पर अंगद का पांव नहीं कर्नाटक

येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्यमंत्री हो गए। दक्षिण में खाता खुलना बीजेपी के लिए बड़ा जश्न। पर पहले ही दिन पांव लड़खडाने शुरू हो चुके। कर्नाटक में रखा गया कदम अंगद का पांव साबित होता दिखाई नहीं देता। नरेंद्र मोदी का जश्न में मौजूद रहना देवगौड़ा को खटका होगा। सरकार पर देवगौड़ा की सहमति अभी भी शक के घेरे में। एन वक्त पर वह बेंगलुरु से गायब हो गए। शपथ ग्रहण में देवगौड़ा की गैर मौजूदगी आने वाले तूफान का इशारा। कुमारस्वामी भले ही शपथ ग्रहण में मौजूद थे। पर उप मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों भाईयों में कसमकस जारी। इसी वजह से जेडीएस से किसी ने मंत्री पद की शपथ नहीं ली। बड़े बेटे एचडी रेवन्ना के मुकाबले कुमारस्वामी का पलड़ा भारी। पर देवगौड़ा भयंकर मुश्किल में। देवगौडा को पहले घर का झगड़ा निपटाना होगा। यह झगड़ा निपटा। तो विभागों के बंटवारे पर झगडा होगा। पहले समझौते के मुताबिक विभागों की अदला-बदली होगी। पर देवगौड़ा परिवार इसके लिए राजी नहीं। येदुरप्पा के लिए अभी बहुमत साबित करने की तलवार भी। वैसे जेडीएस-बीजेपी विधायक दल की बैठक में नेता चुने गए। सो गवर्नर ने बहुमत साबित करने को नहीं कहा। गठबंधन सरकारों  के जमाने में इस हिसाब से यह नया अध्याय। पर तेईस नवम्बर से सत्र शुरू होगा। तब तक देवगौड़ा परिवार का झगड़ा न निपटा। तो बहुत मुश्किल होगी। येदुरप्पा को सिर्फ देवगौड़ा की चालों का सामना नहीं करना। बीजेपी में भी कई नेताओं की चाल टेढ़ी। येदुरप्पा को पार्टी की खेमेबाजी से भी निपटना होगा। शपथ ग्रहण पर सिर्फ देवगौंड़ा परिवार की नजर ही नहीं लगी। बीजेपी परिवार की भी नजर लग चुकी। पहले ही शपथ ग्रहण में गुटबाजी सामने आई। जो चार मंत्री बनाए गए। उनमें दो अनंत कुमार खेमे के। पर अनंत कुमार जिन्हें बनाना चाहते थे। उन्हें रोकने में कामयाब रहे येदुरप्पा। बीजेपी हाईकमान फिलहाल येदुरप्पा के साथ। पर हाईकमान दोनों में तालमेल न बना सका। तो अपने पांव खुद ही उखाड़ लेगी बीजेपी। अनंत कुमार की पहले दिन से ही नाराजगी शुरू। शपथ ग्रहण के बाद लंच और प्रेस कांफ्रेंस से नदारद रहे। अब एक तरफ देवगौड़ा की रोज-रोज की नुक्ताचीनी के साथ-साथ पार्टी की खेमेबाजी भी पांव उखाड़ेगी। येदुरप्पा को सरकार चलाने के लिए दत्ता पीठ जैसे मुद्दे छोड़ने होंगे। जैसे केंद्र में समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे मुद्दे छोड़े। कुमारस्वामी की यही पहली शर्त होगी। जिस मुद्दे के बूते बीजेपी कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी उभरी। वही छोड़ेगी, तो पांव जमेंगे नहीं, उखड़ने शुरू होंगे।