बिखराव के मुहाने पर देश

Publsihed: 02.Nov.2008, 20:39

 

देश को बिखरता देख अमेरिका ने अपना संविधान बदल लिया था। असंतुलित विकास ने समाज में बिखराव पैदा कर दिया है। वोट बैंक की राजनीति ने वैमनस्य बढ़ा दिया है। क्या हमें भी संविधान बदलने की जरूरत है।

 

परिदृश्य- एक

 

1775 तक ब्रिटेन की सीमाएं मौजूदा अमेरिका तक फैली थी। यह वह साल था, जब तेरह राज्यों ने ब्रिटेन से आजादी का बिगुल फूंक दिया। जंग अभी चल ही रही थी कि इन तेरह राज्यों ने चार जुलाई 1776 को पैनसेलवानिया राज्य के फिलाडेलफिया नगर में आजादी का ऐलान कर दिया और सभी ने मिलकर एक नया संविधान बनाना शुरू कर दिया।

नए देश का नाम दिया गया- यूनाइटेड स्टेट ऑफ अमेरिका। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद संविधान बनकर तैयार हो गया और जुलाई 1778 में सभी ने बाकायदा दस्तखत करके मंजूर कर लिया। छह साल के लंबे संघर्ष के बाद 1781 में जब सभी तेरह राज्य ब्रिटेन से आजाद हो गए तो संविधान की पुष्टि कर दी गई। महासंघ के संविधान में स्थायित्व और मजबूती जैसा कोई प्रावधान नहीं था। सुरक्षा, वित्तीय, व्यापार जैसे मामलों पर भी संघीय सरकार राज्यों की विधानसभाओं की मोहताज थी। थोड़े समय बाद ही महासंघ की कमजोरियां सामने आने लगीं। नया देश बिखराव के मुहाने पर था। फरवरी 1787 में उसी फिलाडेलफिया में महासम्मेलन करके संविधान समीक्षा का फैसला हुआ। आखिर 25 मई 1787 को उसी जगह पर पुराने संविधान की समीक्षा करने की बजाए नया संविधान बनाना शुरू किया गया, जिसे 17 सितम्बर 1787 को अंतिम रूप देने के बाद चार मार्च 1789 को मंजूर कर लिया गया। मजबूत केंद्र वाला मौजूदा अमेरिकी संविधान वही है। अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन ने महासंघ के संविधान पर फब्ती कसते हुए कहा था- 'तेरह राज्यों के महासंघ का संविधान रेत के पुल की तरह था।

 

परिदृश्य- दो

 

अमेरिका में आर्थिक मंदी के बाद दुनियाभर की मंदी का असर भारत पर भी दिखाई दे रहा है। भारत में उसकी वजहें अलग हो सकती हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय असर भी एक कारण है। राज्यों के असंतुलित विकास ने समाज में विघटन पैदा कर दिया है। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्य बेहद पिछड़े रह गए हैं। वहां के लोग रोजी रोटी के लिए पंजाब, हरियाणा, गुजरात, बंगाल के अलावा देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और राजनीतिक राजधानी दिल्ली में बड़ी संख्या में पलायन कर रहे हैं। नतीजतन सब जगह सामाजिक तनाव पैदा हो गया है। बिहार और उत्तर प्रदेश के निवासियों का दिल्ली में पलायन होने से दिल्ली की भाषा और संस्कृति पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ा। देश के बंटवारे के बाद मुस्लिम आबादी बड़े पैमाने पर पाकिस्तान चली गई थी। पाकिस्तान से निर्वासित होकर हिंदू और सिख बड़ी तादाद में पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में आकर बसे थे। उर्दू-पंजाबी भाषी हिंदू और सिख दिल्ली में बड़ी आसानी से घुल-मिल गए। उसी तरह पिछले डेढ़ दशक में बिहार-यूपी से आए मैथली, भोजपुरी, अवधि, बुंदेलखंडी भी आसानी से हिंदी भाषी दिल्ली में आत्मसात हो गए। लेकिन दिल्ली जैसे महानगर में आबादी का राजनीतिक मिजाज बदल गया है। अब पंजाबी और बनियों का दिल्ली की राजनीति पर वर्चस्व नहीं रह गया। उत्तर प्रदेश और बिहार से पलायन करके आने वाले लोगों का दिल्ली की राजनीति पर वर्चस्व बढ़ गया है। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश की मूल निवासी दीक्षित परिवार की बहू शीला दीक्षित दस साल से दिल्ली की मुख्यमंत्री हैं। यही खतरा अब देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर मंडरा रहा है। शहर में हिंदी भाषियों की आबादी बढ़ने से दुकानदारों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए मराठी साईन बोर्ड हटाकर हिंदी के लगा लिए हैं। यूपी-बिहार से आकर काम-धंधा करने वाले हिंदी भाषियों ने अपनी दुकानों के साईन बोर्ड मराठी में लगाए ही नहीं। बिहार से मुंबई आकर बसे लोग अपने त्योहार छठ पूजा को गणेशोत्सव की तरह मनाकर बराबरी करना चाहते हैं। बिहार के राजनीतिक नेता अपना वोट बैंक संभालने के लिए अपने घरों को छोड़कर मुंबई में छठ पूजा करने जाने लगे हैं। जिस तरह दिल्ली का राजनीतिक मिजाज बदला है, वही डर अब मुंबई के मराठियों को सताने लगा है। दिल्ली की भाषा और संस्कृति में ज्यादा बदलाव नहीं आया, लेकिन मराठी अपनी भाषा और संस्कृति को लुप्त होता देख भी चिंतित हैं। निजी नौकरियों के बाद सरकारी नौकरियों में भी बाहरी लोगों का दखल बढ़ रहा है। पिछले बारह सालों से देश का रेलमंत्री बिहार से होने के कारण देशभर में बड़े पैमाने पर बिहारियों की भर्ती होने से जगह-जगह पर मूल निवासियों में आक्रोश उभरा है। मुंबई में रेल मंत्रालय की भर्ती परीक्षा से इस आक्रोश ने विस्फोटक रूप धारण कर लिया है। भाषा, संस्कृति, राजनीति, रोजगार पर हमले ने राज ठाकरे के मराठी मानुस आंदोलन में जान फूंक दी है।'

 

 

 

परिदृश्य-तीन

दिल्ली और मुंबई में जो हालात देश की आजादी के बाद असंतुलित विकास के कारण बने हैं, वही हालात असम में अंग्रेजों के जमाने में ही बनने शुरू हो गए थे। अंग्रेजों ने 1826 में असम पर कब्जा करने के बाद वहां का प्रशासन चलाने के लिए बाहरी लोगों को बसाना शुरू किया। नेपाल के अलावा मोमनसिंह और साइलेट(अब बांग्लादेश में) से मजदूर लाए गए, तो मौजूदा बंगाल से पढ़े-लिखे लोग प्रशासन चलाने के लिए लाए गए। बाहरी आबादी के बड़ी तादाद में आने से स्थानीय लोगों को अपना अस्तित्व खतरे में दिखाई देने लगा। उनकी जमीनें घटने लगीं और आर्थिक स्रोतों पर भी बाहरी लोगों का कब्जा शुरू हो गया, असम की संस्कृति पर भी हमला हुआ। नतीजतन स्थानीय लोगों ने विद्रोह शुरू कर दिया। आजादी के बाद वहां के लोगों को लगा था कि अब बाहरी लोगों का दखल कम होगा। जबकि इसके उलट सत्तर के दशक में बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर घुसपैठ शुरू हुई, तो स्थानीय लोगों को आजादी से पहले जैसी स्थिति लौटती दिखाई देने लगी। बोडो, कारबी, हमारस, रभास, मिशिगंस, टिविस जातियों ने अपने-अपने इलाकों की स्वायत्ता के आंदोलन शुरू कर दिए। बांग्लादेशियों के कारण असम का आबादी संतुलन बिगड़ता देख 1969 में यूनाइटेड लिब्रेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) का गठन हुआ। आंदोलन ने उग्र रूप धारण किया, तो 1985 में राजीव गांधी ने उनके साथ समझौता किया, जिसके तहत घुसपैठियों को निकालने के लिए आईएमडीटी एक्ट बनाया गया। लेकिन यही एक्ट घुसपैठियों का मददगार साबित होने लगा, तो उल्फा ने खुद के साथ धोखा मानते हुए आंदोलन को हिंसक बना दिया। नौ साल पहले कांग्रेस ने 1999 में उल्फा के साथ तालमेल करके चुनाव जीता, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उल्फा से किए वादे पूरे नहीं किए अलबत्ता उल्फा में फूट डालकर सुल्फा बना डाली। इससे उल्फा और हिंसक हो गया और उसने भारत को अपना दुश्मन मानना शुरू कर दिया। दुश्मन के दुश्मन बांग्लादेशी आतंकी संगठन हूजी से हाथ मिलाकर उल्फा ने बड़े पैमाने पर बम धमाके शुरू कर दिए हैं।

 

 

परिदृश्य-चार

देश की आजादी के समय अंग्रेजों ने बाकी रियासतों के साथ-साथ कश्मीर का भी कोई फैसला नहीं किया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने किसी को प्यार से, तो किसी को रौब से भारत में विलय के लिए तैयार कर लिया। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने विलय का फैसला तब किया, जब पाकिस्तान ने कब्जा शुरू कर दिया। जवाहर लाल नेहरू ने वल्लभ भाई को फौज का इस्तेमाल करने की छूट नहीं दी। नतीजतन कश्मीर भारत और पाक में झगड़े की जड़ बन गया। तबसे कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान ने आतंकवाद का हर हरबा इस्तेमाल किया। पिछले तीन दशक से देशभर में आतंकी वारदातों के बाद भारत की संसद पर भी हमला किया गया। अब तो पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर भारतीय मुसलमानों को बरगलाने में भी कामयाब हो गया है। भारत को तोड़ने के लिए पहले सिमी और अब इंडियन मुजाहिद्दीन बना ली है। वोट बैंक की राजनीति आतंकवादियों की मददगार बन गई है। चार दशक से आतंकवादियों से लड़ रहे सैनिक आक्रोषित हैं। हिंदुओं और मुसलमानों में अविश्वास की खाई बढ़ गई है। सरकार की लुंज-पुंज नीतियों से हिंदुओं में गुस्से के साथ-साथ बदले की भावना पैदा हो रही हैं। देश-समाज टूट के कगार पर है।

 

 

मंथन

क्या भारतीय संविधान में कोई खोट रह गया, जो सभी राज्यों का संतुलित विकास नहीं हुआ। क्या भारतीय संविधान में वोट बैंक की राजनीति करने की संभावना का खोट रह गया है, जिसे दूर करने की जरूरत है। क्या देश को एकजुट रखने के लिए मंथन की जरूरत आन पड़ी है। क्या राजनीतिक नफे-नुकसान को दरकिनार कर देश के लिए सोचने का समय अभी नहीं आया।

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