क्या केन्द्र लालगढ़ को मानेगा आर्गेनाइज्ड क्राइम

यों गुजकोक और लालगढ़ में कोई समानता नहीं। पर समानता इस लिहाज से। गुजकोक आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ बिल। लालगढ़ आर्गेनाइज्ड क्राइम का सबूत। पहले बात गुजकोक की। बात उन दिनों की। जब अक्षरधाम में आतंकी हमला हुआ। तब मोदी ने महाराष्ट्र के मकोका जैसा बिल पास करवाया गुजकोक। यानी- 'गुजरात कंट्रोल ऑफ आर्गेनाइज्ड क्राइम।' आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ दुनियाभर में कानून बने। वैसे जरूरी नहीं, जो सब जगह 'आर्गेनाइज्ड क्राइम' शब्द का इस्तेमाल हो। जैसे इटली में नहीं। पर क्रिमिनल एसोसिएशन का जिक्र है। इटली के संविधान की धारा 416 में लिखा है- 'जब तीन या ज्यादा जने एक से ज्यादा क्राइम के लिए इकट्ठे हों। तो उन्हें तीन से सात साल की सजा होनी चाहिए।' अमेरिका, जापान, इंग्लैंड में भी आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ अलग कानून। अपन दूर क्यों जाएं। अपने महाराष्ट्र में भी 1999 में बना मकोका। महाराष्ट्र ही क्यों। कर्नाटक, आंध्र और दिल्ली में भी आर्गेनाइज्ड क्राइम के खिलाफ कानून। पर जब नरेंद्र मोदी ने बिल पास करवाया। तो केन्द्र ने बार-बार फच्चर फंसाया। पहला फच्चर तो तभी फंसा। जब वाजपेयी पीएम थे। होम मिनिस्ट्री की कुर्सी पर आडवाणी विराजमान थे। अपन याद दिला दें- एसेंबली ने बिल पास किया था 2003 में। वाजपेयी सरकार ने 2004 के शुरू में कुछ सुझावों के साथ बिल वापस भेजा। तो लौट कर आते-आते वाजपेयी सरकार लद गई। तब से कुंडली मारे बैठी रही मनमोहन सरकार। मोदी-पाटिल में कई बार टकराव भी हुआ। केस गुजरात हाईकोर्ट में भी गया। पर मनमोहन सरकार ने न बिल को मंजूरी दी। न वापस भेजा। केबिनेट में गहरे मतभेद जो थे। मोदी ने चुनावों में भी गुजकोक को मुद्दा बनाया। कांग्रेस कोई जवाब नहीं दे पाई। पर अब जब चुनाव जीत गई। तो हिम्मत आ गई। सो शुक्रवार को केबिनेट ने बिल लौटाने की सिफारिश कर दी। पी. चिदंबरम ने बताया- 'केबिनेट ने तीन संशोधन सुझाए हैं।' सबसे बड़ा ऐतरात तो पुलिस अफसर के सामने दिए बयान पर। यों बताते जाएं- महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली के कानूनों में यह मौजूद। अब बात लालगढ़ की। तो कम्युनिस्टों के बंगाल में अब लालगढ़ हो गया। सिंगूर, नंदीग्राम और लालगढ़ में ज्यादा फर्क नहीं। सिंगूर-नंदीग्राम में भी सीपीएम की ढींगामुश्ती ने लोगों को खड़ा किया। लालगढ़ में भी हू-ब-हू वही हुआ। बात दो नवंबर 2008 को शुरू हुई। रामविलास पासवान तब मंत्री हुआ करते थे। वह गए थे जिंदल इस्पात परियोजना का उद्धाटन करने। तो उनके साथ बुध्ददेव भट्टाचार्या भी हो लिए। लौट रहे थे। तो काफिले पर नक्सली हमला हुआ। काफिला तो निकल गया। पर सीपीएम का गुब्बार निकला। इलाके के आदिवासियों पर। बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुई। स्कूली बच्चों से लेकर टीचर तक। जवानों से लेकर बूढ़ों तक। सीपीएम वर्करों और पुलिस ने किसी को नहीं बख्शा। आठवीं में पढ़ने वाला कुरमु हो। या उसे पढ़ाने वाला क्षमानंद। बूढ़ी महिला सीतामणि मुर्मु हो या जवान छीतामणि। किसी का हाथ तोड़ दिया। तो किसी की आंख निकाल दी। सिंगूर-नंदीग्राम में लोगों की जमीन छीनी थी। तो भूमि उच्छेद विरोधी कमेटियां बनी। लालगढ़ में पुलिस अत्याचार हुआ। तो वहां पुलिस संत्रास प्रतिरोध जनजागरण कमेटी बनी। सिंगूर-नंदीग्राम में तृणमूल कांग्रेस कूद पड़ी थी। तो लालगढ़ में नक्सलवादी कूद पड़े। उन्हें नक्सलवादी कहिए या माओवादी। सीपीएम से टूटकर ही बने हैं दोनों। सो उनका तरीका वही। जो 32 साल से सत्ता के लिए लेफ्ट अपनाती रही। जिसे लेफ्ट सरकार ने सिंगूर-नंदीग्राम में अपनाया। अब लालगढ़ में अपनाया। जैसे अपन ने लालगढ़ और गुजकोक की समानता बताई। वैसे ही सिंगूर-नंदीग्राम-लालगढ़ जैसी समानता मालेगांव की भी। मालेगांव को भले आप हिंदू आतंकवाद कहिए। पर था नरम सरकारी नीति के खिलाफ हिंदू गुस्से का विस्फोट। लालगढ़ को भले आप नक्सलवादी या माओवादी हिंसा कहें। पर है वामपंथी सरकार के खिलाफ आदिवासी गुस्से का विस्फोट।

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