आंकड़ों की बाजीगिरी में तो महंगाई है ही नहीं

अपन ने पच्चीस जून को लिखा था- ‘कांग्रेस में बारी रेवडियों की, बीजेपी में बदलाव की।’ तो गवर्नरी रूपी रेवड़ियां बंटती-बंटती अटक गई। यूपी के गवर्नर टीवी राजेश्वर की टर्म आठ जुलाई को खत्म हो गई। पर बदलाव का फैसला नहीं हुआ। सो जब तक नया गवर्नर न आए। तब तक राजेश्वर बने रहेंगे। अपन समझते थे राजेश्वर को एक टर्म और मिलेगी। पर अब ऐसा नहीं लगता। सोनिया का इरादा सारे घर के बदल डालने का। बलराम जाखड़ तो अबोहर के पास पंजकोसी में जाकर बैठ चुके। अगले महीने पंडित नवल किशोर शर्मा भी रिटायर होंगे। पर बीजेपी में बदलाव शुरू हो चुका। राजनाथ सिंह ने गुरुवार को तीन प्रदेश अध्यक्ष बदल डाले। राजस्थान-हरियाणा में तो पार्टी का बंटाधार हुआ था। सो प्रदेश अध्यक्ष बदले जाने थे। माथुर और मनचंदा इस्तीफे दे चुके थे। बंटाधार वाले यूपी में रमापति राम भी बदले जाएंगे। पर ब्राह्मण की जगह ब्राह्मण की खोज जारी। अब यूपी में सबको ब्राह्मणों की फिक्र। ऐसा नहीं जो सिर्फ हार पर ठीकरा फूटे। हिमाचल में तो बीजेपी जीती थी। तो वहां प्रदेश अध्यक्ष जयराम ठाकुर को ईनाम मिला। वह मंत्री हो गए। तो बंजार के एमएलए खीमी राम अध्यक्ष हो गए। जाट बहुल हरियाणा में कोई जाट अध्यक्ष बनाते। तो भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और चौटाला के आगे बौने ही होते। बीजेपी के किसी जाट को कोई क्यों अहमियत देगा। सो वहां गुर्जर अध्यक्ष बनाकर राजस्थान के गुर्जरों को भी इशारा। बात राजस्थान की। तो अपन ने 25 जून को ही लिखा था- ‘माथुर की जगह अरुण चतुर्वेदी होंगे। मदन दिलावर या सतीश पूनिया।’ तो अपना पहला इशारा अरुण चतुर्वेदी की ओर ही था। सो वही हुआ। गुरुवार को उनकी तैनाती भी हो गई। पर बात चल रही थी गवर्नरों की। गवर्नरों के साथ कांग्रेस महासचिव भी बनेंगे। यों सोनिया गांधी को इतनी जल्दी भी नहीं। सुनते हैं संसद सत्र के बाद ही तैनातियां होंगी। संसद सत्र में वैसे भी कम झमेले नहीं। अब देखो, यूपीए के दो नेताओं में कैसे जूतम-पैजार की हालत। लालू भले केबिनेट में नहीं। पर हैं तो यूपीए में। ममता को इस बात की फिक्र नहीं। उनने गुरुवार को भी लालू पर हमला जारी रखा। व्हाइट पेपर तो जब आएगा तब आएगा। उनने संसद में खुलासा कर दिया- ‘नब्बे हजार करोड़ सरप्लस की बात में जरा दम नहीं। खर्चे निकालकर रेलवे के पास हैं सिर्फ 8361 करोड़ सरप्लस।’ कांग्रेस को ममता का फंडा समझ नहीं आ रहा। ममता ने लालू की पोल व्हाइट पेपर में खोल दी। तो लालू का कुछ बिगड़े न बिगड़े। बिगडेग़ा मनमोहन सिंह का। जिनके नाक के नीचे लालू आंकड़ों से हेराफेरी करते रहे। किसी केबिनेट मंत्री ने आंकड़ों से हेराफेरी की हो। तो पीएम कैसे बचेंगे। मनमोहन तो लालू की तारीफ करते नहीं थकते थे। पर गुरुवार को ममता ने भरे सदन में आंकड़ों का बाजा बजा दिया। बात आंकड़ों की चली। तो महंगाई पर सरकारी आंकड़े बताते जाएं। टमाटर 40 रुपए किलो हो गए। खीरा तीस रुपए किलो। आलू-प्याज बीस रुपए। पांच रुपए किलो वाला तरबूज पैंतीस रुपए किलो। आम भी तीस-पैंतीस से नीचे नहीं आ रहे। दालें भी सत्तर-अस्सी के रेट में। पर सरकार कहती है- ‘महंगाई है ही नहीं।’ अपने यहां मुद्रास्फीति ही महंगाई नापने की मशीन। सो गुरुवार की ताजा मुद्रास्फीति थी शून्य से नीचे। यों तो कई हफ्तों से ही शून्य से नीचे। गिरावट थम नहीं रही। गुरुवार का आंकड़ा रहा माइनस 1.55 अंक। अपन आम भाषा में बात करें। तो जितनी महंगाई होनी चाहिए, उससे कम। अब पता नहीं क्या भाव टमाटर चाहते हैं प्रणव बाबू। ऐसे सरकारी आंकड़ों पर अब क्या भरोसा करें।

Leave a Reply

 

You can use these XHTML tags: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <blockquote cite=""> <code> <em> <strong>