 'हरियाणा-महाराष्ट्र में नेता पुत्रों को टिकट नहीं दिया जाएगा।' हरियाणा में तो सोनिया की घुड़की काफी हद तक काम की। पर महाराष्ट्र में नेताओं की घुड़की ज्यादा काम कर गई। गुरुवार को अपन आंध्र के एक दिग्गज रेड्डी के साथ बैठे। तो अपन ने पूछा- 'कांग्रेसी विधायकों का जगन मोहन को मौजूदा समर्थन जारी रहा। तो क्या सोनिया झुकेंगी?' उनका जवाब था- 'मौजूदा समर्थन लंबा देर नहीं रहेगा।' पर अपन ने अगला सवाल सोनिया का मन जानने वाला किया। अपन ने पूछा- 'क्या सोनिया जगनमोहन को लेकर न्यूट्रल है?' तो उनने तपाक से कहा- 'नहीं।' इसका मतलब साफ हुआ- 'सोनिया प्रांतों में वंशवाद नहीं चलने देगी।' वैसे आंध्र प्रदेश के बारे में अपनी राय साफ- कांग्रेस ने विधायकों की राय न मानी। तो जिस आंध्र प्रदेश ने केंद्र में सत्ता दिलाई। वह आंध्र प्रदेश कांग्रेस के पंजे से निकल भागेगा। पर बात आंध्र की नहीं। बात महाराष्ट्र की। जहां राष्ट्रपति प्रतिभा ताई के बेटे को टिकट देना महंगा पड़ा। अपन बात सिर्फ अमरावती सीट की नहीं कर रहे। जहां दो बार का कांग्रेसी विधायक डा. सुनील देशमुख बागी हो चुका। बात बाकी नेताओं के पुत्र-पुत्रियों की भी। पर पहले बात डा. सुनील देशमुख की। अमरावती में दो बार से विधायक थे डा. सुनील देशमुख। विधायक बनकर नई कोठी भी नहीं खरीदी। दिन-रात लोगों की सेवा में लगा दिया। पुराने मुहल्ले की तंग गली के पुराने मकान में ही रहते रहे। दूसरी तरफ प्रतिभा ताई का परिवार अमरावती के सबसे अमीर इलाके का वासी। अमीर इलाके की भी सबसे बड़ी कोठी का मालिक। सुनील देशमुख ने सारा वक्त अमरावती पर लगाया। यही वजह थी। जो बैरंग हाथ लौटे देशमुख का हीरो की तरह स्वागत हुआ। टिकट जरूर राजेंद्र शेखावत के हाथ लगा। पर अमरावती के कांग्रेसी सुनील देशमुख के साथ। अमरावती में इक्कीस पार्षद हैं कांग्रेस के। इनमें से बीस सुनील देशमुख के साथ। अपन नहीं जानते राष्ट्रपति का बेटा कैसे जीतेगा। कहीं पिता देवीसिंह शेखावत जैसा हाल न हो। जिनकी 1995 में जमानत जब्त हो गई थी। पर राष्ट्रपति के बेटे को टिकट देकर सोनिया ने मक्खियों के छत्ते में हाथ डाल लिया। जिसका नतीजा अपन को शुक्रवार को साफ दिखा। सुशील कुमार शिंदे की बेटी प्रणीति को भी टिकट देना पड़ा। विलासराव देशमुख के बेटे अमित देशमुख को भी टिकट देना पड़ा। नरेश पुगलिया के बेटे राहुल को भी टिकट देना पड़ा। विधानसभा उपाध्यक्ष का बेटा भी टिकट ले गया। कार्यकारी अध्यक्ष जयंत आवले का बेटा भी टिकट ले गया। अपन को राहुल गांधी का बयान याद आया। बड़ा तीखा बयान था। उनने कहा था- 'टपके हुए नेताओं को टिकट नहीं मिलेगा। नेता पुत्र होना टिकट की योग्यता नहीं होगी। जो जितना काम करेगा, वह उतना फल पाएगा। जमीनी कार्यकर्ताओं को तवज्जो दी जाएगी।' पर महाराष्ट्र में ही यह ख्याली पुलाव ढह गया। जमीनी कार्यकर्ता तो ही थे सुनील देशमुख। जिनने बीजेपी से अमरावती छीनी थी।

कांग्रेस में परिवारवाद /

कांग्रेस में परिवारवाद / वंशवाद का यह वाइरस नया नहीं हैं . हाँ , जब भी कुछ नज़रों से होकर गुजरता है तो हमें इसकी याद आ जाती है और खीज में भर कर कीबोर्ड पर उंगलियाँ दौड़ाने लगते हैं . मालूम है , अब यह रोग लगभग लाइलाज होने के कगार पर खड़ा है .लोकतंत्र की प्रतिरोधक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है . भारत में वंशवाद के विषबेलों की संख्या दिनों - दिन चौगुनी रफ़्तार में बढ़ रही है .

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