जूतम-पैजार के 'मंथन' से निकला जूतम-पैजार

बीजेपी के दिन अच्छे नहीं। वरना चिंतन-मंथन बैठक का ऐसा बंटाधार न होता। गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। इरादा था- हार के कारणों का मंथन करें। पार्टी में सुधार के बारे में चिंतन करें। पर गुटबाजी खत्म होने का सवाल ही नहीं। गोपीनाथ मुंडे ने मुंबई में मंथन से इंकार करके अच्छा ही किया। वरना महाराष्ट्र में चुनावी माहौल का वैसा ही बाजा बजता। जैसा शरद पवार-दिग्विजय की बयानबाजी से कांग्रेस-एनसीपी का। दिग्विजय सिंह ने फिर कहा- 'एनसीपी का कांग्रेस में विलय हो जाना चाहिए।' इस बार झल्लाकर शरद पवार बोले- 'अगर मैं कहूं, कांग्रेस का एनसीपी में विलय हो जाए। तो कैसा रहेगा।' पर अपन बात कर रहे थे बीजेपी की चिंतन-मंथन बैठक की। इरादा बंद कमरे में चिंतन-मंथन का था। बुलाए गए चुनिंदा पच्चीस लोग। प्रवक्ता कोई नहीं बुलाया गया। प्रेस से दूर रहने का ही इरादा था। पर सारी योजना का बंटाधार हो गया। प्रेस कांफ्रेंसें भी बुलानी पड़ी। सीक्रेट डाक्यूमेंट लीक भी हुए। बंटाधार की शुरूआत तो तभी हो गई। जब चिंतन-मंथन से पहले पार्लियामेंट्री बोर्ड बुलाना पड़ा। आखिर जसवंत सिंह को ठिकाने लगाने का इससे बढ़िया मौका क्या होता। ये तीन दिन बीत जाते। तो लोहा ठंडा हो जाता, ठंडे लोहे पर चोट का असर नहीं होता। सो जसवंत विरोधियों ने 18 की रात ही खिचड़ी पका ली। रातों-रात दस जून 2005 का प्रस्ताव निकाला गया। यह उस वक्त की बात। जब आडवाणी कराची में जिन्ना को सेक्युलर बताकर लौटे थे। तब बीजेपी ने अपने प्रस्ताव में कहा था- 'भारत-पाक बंटवारे के लिए जिन्ना जिम्मेदार।' यह लाइन जसवंत सिंह के खिलाफ कार्रवाई को काफी थी। आखिर भारत-पाक बंटवारे पर ही तो बात की है जसवंत ने। उनने लिखा है-'बंटवारे के लिए जिन्ना के साथ ब्रिटेन और नेहरू-पटेल भी जिम्मेदार थे।' जसवंत सिंह जिन्ना के साथ नेहरू को जिम्मेदार ठहराते। तो संघ परिवार में बवाल होता ही नहीं। बवाल तो सिर्फ सरदार पटेल के कारण हुआ। वैसे जसवंत सिंह गुरुवार को कह रहे थे- 'बिना पढ़े ही निकाल दिया। बताएं तो सही- पटेल के बारे में क्या लिखने पर निकाला। पटेल का जिक्र तो सात-आठ जगह पर।' जसवंत सिंह के सवालों में सबसे बड़ा सवाल- 'बुध्दि पर ताला लगाकर बैठने का।' उनने अपनी तुलना सलमान रुश्दी से की। जसवंत सिंह के लिखने पर कार्रवाई तालिबानीकरण जैसी ही। पर बात चिंतन-मंथन बैठक के बंटाधार होने की। सारी रणनीति धरी रह गई। अरुण जेटली को बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ी। जसवंत पर जवाब देने के लिए जेटली से बढ़िया होता भी कौन। चुनावी हार के बाद जसवंत का पहला  हमला जेटली पर ही था। जसवंत चाहते थे- लोकसभा से इस्तीफा देकर राज्यसभा में विपक्ष के नेता बने रहें। आडवाणी ने जेटली को नेता बना दिया। तो उनने 'परिणाम और पुरस्कार' के जुमले से जेटली पर हमला किया। वैसे बाल आप्टे की रपट में भी जेटली कटघरे में। जेटली का चुनावी मैनेजमेंट फिस्स साबित हुआ। वैसे जेटली को कोई काम करने देता। तो वह करके दिखाते। फाइनेंस तो किसी और के हाथ था। वैसे भी जब बाल आप्टे को हार की समीक्षा करने को कहा गया। अपन तभी समझ गए थे- चुन-चुनकर आडवाणी खेमे पर प्रहार होंगे। तो सबसे पहले जेटली होंगे ही। आखिर जेटली-राजनाथ बीच चुनाव भी तलवारें भांजते रहे। नरेंद्र मोदी भी तो आडवाणी खेमे के। बीच चुनाव में मोदी का नाम पीएम पद के लिए उछला। वह भी कैडर को कंफ्यूज कर गया। वरुण गांधी का किस्सा भी बंटाधार को काफी था। बाल आप्टे की रपट पर भले जेटली यह कहकर पल्ला झाड़ गए- 'ऐसी कोई रपट है ही नहीं।' पर कबूतर के आंख बंद करने से बिल्ली नहीं भागती। रपट का लीक होना गुटबाजी का ताजा सबूत। रपट आडवाणी खेमे के खिलाफ न होती। तो लीक भी न होती। यानी बीजेपी नेताओं में जूतम-पैजार जारी था, जारी है, जारी रहेगा।

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