जांच की सियासत

जनसत्ता, 22 नवंबर, 2011 : राजनीतिक गलियारों में लोग कहते सुने जाते हैं, राज तो कांग्रेस को ही करना आता है। कौन-सी चाल कब चलनी है, इस मामले में बाकी सब अनाड़ी हैं। मायावती चाहे लाख बार सवाल उठाती रहें कि जयराम रमेश की चिट्ठियां और गुलाम नबी आजाद के आरोपों की बाढ़ चुनावों के वक्त ही क्यों। भारतीय जनता पार्टी भी चाहे जितने आरोप लगाए कि राजग कार्यकाल के स्पेक्ट्रम आबंटन पर एफआईआर सीबीआई का बेजा इस्तेमाल है, पर यह कांग्रेस को ही आता है कि लालकृष्ण आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रथयात्रा के समापन आयोजन की हवा कैसे निकालनी है। आडवाणी की भ्रष्टाचार विरोधी रैली और संसद के शीत सत्र से ठीक पहले प्रमोद महाजन के मंत्रित्व-काल के स्पेक्ट्रम घोटाले की एफआईआर ने विपक्ष के हथियार भोंथरे कर दिए।

इस बहाने अण्णा हजारे, बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर को भी बता दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में कोई दूध का धुला नहीं। तीनों बाबा किसी राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाने की कोशिश न करें। स्पेक्ट्रम घोटाले की नई एफआईआर का न्यायिक नतीजा तो जब निकलेगा तब निकलेगा। भले ही वर्षों की न्यायिक जंग के बाद सीबीआई के केस की हवा निकल जाए, पर फिलहाल तो कांग्रेस को राजनीतिक फायदा मिलेगा ही। अब संसद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर वामपंथी और दक्षिणपंथी विपक्षी दलों की एकता शायद ही दिखे।

सिर्फ सीबीआई का नहीं, सरकारी योजनाओं और सरकारी कोष का भी चुनावों के समय पार्टी-हित में इस्तेमाल करना कांग्रेस को खूब आता है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की मुहिम शुरू करते ही अल्पसंख्यक, पिछड़े, अनुसूचित जाति और जनजाति मतदाताओं को लुभाने की योजनाओं का पिटारा खुलना शुरू हो गया है। आचार संहिता लागू होने से पहले हजारों करोड़ की दर्जनों योजनाओं का एलान होगा। केंद्र सरकार की इन योजनाओं का श्रेय कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को दिया जाएगा। विभिन्न मंत्रालयों में तैयारी कर ली गई है। एलान से पांच-सात दिन पहले राहुल गांधी मांग शुरू करेंगे और मांग के पक्ष में माहौल बनाया जाएगा। फिर एकाएक केंद्र से कोई मंत्री उत्तर प्रदेश पहुंचेगा और कई हजार करोड़ के पैकेज का एलान हो जाएगा।

बुनकरों को पैकेज देने पर भला किसको एतराज हो सकता है। हस्तकला की यह प्राचीन विद्या लुप्त होने के कगार पर है। सैकड़ों सालों से विरासत में मिले पारंपरिक हुनर के बल पर जीविका चलाने वाले बुनकर आर्थिक उदारीकरण और आधुनिक चकाचौंध में जीवन-मरण का संघर्ष कर रहे हैं। जो बात केंद्र सरकार को 1991 में उदारीकरण शुरू करते ही समझ आनी चाहिए थी, वह अब उसके दिमाग में आई है। मगर बुनकरों के पैकेज के वक्त पर तो सवाल उठेगा ही। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री आनंद शर्मा ने इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर उन्नीस नवंबर को बनारस जाकर बुनकरों को 6,234 करोड़ रु. के राहत पैकेज का एलान किया। वैसे यह पैकेज देश भर में फैले चौदह लाख हथकरघा बुनकरों और बुनकरों की पंद्रह हजार सहकारी समितियों के लिए है। लेकिन बनारस के चौकाघाट बुनकर सेवा केंद्र में जाकर एलान करने का राजनीतिक मतलब कौन नहीं समझ सकता!

देश भर में फैले कुल चौदह लाख बुनकरों में से पांच लाख सिर्फ उत्तर प्रदेश में हैं। इनमें भी ज्यादातर अल्पसंख्यक हैं। मुलायम और मायावती से अल्पसंख्यकों को छीनना है। चुनावों में राजनीतिक फायदा उठाने के लिए केंद्रीय बजट को डांवांडोल करने में भी कोई परहेज नहीं किया जाता। प्रणब मुखर्जी द्वारा पेश किए गए बजट में बुनकरों के लिए तीन हजार करोड़ रुपए का पैकेज था। नया बजट आने में अब बस तीन महीने बचे हैं, लेकिन उस पर अभी तक अमल नहीं हुआ। अलबत्ता तीन हजार करोड़ की राशि को बढ़ा कर 6234 करोड़ कर दिया गया। इसे लागू भी पहली जनवरी से किया जाएगा ताकि पैसे का बंटवारा चुनावों के वक्त हो।

बुनकरों के पैकेज से पहले राहुल गांधी का बयान कांग्रेस की चुनावी राजनीति का ही हिस्सा था। उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ों की पैंतीस हजार नौकरियों के रिक्त पद भरने का दांव भी कांग्रेस ने चला है। अजित सिंह 2009 का लोकसभा चुनाव भाजपा से मिल कर लडे थे। भाजपा की सरकार नहीं बनी, तो 2009 से ही कांग्रेस के पाले में जाने के लिए हाथ-पांव मार रहे थे। शर्त एक ही थी कि केंद्र में मंत्री बन जाएं। अब हो सकता है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले-पहले कांग्रेस उनका यह मंसूबा पूरा कर दे।

जहां तक सीबीआई के दुरुपयोग का मामला है तो कांग्रेस के तौर-तरीकों से वाकिफ होने के बावजूद भाजपा ने खुद अपना सिर ओखली में दिया। कांग्रेस जांच एजेंसियों का कैसे दुरुपयोग करती है उसका सबूत तो तभी मिल गया था जब राष्ट्रमंडल खेल घोटाले का गुबार उठा, तो बजट सत्र से ठीक पहले भाजपा नेता सुधांशु मित्तल के घरों पर आयकर विभाग ने छापे डाल दिए। इसके बावजूद भाजपा ने 1999 से ही स्पेक्ट्रम आबंटन की जांच पर हामी भर दी थी।

अब आप सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो आॅफ इन्वेस्टीगेशन कहें या कुछ और। यूपीए सरकार ने राजग शासनकाल के दो आला अफसरों श्यामल घोष और जेआर गुप्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके इस हमाम में सबके नंगे होने का एलान कर दिया है। एफआईआर में प्रमोद महाजन का नाम नहीं लिया गया। लेकिन यह कहा गया है कि इन दोनों अफसरों ने मंत्री के साथ मिल कर दो कंपनियों वोडाफोन और एयरटेल को फायदा पहुंचाने की साजिश रची। राजनीतिक गलियारों में चर्चे तो यहां तक हैं कि प्रमोद महाजन के बाद जांच की आंच अरुण शौरी तक पहुंचेगी।

यह मामला 31 जनवरी 2002 को उपरोक्त दोनों कंपनियों को अतिरिक्त स्पेक्ट्रम आबंटन का है। सीबीआई का कहना है कि यह फैसला जल्दबाजी में एक ही दिन में किया गया। जबकि श्यामल घोष ने जेपीसी के सामने पेश होकर कहा है कि यह फैसला एक ही दिन में नहीं, अलबत्ता सोच-समझ कर तथ्यों के आधार पर किया गया। यह तथ्य उससे पहले के एक साल में विकसित हुए हालात थे जिनके मुताबिक दिल्ली और मुंबई में मोबाइल फोन की तादाद इतनी ज्यादा बढ़ गई थी कि सिग्नल कमजोर पड़ने लगे थे और बात होते-होते कनेक्शन कटने की नौबत आने लगी थी। मजेदार बात यह है कि यूपीए सरकार के तीन दूरसंचार मंत्रियों- शकील अहमद, ज्योतिरादित्य और गुरुदास कामत- ने संसद के दोनों सदनों में दिए अपने बयानों में जरूरत के मुताबिक स्पेक्ट्रम के अतिरिक्त आबंटन को जायज, कानूनन वैध और मूल आबंटन के समय हुए समझौते के अनुरूप बताया था। सीबीआई को अदालत में फटकार खाने की आदत पड़ चुकी है। पर राजनीतिक आकाओं के इशारे पर उनके विरोधियों को लपेटे में लेना शायद सीबीआई की मजबूरी बन चुकी है।

पुलिस और सीबीआई के दुरुपयोग का ताजा मामला सांसदों की खरीद फरोख्त का है। इस तरह का पहला कांड 1993 में हुआ था, जब नरसिंह राव के सिपहसालारों ने झारखंड मुक्ति मोर्चा के चार सांसदों को खरीदने की योजना को अंजाम तक पहुंचाया था। अदालत में खरीद-फरोख्त साबित भी हो गई थी। पर संसद की सर्वोच्चता किसी को भी सजा दिलाने में आड़े आ गई। दूसरा कांड भी ऐसा ही है। अदालत ने तब संसद से बाहर हुई खरीद-फरोख्त को संसद के भीतर अपनाए गए सांसदों के रुख के साथ जोड़ने से इनकार कर दिया था। तो भाजपाई सांसदों ने अपनी खरीद-फरोख्त का भंडाफोड़ संसद में ही करने की रणनीति बनाई। पर इस बार सरकार और सरकारी जांच एजेंसी ने इसे लोकतंत्र को कलंकित करने का मुद्दा बना कर अदालत में पेश कर दिया।

लालकृष्ण आडवाणी ने संसद के मानसून सत्र में सरकार को उन्हें गिरफ्तार करने की चुनौती दी थी। अपने सहायक रहे सुधींद्र कुलकर्णी और दो पूर्व सांसदों की गिरफ्तारी के खिलाफ जनमत जगाने के लिए चौथी रथयात्रा पर निकले आडवाणी का रथ अभी दिल्ली नहीं पहुंचा था कि हाईकोर्ट में पुलिस ने अपना बयान बदल दिया, जिससे तीनों की जमानत हो गई। पर भ्रष्टाचार के खिलाफ निकली रथयात्रा विजय यात्रा में बदलती, इससे पहले ही 2-जी घोटाले में सीबीआई का चाबुक राजग के शासनकाल पर चल गया। किस समय कौन-सा राजनीतिक तीर चलना है, इसमें कांग्रेस को महारत हासिल है।

जांच एजेंसियों का अपनी सत्ता बचाने के लिए इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। मगर चिंता की बात यह है कि मौजूदा सरकार ने जांच एजेंसियों के कंधे पर बंदूक रख कर सांप्रदायिक खेल खेलना भी शुरू कर दिया है। कैबिनेट सचिवालय में अतिरिक्त सचिव रहे और आंतरिक सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ बी रमन ने हाल ही में एक अंग्रेजी पत्रिका में लेख लिख कर इसका खुलासा किया है। उनका कहना है कि पिछले पांच साल में हुई किसी आतंकवादी वारदात की जांच सही नतीजे तक नहीं पहुंची। मालेगांव में 2006 और 2008 में दो बार विस्फोट हुए। दिल्ली, हैदराबाद, अजमेर शरीफ और समझौता एक्सप्रेस में भी विस्फोट हुए। इन सभी विस्फोटों के लिए अब 26/11 के बाद बनी नई जांच एजेंसी एनआईए हिंदू आतंकवादियों को जिम्मेदार ठहरा रही है। स्वामी असीमानंद, प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित आरोपित और गिरफ्तार हैं। हालांकि जांच एजेसियों को इनके खिलाफ अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिला। यही वजह है कि इन पर मकोका लगा दिया गया ताकि सबूतों के अभाव में भी इनकी जमानत न हो सके।

पांच साल पहले मालेगांव में हुए विस्फोटों की जांच करके महाराष्ट्र एटीएस ने साढे तीन महीने में नौ मुसलिम युवकों को गिरफ्तार करके आरोपपत्र भी दाखिल कर दिया था। लेकिन उसके बाद जांच का काम पहले सीबीआई और फिर एनआईए को सौंप दिया गया। आरोपपत्र जांच पूरी होने के बाद ही दायर किया जाता है। इसके बावजूद महाराष्ट्र सरकार ने यह केंद्र सरकार के इशारे पर किया। गिरफ्तार किए गए नौ मुसलिम युवकों को सिमी और लश्कर-ए-तैयबा से संबद्ध बताया गया था। इनके कबूलिया बयान भी अदालत में पेश किए गए।

पर अब एनआईए ने इसी 2006 के मामले में असीमानंद का तथाकथित नया कबूलिया बयान अदालत में पेश कर दिया है। दोनों में से एक कबूलिया बयान झूठा है। पर सीबीआई और एनआईए ने राजनीतिक दबाव में पहले के कबूलिया बयानों को गलत मान लिया, जिसका सबूत यह है कि इस जांच एजेंसी ने पहले गिरफ्तार किए गए नौ युवकों की जमानत का विरोध नहीं किया। एनआईए अगर उनके खिलाफ दायर किए गए आरोपपत्र को गलत और उनके कबूलिया बयानों को झूठा मानती है, तो उसे अदालत में इनके खिलाफ जांच बंद करने की अंतिम रिपोर्ट दाखिल करनी चाहिए थी। एटीएस के खिलाफ झूठे आरोपपत्र के लिए कार्रवाई भी होनी चाहिए।

लेकिन न तो जांच बंद करने की अंतिम रिपोर्ट दाखिल की गई और न ही एटीएस के खिलाफ कार्रवाई की गई है। अलबत्ता एनआईए ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दबाव में इन सभी की जमानत करवा कर इन पर तलवार भी लटका रखी है। असीमानंद के कबूलिया बयान में कितनी सच्चाई है, यह तो वक्त ही बताएगा। कहीं इस मामले में भी नई बनी जांच एजेंसी को अदालत से फटकार न खानी पडे।

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