वाजपेयी को ढाल बनाकर पतली गली से निकले पीएम

यों तो मनमोहन पर भारी पड़े यशवंत सिन्हा। सिन्हा ही क्यों। मुलायम और शरद यादव भी। याद है गिलानी के साथ साझा बयान। अपन ने तेईस जुलाई को लिखा था- 'देखते हैं 29 जुलाई को संसद में क्या जवाब देते हैं मनमोहन।' सो 29 जुलाई को विदेशनीति पर बहस भी हो गई। मनमोहन का जवाब भी हो गया। विपक्ष भले सहमत नहीं हुआ। संतुष्ट भी नहीं हुआ। पर पिछली बार की तरह वाकआउट भी नहीं हुआ। भले मनमोहन बाहर जाकर कूटनीति में हार गए। पर यहां बैक डोर डिप्लोमेसी काम कर गई। वरना पीएम के इतने लच्चर जवाब पर वाकआउट न हो। अपन को हजम नहीं हुआ। कहां तो मुलायम कह रहे थे- 'जो गलती कर आए हो। जो दस्तखत कर आए हो। उसे कूड़ेदान में फेंकिए।' कहां शरद यादव कह रहे थे- 'आपने बलूचिस्तान का जिक्र ही क्यों किया। आपने 26 नवंबर के बाद बनी राजनीतिक सहमति क्यों तोड़ी।' यशवंत सिन्हा ने तो खिंचाई की कोई कसर नहीं छोड़ी। यहां तक कह दिया- 'शर्म-अल-शेख में आप शर्मनाक कर आए। आपको उस पर शर्म आनी चाहिए। सात समंदरों का पानी भी वह शर्म नहीं धो सकता।' और कहां लच्चर से जवाब पर चुप रहा विपक्ष। सुषमा स्वराज ने पीएम से सवाल भी किया। तो जी-8 की गुस्ताखियों पर। पर पीएम के जवाबनुमा दखल के बाद भी बहस जारी रही। मामला विदेश मंत्रालय का हो। तो जवाब विदेशमंत्री को ही देना था। पीएम ने अपने दखल के दौरान कहा भी- 'बाकी बातों का जवाब विदेश मंत्री देंगे।' पर विदेश मंत्री का तो जवाब ही नहीं हुआ। बहस का ऐसा बुरा हश्र अपन ने पहले नहीं देखा। इतना लुंज-पुंज विपक्ष भी अपन ने पहले नहीं देखा। कहां तो राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च कर आए। वक्त आया तो चुप्पी साधकर बैठ गए। बहुत शोर सुना था पहलू में, जो चीरा तो कतरा-ए-खूं न निकला। मनमोहन कांग्रेस को संतुष्ट कर लेंगे। यह तो अपन को पता ही था। अपन ने 28 जुलाई को यहीं तो लिखा था- 'अब वह 29 को संसद में सफाई देंगे। फिर 30 को कांग्रेसी सांसदों को भी सफाई दें। इसके बाद सोनिया समर्थन करेंगी।' पर अब आज मनमोहन सफाई नहीं देंगे। उनने सफाई से पहले ही बंदोबस्त कर लिया। जब बुधवार को विदेश सचिव मेनन ने कांग्रेसी सांसदों को समझाया। वैसे मेनन साझा बयान के बूरे ड्राफ्ट की बात कबूल चुके। शरद यादव ने तो इस बात पर भी पीएम की खिंचाई की। पर बात पीएम की संसद में दी गई सफाई की। तो मनमोहन ने कहा- 'पाक से हालात तब तक सामान्य नहीं होंगे। जब तक वाजपेयी से किया वादा नहीं निभाता।' तो क्या वाजपेयी का नाम सुन पिघल गई बीजेपी। वाजपेयी को ढाल बनाकर पतली गली से निकल गए मनमोहन। पर मनमोहन ने दोधारी तलवार भी चलाई। यह भी कहा- 'पाक ने मान लिया है- उसकी धरती से साजिश रची गई। उसी की जमीन से आतंकवाद हुआ। हमने एनडीए से ज्यादा हासिल कर लिया।' मतलब था- संसद पर हमले के बाद एनडीए ने क्या हासिल किया। वैसे मनमोहन भूल गए। वाजपेयी के साथ वादा कम बड़ी उपलब्धि नहीं थी। जिसे उनने अपने बचाव की ढाल बनाया। यों मनमोहन ने विदेशनीति की सहमति तोड़ी। यशवंत सिन्हा बोले- 'पहले एटमी करार। फिर ग्लोबल वार्मिंग पर घुटने टेकना। साझा बयान में आतंकवाद पर पीछे हटना। बलूचिस्तान का जिक्र। फिर एंड यूज समझौता। विदेशनीति पर सहमति के चारों खंभे तोड़ दिए।' पर मनमोहन बोले- 'मैंने कोई सहमति नहीं तोड़ी। समग्र वार्ता शुरू नहीं होगी। सिर्फ सेक्रेट्री-मंत्री स्तर की बात। वह तो पहले भी हो रही थी। संसद पर हमले के बाद वाजपेयी ने भी की। सो आतंकवाद से कैसे निपटें। यह यूपीए को एनडीए से नहीं सीखना।' पर असल बात। जो अभी भी कांग्रेसियों के पल्ले नहीं पड़ी होगी। बलूचिस्तान की। मनमोहन की सफाई वही पुरानी थी। नई बात थी, तो सिर्फ इतनी- 'बलूचिस्तान पर कोई डोजियर नहीं मिला।' कोई बात नहीं। नहीं मिला, तो मिल जाएगा। गिलानी ने इस्लामाबाद लौटते ही कहा था- 'बलूचिस्तान में आतंकवाद के सबूत देंगे।' यशवंत सिन्हा ने चेतावनी दी- 'अब पाक हर मंच पर तोहमत लगाएगा। हमें सुनना पड़ेगा।'

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