जनाक्रोश और जनतंत्र

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अन्ना  टीम के सदस्य और प्रसिध वकील प्रशांत भूषण के चेम्बर में घुस कर तीन युवकों ने उनकी पिटाई कर दी. जिस की जितनी निंदा की जाए कम है. जनतंत्र में ऐसी हिंसा की इजाजत नहीं दी जा सकती. उनका कसूर सिर्फ यह था कि उन्होंने कश्मीर पर एक ऐसा बयान दे दिया था, जो इन युवकों को पसंद नही था. वह बयान ज्यादतर भारतीयों को पसंद नहीं आया होगा. बिना लाग-लपेट बयान को प्रस्तुत करें तो उन्होंने कहा था कि कश्मीरियों को साथ रखने की कोशिश करनी चाहिए, लेकिन अगर वे साथ नहीं रहना चाहें तो उन्हें अलग होने देना चाहिए. कश्मीर की समस्या देश का सिर दर्द बन चुकी है, कश्मीर समस्या का हल हर कोई चाह्ता है. इसके बावजूद यह कोई भारतीय नहीं चाह्ता कि कश्मीर को भारत से अलग होने दिया जाए. प्रशांत भूषण का यह बयान निश्चित ही हर भारतीय की भावना के खिलाफ है. ऐसे बयानों पर मीडिया भी ज्यादा तव्वज्जो नही देता, खासकर अंग्रेजी मीडिया भारत विरोधी बयानबाजी को बोलने की आजादी का हिस्सा मानता है. सो मीडिया ने तव्वज्जो नही दी. तीन साल पहले जब अरूंध्ती राय ने इससे मिलता जुलता बयान दिया था, तो अंग्रेजी मीडिया ने उन्हें हीरो बना कर पेश किया था. देश की जनभावना के खिलाफ बयानबाजी को बोलने की आजादी और जनतंत्र बताने का नया जनवादी फैशन शुरू हुआ है. सत्तर के दशक में अंग्रेजी के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने अमेरिका की शय पर एक मुहिम शुरू की थी. मुहिम यह थी कि कश्मीर की मौज़ूदा नियंत्रण रेखा को भारत-पाक की सीमा रेखा बना दिया जाए. अटल बिहारी वाजपेई ने जब कश्मीर समस्या को हल करने की दिशा में काम करना शुरू किया तो यह थ्योरी फिर निकल कर बाहर आ गई थी. ऐसी थ्योरी और ऐसी बयानबाजी करने वालों को भारतीय भावनायों का ना सही कम से कम भारतीय संसद और संविधान की सर्वोच्ता का तो ख्याल रखना चाहिए. कश्मीर, संविधान   के तहत भारत का अभिन्न अंग है और भारतीय संसद ने भी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए पाक कब्जे वाले कश्मीर को वापिस हासिल करने का सर्वस्म्मत प्रस्ताव पास किया हुआ है. जनभावना, संविधान और संसद को ताक पर रख कर बयानबाजी रोकने का भी तो कोई बंदोबस्त होना चाहिए या नहीं. कानून अपने हाथ में लेने का किसी को हक नहीं दिया जा सकता, फिर चाहे वह श्रीराम सेने हो या शिव सेना या चुनी हुई सरकारें या राजनीतिक दल. लेकिन जनाक्रोश पैदा करने वालों से निपटने का भी तो कोई कानून हो, जिस  का कडाई से पालन भी किया जाए. फिर वह प्रशांत भूषण हो, अरूंध्ती राय हो, या मीर  वायज़ उमर फारुख.

सरकारों को भी जनभावनाओं का उतना ही ख्याल रखना चाहिए. कश्मीर और पूर्वोत्तर में जिस प्रकार दो दशक से सशत्र बलों को विशेष अधिकार दे रखे हैं, वह कंहा का लोकतंत्र है. सशस्त्र बलों की  ओर से इन अधिकारों के दुरुपयोग की खबरें आए दिन आती रह्ती हैं. मणिपुर में शर्मिला पिछ्ले एक दशक से आमरण अनशन पर हैं. डाक्टर कोर्ट के आदेश पर शर्मिला को जबरदस्ती नाक  के जरिए तरल भोजन  दे रहे हैं. जब शर्मिला ने अनशन शुरु किया था तब केंद्र में एनडीए की सरकार थी. यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल चल रहा है, लेकिन किसी सरकार के कान पर जूं नही रेंगी. कश्मीर हो या पूर्वोत्तर का कोई राज्य सेना और अर्धसेनिक बल इस कानून का बेजा इस्तेमाल कर रहे हैं. जनक्रोश बढ रहा है. कभी मुख्यमंत्री उमर अब्दुला कश्मीर से दबाव डालते हैं,कभी पूर्वोत्तर से दबाव पडता हैं लेकिन सरकार निर्णय नही ले पाती क्योंकि सेना नही मानती. अगर चुनी हुई सरकार जनभावनाओं की उपेक्षा करेगी, तो जनाक्रोश बढेगा ही.  मणिपुर में ही पिछ्ले कई महीनों से कुकी और नगा समुदाय में जिले के निर्माण को लेकर आंदोलन चल रहा है. आंदोलनकारियों ने राज्य के प्रवेश द्वारों की नाकेबंदी कर रखी है. नतीजतन खाने पीने तक के सामान की तंगी हो चुकी है, ऐसा लगता है, जैसे सरकार नाम की कोई चीज ही नही है. जनाक्रोश किसी भी तरह का हो, उसे थामना सरकारों की जिम्मेदारी होती है. अगर सरकारें नाकाम हो जाती हैं तो हिंसा बढती है. तेलंगाना का आंदोलन उसी तरफ बढ रहा है. देश में कोयले की कमी से बिजली की समस्या शुरु हो चुकी है. यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद अपने जन्मदिन पर बधाई  देने गए तेलंगाना के कांग्रेसी सांसदों को अलग राज्य का तोहफा दिया. उससे मुकरना  नाइंसाफी के साथ साथ सरकार की तरफ से जनाक्रोश को बढावा देना है, ऐसी बातें ही जनतंत्र को कमजोर करती हैं. इसी तरह अब तमिलनाडू के न्यूकिल्यर प्लांट के विरोध मे चल रहे आंदोलन के साथ हो रहा है, केंद्र सरकार जनता की आशंकाएं दूर करने की बजाए आंदोलन को कुचलने की कोशिश कर रही है, राज्य की मुख्यमंत्री खुल कर आंदोलनकारियों के साथ खडी हो गई हैं. जनाक्रोश किसी की राष्ट्रविरोधी बयानबाजी से पैदा हो या सरकार की अर्कमन्यता या ढुलमुल नीतियों से, सही समय पर और जनतांत्रिक तरीकों से नही निपटा जाएगा तो जनाक्रोश बढता ही जाएगा. जनतंत्र की मजबूती के लिए जनभावनाओं के अनुरूप सरकारें काम नही करेंगी, तो जनता उन सरकारों को उखाड फैंकेगी, यही जनतंत्र है.