आतंकवाद से लड़ने की इच्छाशक्ति चाहिए

समुद्री रास्ते से आतंकवाद की आशंका भी सही साबित हो गई है। राजनेता सुरक्षा एजेंसियों की सलाहों को दरकिनार करके आतंकवाद पर राजनीतिक नजरिया अपनाएंगे, तो आतंकवाद से नहीं लड़ा जा सकता।

करीब दो साल पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने पहली बार समुद्री रास्ते से आतंकवादियों के प्रवेश की आशंका जाहिर करके देश को चौंका दिया था। इसके करीब एक साल बाद तीस जून 2007 को संसद पटल पर रखी आतंरिक सुरक्षा की बाबत रपट में कहा गया था कि समुद्री मार्गों से खतरे की संभावना को देखते हुए तटीय क्षेत्रों की गश्त और निगरानी के लिए तटीय सुरक्षा योजना शुरू की गई है। तटीय पुलिस थानों को 204 नौकाओं, 149 जीपों और 318 मोटरसाईकिलों से सुसज्जित किया जा रहा है। गृहमंत्रालय की इस रिपोर्ट में महाराष्ट्र और गुजरात की तटीय सीमा से आतंकवादियों की घुसपैठ की आशंका को देखते हुए 'आपरेशन स्वान' नाम से एक योजना का जिक्र है। छब्बीस नवम्बर 2008 को वह घटना हो गई, जिसकी आशंका इस रिपोर्ट में जाहिर की गई थी। आतंकवादी मुंबई के कोलाबा तटीय इलाके के सूसोन डाक में वोट के जरिए दाखिल हुए। यह वह तटीय इलाका है जहां पर कोली जाति के समुद्री मछुवारे रहते हैं। इस तटीय क्षेत्र को मछुवारों के अलावा कोई इस्तेमाल नहीं करता। इसलिए जब मछुवारों ने रॉफ्टिंग के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नाव पर दस आतंकवादियों को उतरते हुए देखा, तो फौरन पुलिस को सूचित किया। लेकिन संसद में 30 जून 2007 को रखे गए स्थिति दस्तावेज में जिस तटीय सुरक्षा योजना को लागू करने का दावा किया गया था, वह वहां मौजूद नहीं थी, अलबत्ता निकटवर्ती पुलिस ने सूचना मिलने के बाद भी तत्परता नहीं दिखाई।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन की ओर से दो साल पहले जाहिर की गई आशंका सच साबित हो गई है। सिर्फ इतना नहीं, बल्कि समुद्र के जरिए मुंबई के दक्षिणी हिस्से में प्रवेश करने वाले आतंकवादियों ने भारत में अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला करके पिछले चार साल से आतंकवाद से लड़ने के लिए अपनाई जा रही लुंज-पुंज नीति पर कड़ा प्रहार किया है। आतंकवादियों ने छब्बीस नवम्बर को रात करीब साढ़े आठ बजे बोट से उतरकर एक घंटे के भीतर दक्षिणी मुंबई के कम से कम पांच जगहों पर गोलीबारी शुरू कर दी थी। इससे साफ है कि यह तैयारी एक घंटे मात्र की नहीं थी, अलबत्ता आतंकवादी खुद पहले भी इस पूरे इलाके का मुआइना कर चुके थे, या जिन-जिन जगहों पर आतंकवादियों को हमला करना था, वहां-वहां उनके स्थानीय सैल पहले से मौजूद थे। बाहर से आकर आतंकवादियों का कोई गिरोह इस तरह एक घंटे के भीतर इतना बड़ा आपरेशन नहीं कर सकता। इससे स्पष्ट है कि लंबे अर्से से तैयारी चल रही थी, लेकिन खुफिया तंत्र और तटीय सुरक्षा प्रणाली पूरी तरह विफल हो गई। सूसोन डाक पर उतरने के लिए जिस बोट का इस्तेमाल किया गया था, वह बहुत ज्यादा दूर से नहीं आई होगी, इसलिए संभव है कि मुंबई के ही किसी दूसरे हिस्से से आतंकवाद की वारदात के ठिकाने पर पहुंचने के लिए इस रास्ते का इस्तेमाल किया गया होगा। अगर यह नहीं, तो निश्चित रूप से आतंकवादी किसी बड़ी बोट या समुद्री जहाज से मुंबई के इर्द-गिर्द पहुंचे होंगे और बाद में उन्होंने रॉफ्टिंग बोट का इस्तेमाल किया होगा।

सवाल पैदा होता है कि बार-बार हो रहे आतंकवादी हमलों के बावजूद खुफिया तंत्र सक्रिय क्यों नहीं हो रहा। क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति में कमी की वजह से खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियां उतने उत्साह से काम नहीं कर रही, जितने उत्साह से करना चाहिए। ग्यारह सितंबर 2001 को न्यूयार्क में हुए आतंकवादी हमले के बाद से अब तक अमेरिका में कोई बड़ा आतंकवादी हमला नहीं हुआ। ब्रिटेन की भूमिगत मेट्रो ट्रेनों में आतंकी वारदात के बाद पिछले चार साल से कोई बड़ी आतंकी वारदात नहीं हुई है। फिर क्या वजह है कि भारत में हर दूसरे-तीसरे महीने एक बड़ी आतंकवादी वारदात हो जाती है। अमेरिका ने न्यूयार्क पर हुए आतंकवादी हमले के सत्रह दिन बाद ही संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाकर आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाने का फैसला करवा लिया था। अट्ठाईस सितंबर 2001 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 1373 पास करके दुनियाभर से आग्रह किया था कि सभी देशों में आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून बनाए जाएं। इसी का अनुपालन करते हुए तत्कालीन भारत सरकार ने भी तत्परता दिखाते हुए तीस दिनों के भीतर पच्चीस अक्टूबर 2001 को आतंकवाद के खिलाफ अध्यादेश के जरिए कड़ा कानून लागू कर दिया था, जिसे संसद के दोनों सदनों की साझा बैठक बुलाकर 'पोटा' नाम से पास किया गया। संसद की साझा बैठक इसलिए बुलानी पड़ी थी, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून के लिए राजनीतिक आम सहमति नहीं थी।

कुछ राजनीतिक दलों ने आतंकवाद विरोधी कानून को एक समुदाय विशेष के खिलाफ बताकर उनकी सहानुभूति हासिल करने की कोशिश की और चुनावों में उनसे कड़ा कानून हटाने का वादा किया। मौजूदा सरकार ने सत्ता में आते ही आतंकवाद के साथ पहला समझौता यह किया कि बहुमत का फायदा उठाते हुए 'पोटा' कानून रद्द कर दिया। क्या मौजूदा सरकार की आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कदम उठाने की अनिच्छा और कड़े कानून पर राजनीतिक आम सहमति का अभाव खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों की मुस्तैदी को प्रभावित नहीं कर रहा है? पिछले चार सालों से आतंकवादी वारदातों में लगातार इजाफा हो रहा है, अलबत्ता पहले से भीषण वारदातें हो रही हैं और मरने वालों की तादाद भी बढ़ रही है। राजनीतिक नेता मौका-मुआइना करके आतंकवाद से मिल जुलकर लड़ने और सख्त कदम उठाने के वादे करते हैं, इसके बावजूद कोई सख्त कदम नहीं उठाया जाता। आतंकवादी वारदातों के बाद गृहमंत्रालय आतंरिक सुरक्षा पर राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों की बैठक बुलाकर आतंरिक सुरक्षा पर नई रणनीति पर विचार-विमर्श करता है। पुलिस महानिदेशक इन बैठकों में कड़े कानून की मांग करते रहे हैं, लेकिन सरकार में राजनीतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण सुरक्षा एजेंसियों को सख्त कानून से लैस नहीं किया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियों से कहा जाता है कि 'पोटा' होने के बावजूद संसद पर हमला हो गया था, इसलिए आतंकवाद से लड़ने के लिए सख्त कानून की जरूरत नहीं। जब पुलिस महानिदेशक सख्त कानून के जरिए वारदात की गुत्थी सुलझाने में मददगार होने और सख्त कानून के कारण अमेरिका और ब्रिटेन में आतंकवाद पर काबू पा लिए जाने का उदाहरण देते हैं, तो उनकी अनदेखी कर दी जाती है। प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सुरक्षा एजेंसियों को ज्यादा मुस्तैद होने और आपसी तालमेल बढ़ाने पर जोर देते हैं।

बारह सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए बम धमाकों के बाद सरकार ने कुछ ज्यादा गंभीरता दिखाई थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ओर से बनाई गई प्रशासनिक सुधार कमेटी के अध्यक्ष वीरप्पा मोइली ने हाथों हाथ एक रिपोर्ट सौंप दी थी जिसमें आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून बनाने की सिफारिश की गई थी। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन भी कड़े कानून के पक्ष में थे, खुद प्रधानमंत्री ने भी कड़े कदम उठाने की बात कही थी, इसके बावजूद सरकार आम सहमति पर नहीं पहुंच सकी। केबिनेट बैठक के बाद बताया गया कि सरकार आतंकवाद के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी लेकिन सख्त कानून बनाने पर कोई विचार नहीं हुआ। उनतीस सितंबर 2008 को मालेगांव में हुए बम धमाकों में छह लोग मारे गए। मुंबई की एटीएस ने मौका-ए-वारदात से मिले मोटर साईकिल को निशानदेही मानकर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को गिरफ्तार किया, जबकि वह अपना मोटर साईकिल 2004 में बेच चुकी थी। प्रज्ञा ठाकुर का संबंध प्रखर हिंदुवादी 'अभिनव भारत' नाम के संगठन के साथ था, इसलिए इस संगठन से जुड़े सभी नेताओं की धर पकड़ शुरू करके देश में आतंकवाद की नई राजनीति शुरू हो गई। तेईस नवंबर को ही राष्ट्रीय सुरक्षा पर दिल्ली में हुई देशभर के पुलिस महानिदेशकों की बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दिल्ली बम धमाकों के बाद दिए गए सख्त कदम के बयान को दोहराते हुए सौ दिनों में आतंकवाद के खिलाफ 'रोड मैप' बनाने की बात कही थी। प्रधानमंत्री के इस बयान की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि आतंकवादियों ने मुंबई में इतना बड़ा हमला किया कि अब तक के सबसे बड़े संसद पर हुए हमले को भी भुला दिया।

प्रिय अजय जी, शायद आपको अपने

प्रिय अजय जी,

शायद आपको अपने गुवाहाटी वाले इस मित्र की याद हो। आपका ब्लाग बहुत ही अच्छा है। एक सुखद अनुभूति हुई। मेरा ब्लाग भी देखने का समय निकालें, binodringania.blogspot.com, diarywriter.blogspot.com

मिलते रहेंगे, आपका मेल आईडी दें -

विनोद रिंगानिया, गुवाहाटी

India Gate se Sanjay Uvach

Wed, 14 Dec 2011

जनसत्ता 14 दिसंबर, 2011:  पिछले दिनों दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में एक अत्यंत गंभीर विषय पर चर्चा हुई। विषय था, देश में बच्चों के अपहरण की बढ़ रही घटनाएं। विषय की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों के अपहरण पर शोध आधारित पुस्तक का विमोचन करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश अल्तमस कबीर खुद मौजूद थे। इस गंभीर समस्या का सनसनीखेज खुलासा 1996 में हुआ था, जब यूनिसेफ ने भारत में बच्चों के देह-शोषण पर एक रिपोर्ट जारी की थी। बी भामती की इस रिपोर्ट