अब दोनों गठबंधनों को फिक्र चुनावों की

तो बीजेपी में शांति लौटने लगी। वसुंधरा ने बुखार के बहाने गच्चा दिया। तो भी राजनाथ सिंह का पारा नहीं चढ़ा। यों राजनाथ सिंह अब किनारे। वैसे पहले ही खुद पिक्चर में न आते। तो वसुंधरा भी खम न ठोकती। जैसे अब वेंकैया नायडू को सौंपा। सो वसुंधरा को ठीक होने तक मोहलत। यह बात सुनी। तो अपन को अजीत जोगी का किस्सा याद आया। बात पिछली लोकसभा की। छत्तीसगढ़ एसेंबली के चुनाव हुए। तो जोगी को सरकार बनने की उम्मीद थी। सो उनने एसेंबली चुनाव लड़ लिया। पर सरकार नहीं बनी। तो लोकसभा में रहने का इरादा था। पर सोनिया चाहती थी- एसेंबली में जाएं। जोगी अस्पताल में भर्ती हो गए। यही गलती कर दी उनने। पंद्रह दिन बाद लोकसभा की मेंबरशिप खत्म हो गई। जोगी की चालाकी काम नहीं आई। पर यह बात वसुंधरा पर लागू नहीं होगी। यह एसेंबली या लोकसभा का नहीं। अलबत्ता पार्टी का अंदरूनी मामला। सो निपट जाएगा। वेंकैया बोले- 'निपटा लेंगे, आप फिक्र न करें।' यह उनने मीडिया से कहा। जो बीजेपी पर ज्यादा ही मेहरबान। पर अपन बात कर रहे थे- बीजेपी में शांति लौटने की। राजनाथ से कुट्टी करके बैठे अरुण जेटली उनके घर गए। अलबत्ता पूरा आडवाणी खेमा पहुंचा। जेटली के साथ थे वेंकैया और सुषमा भी। तो इसे आप युध्दविराम समझिए। पहले जो मीटिंगें आडवाणी के घर होती थी। वह राजनाथ के घर हुई। जाते-जाते पूरा सम्मान देने का इरादा। राजनाथ, आडवाणी खेमा, रामलाल बैठे। तो सभी राज्यों की समीक्षा हो गई। जसवंत-सुषमा बैठक की विफलता पर बात भी हुई। जसवंत ने तो पीएसी चेयरमैन बने रहने का खम ठोक लिया। जो बीजेपी के बूते बने हैं। जसवंत को लेकर पार्टी में जो आम धारणा। उसे प्यारेलाल खंडेलवाल ने चिट्ठी लिखकर जाहिर किया। कहा- 'बर्खास्तगी पर पुनर्विचार हो। गुजरात में किताब पर लगी रोक भी हटे।' यों जसवंत ने मंगलवार को अदालत से मोदी सरकार को नोटिस दिला दिया। पर बात खंडेलवाल की। जो मुरली मनोहर जोशी खेमे के। यों फैसले के वक्त शिमला में जोशी भी थे। पर बात राजनाथ के घर हुई मीटिंग की। तय हुआ- हरियाणा, महाराष्ट्र के चुनाव दम-खम से लड़े जाएं। सो शुक्रवार को चुनाव समिति टिकटों का बंटवारा शुरू करेगी। हरियाणा में इस बार गठबंधन नहीं। सो सभी नब्बे सीटों पर लड़ने का इरादा। महाराष्ट्र में गठबंधन शिवसेना से बीस साल पुराना। गठबंधन में कोई पेंच भी नहीं। वही पुरानी 171-117 सीटों का फार्मूला। सीएम का फैसला बाद में देखा जाएगा। टिकटों के बंटवारे में नीतिन गडकरी-गोपीनाथ मुंडे में झकझक जरूर होगी। सो अब अपनी निगाह उसी पर। अपनी निगाह सोनिया-पवार पर भी। इस गठबंधन ने महाराष्ट्र में दस साल शासन कर लिया। पवार की बदौलत दस साल कांग्रेसी सीएम रहा। पवार ने चूं तक नहीं की। पिछली बार तो 124 सीटें लड़कर 71 जीतीं। पर कांग्रेस 164 लड़कर 69 पर अटक गई। फिर भी पांच साल कांग्रेसी सीएम झेला। दिग्गी राजा- सत्यव्रत चतुर्वेदी का तो अपन ने बताया ही था। दोनों यूपी-बिहार में गठबंधन के खिलाफ थे। सोनिया-राहुल ने दिग्गी-सत्यव्रत की बात मानी। बिहार में भले फायदा नहीं हुआ। पर यूपी में तो हुआ। सपा से बड़ी पार्टी बन गई। अब वही जोड़ी महाराष्ट्र में पवार से गठबंधन के खिलाफ। पर सोनिया रिस्क लेने के मूड में जरा नहीं। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी वाली नौबत न हो जाए। सो सोमवार को एके एंटनी निर्देश लेने गए। तो साफ निर्देश था- 'ले देकर खत्म करो। गठबंधन होना चाहिए।' एंटनी-पवार मुलाकात से पहले ही बात साफ हो गई। सो मंगलवार की रात एंटनी-पवार मिले। तो धुंध छंट चुकी थी। एंटनी ने डि-लिमिटेशन के बहाने ज्यादा का दावा जरूर किया। पर जिद्द का इरादा नहीं। अलबत्ता अबके मुख्यमंत्री की कुर्सी का फैसला बाद में हो। यह पवार की नई जिद्द। सोनिया यह जिद्द भी मानेगी। एंटी इनकंबेंसी कम नहीं। लोकसभा में तो राज ठाकरे ने फायदा पहुंचाया। कांग्रेस-राष्ट्रवादी गठबंधन न हुआ। तो राज ठाकरे भी क्या कर पाएंगे। ऊपर से चुनाव बाद पवार के विकल्प भी खुल जाएंगे। सो सोनिया रिस्क नहीं लेंगी।

कुछ राहत तो मिली ..एक ही तो

कुछ राहत तो मिली ..एक ही तो ढंग का विपक्षी दल है ...और उसमे भी ऐसी महाभारत ...सही है आपस में ही लड़ते भिड़ते रहे ...सरकार की नाकामियों पर आम जनता के साथ खड़े होने की फिक्र कौन करे ..!!

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