एटमी पनडुब्बी तैयार अग्नि-5 की भी तैयारी

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई। फिर कारगिल के दौरान हुई छोटी-मोटी खरीद ने। दलाली की आरोपबाजी से नुकसान हुआ सैन्य तैयारी का। कई बार तोपों की खरीददारी करने का मामला उठा। पर बात कभी आखिर तक नहीं पहुंची। एक बार अपना इरादा होवित्जर तोपें खरीदने का था। होवित्जर विमान से कहीं भी उतारी जा सकती हैं। पर मंसूबे ही बनते रह गए।  डिफेंस मिनिस्टर डरते ही रह गए। दूसरी तरफ बात चीन की। हथियारों की बात तो छोड़ दीजिए। बार्डर तक इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत। लद्दाख सेक्टर में कराकोरम के पार की बात। चीन की कंस्ट्रक्शन गतिविधियां चौंकाने वाली। अपनी सारी गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो चुका चीन। इसी महीने पीएलए की हरकतों ने अपन को चौंकाया। ऐसा नहीं कि अपन फिक्रमंद नहीं। फिक्रमंद न होते। तो अपने वायु और नौसेनाध्यक्ष ऐसे नहीं बोलते। फिक्रमंद न होते। तो एमके नारायणन टॉप लेवल की मीटिंग क्यों बुलाते। यह अलग बात। जो मीटिग की खबर लीक हुई। तो सत्रह सितंबर की मीटिंग टल गई। पर मीटिंग टल जाए। तो यह न मानिए- अपन फिक्रमंद नहीं। अपनी तैयारियां अब दो तरफा होंगी। जिसका जिक्र अपन ने शुरू में किया। हथियारों की खरीद से भी। कूटनीतिक मोर्चेबंदी से भी। पहले बात वाजपेयी के जमाने की। वाजपेयी के वक्त एक थ्योरी चली थी- 'भारत-चीन-रूस गठबंधन की।' इस गठबंधन के लिए दो मीटिंगें भी हुई। पर मनमोहन सरकार बनते ही रणनीति बदल गई। अब अपन अमेरिका के ज्यादा करीब। सो चीन अपन से बेहद खफा। इसकी झलक अरुणाचल और लद्दाख बार्डर पर दिखी। सो अब बात अपनी दोतरफा तैयारी की। तो मनमोहन सरकार भले ही लापरवाह दिखे। पर ऐसा है नहीं। पहले बात नेवी की। अपन को विदेशी मामलों के अंदरूनी जानकार ने बताया- 'यों तो अपनी एटमी पनडुब्बी अरिहंत की तैयारी भी जोरों पर। पर रूसी एटमी पनडुब्बी भारत आने को तैयार।' अपन ने दस साल की लीज पर ली है पनडुब्बी। अपन ने लीज के 650 मिलियन डालर अदा किए। बुधवार को रूस ने ऐलान किया-'पनडुब्बी के ट्रायल का तीसरा चरण पूरा हो चुका। मार्च-अप्रेल तक भारत के सुपुर्द कर दी जाएगी।' बात अग्नि-5 मिसाइल की। तो उसकी तैयारियां भी पूरी। आप पूछोगे- अग्नि-4 कब तैयार हुई। तो बता दें- अग्नि-4 नहीं होगी। वह अग्नि-3 की ही एडवांस स्टेज। याद है अपन ने 2006 से 2008 तक अग्नि-3 के तीन टेस्ट किए। तो अब छह हजार किलोमीटर मारक क्षमता वाली अग्नि-5 की तैयारी। अग्नि-5 आते ही अपना पलड़ा भारी होगा। बात इंफ्रास्ट्रक्चर की। तो अपन लद्दाख से अरुणाचल तक पांच एयरफोर्स लेंडिंग ग्राउंड तैयार कर चुके। पर बात सिर्फ सैन्य तैयारी की नहीं। बात कूटनीतिक जंग की भी। सो चीन भी यों ही सफाई देता नहीं घूम रहा। पता है चीन को भी- अमेरिका-जापान-रूस इस वक्त भारत के साथ। अपन कूटनीतिज्ञों की मानें। तो अग्नि-5 पर इस बार चिल्ल-पौं नहीं करेगा अमेरिका। अमेरिका भी तो चाहता है चीन के मुकाबले खड़ा हो भारत।

माना अपनी सैन्य तैयारियां पूरी नहीं। अपने सैनिकों की हिम्मत में कोई कमी नहीं। पर अपने सैनिक घुड़सवार तो नहीं। जो तलवार भांजते हुए दुश्मनों की छाती पर चढ़ दौड़ेंगे। इक्कसवीं सदी की जंग जहां आधुनिक हथियार मांगेगी। वहां अब कूटनीतिक जंग भी अहम हो चुकी। पहले बात हथियारों की। अपन एयर फोर्स और नेवी प्रमुखों से सहमत। हथियारों की तैयारियां चीन के बराबर नहीं। अपने हथियार सत्तर और अस्सी दशक के। पुराने हथियारों को बदलने की सख्त जरूरत। जरा गौर करिए। चीनी बार्डर पर तैनात हथियार 1974 की खरीद। हथियारों की मारक क्षमता सिर्फ पांच हजार फुट। जमीन से जमीन मारक क्षमता वाले हथियारों की बात करें। अपन ने पहली खरीद अस्सी के दशक में की। दूसरी नब्बे के दशक में। अग्रिम मार वाली तोपों की बात। तो अपन ने आखिरी खरीददारी 1995 में की। पहले बोफोर्स तोप घोटाले ने खरीददारी पर ब्रेक लगाई। फिर कारगिल के दौरान हुई छोटी-मोटी खरीद ने। दलाली की आरोपबाजी से नुकसान हुआ सैन्य तैयारी का। कई बार तोपों की खरीददारी करने का मामला उठा। पर बात कभी आखिर तक नहीं पहुंची। एक बार अपना इरादा होवित्जर तोपें खरीदने का था। होवित्जर विमान से कहीं भी उतारी जा सकती हैं। पर मंसूबे ही बनते रह गए।  डिफेंस मिनिस्टर डरते ही रह गए। दूसरी तरफ बात चीन की। हथियारों की बात तो छोड़ दीजिए। बार्डर तक इंफ्रास्ट्रक्चर भी मजबूत। लद्दाख सेक्टर में कराकोरम के पार की बात। चीन की कंस्ट्रक्शन गतिविधियां चौंकाने वाली। अपनी सारी गतिविधियों पर नजर रखने में सक्षम हो चुका चीन। इसी महीने पीएलए की हरकतों ने अपन को चौंकाया। ऐसा नहीं कि अपन फिक्रमंद नहीं। फिक्रमंद न होते। तो अपने वायु और नौसेनाध्यक्ष ऐसे नहीं बोलते। फिक्रमंद न होते। तो एमके नारायणन टॉप लेवल की मीटिंग क्यों बुलाते। यह अलग बात। जो मीटिग की खबर लीक हुई। तो सत्रह सितंबर की मीटिंग टल गई। पर मीटिंग टल जाए। तो यह न मानिए- अपन फिक्रमंद नहीं। अपनी तैयारियां अब दो तरफा होंगी। जिसका जिक्र अपन ने शुरू में किया। हथियारों की खरीद से भी। कूटनीतिक मोर्चेबंदी से भी। पहले बात वाजपेयी के जमाने की। वाजपेयी के वक्त एक थ्योरी चली थी- 'भारत-चीन-रूस गठबंधन की।' इस गठबंधन के लिए दो मीटिंगें भी हुई। पर मनमोहन सरकार बनते ही रणनीति बदल गई। अब अपन अमेरिका के ज्यादा करीब। सो चीन अपन से बेहद खफा। इसकी झलक अरुणाचल और लद्दाख बार्डर पर दिखी। सो अब बात अपनी दोतरफा तैयारी की। तो मनमोहन सरकार भले ही लापरवाह दिखे। पर ऐसा है नहीं। पहले बात नेवी की। अपन को विदेशी मामलों के अंदरूनी जानकार ने बताया- 'यों तो अपनी एटमी पनडुब्बी अरिहंत की तैयारी भी जोरों पर। पर रूसी एटमी पनडुब्बी भारत आने को तैयार।' अपन ने दस साल की लीज पर ली है पनडुब्बी। अपन ने लीज के 650 मिलियन डालर अदा किए। बुधवार को रूस ने ऐलान किया-'पनडुब्बी के ट्रायल का तीसरा चरण पूरा हो चुका। मार्च-अप्रेल तक भारत के सुपुर्द कर दी जाएगी।' बात अग्नि-5 मिसाइल की। तो उसकी तैयारियां भी पूरी। आप पूछोगे- अग्नि-4 कब तैयार हुई। तो बता दें- अग्नि-4 नहीं होगी। वह अग्नि-3 की ही एडवांस स्टेज। याद है अपन ने 2006 से 2008 तक अग्नि-3 के तीन टेस्ट किए। तो अब छह हजार किलोमीटर मारक क्षमता वाली अग्नि-5 की तैयारी। अग्नि-5 आते ही अपना पलड़ा भारी होगा। बात इंफ्रास्ट्रक्चर की। तो अपन लद्दाख से अरुणाचल तक पांच एयरफोर्स लेंडिंग ग्राउंड तैयार कर चुके। पर बात सिर्फ सैन्य तैयारी की नहीं। बात कूटनीतिक जंग की भी। सो चीन भी यों ही सफाई देता नहीं घूम रहा। पता है चीन को भी- अमेरिका-जापान-रूस इस वक्त भारत के साथ। अपन कूटनीतिज्ञों की मानें। तो अग्नि-5 पर इस बार चिल्ल-पौं नहीं करेगा अमेरिका। अमेरिका भी तो चाहता है चीन के मुकाबले खड़ा हो भारत।

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट