संसदीय जांच समिति का संकट

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल हर्षद मेहता की चर्चा है। हर्षद मेहता ने 1990-91 में पांच हजार करोड़ का शेयर घोटाला करके पूरी दुनिया को चौँका दिया था। उन्होंने इससे भी ज्यादा तब चौंकाया था जब कहा कि उन्होंने नरसिंह राव को एक करोड़ रुपए की रिश्वत से उनका मुंह बंद किया था। हर्षद मेहता ने चार नवंबर 1991 को खुद प्रधानमंत्री आवास जाकर नोटों से भरे दो सूटकेस देने की बात कही थी। प्रधानमंत्री का दफ्तर नरसिंह राव के बचाव में जितनी भी दलीलें दे रहा था, सब गलत साबित हो रही थीं। पीएमओ की पहली दलील थी कि हर्षद मेहता जिस समय पीएमओ में होने की बात कह रहे हैं, उस समय प्रधानमंत्री जगमोहन से मुलाकात कर रहे थे। जगमोहन ने नरसिंह राव से अपनी मुलाकात का खंडन कर दिया। फिर पीएमओ से कहा गया कि पौने ग्यारह बजे तो प्रधानमंत्री पाकिस्तानी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल से मिल रहे थे। पाकिस्तानी सांसदों ने खंडन करते हुए कहा कि वे तो ग्यारह बजे के बाद प्रधानमंत्री से मिलने पहुंचे थे। रामजेठमलानी उस समय हर्षद मेहता के वकील थे और उन्होंने नरसिंह राव के एपीएस आरके खांडेकर की हर्षद मेहता से फोन पर हुई बातचीत का ऑडियो टेप जारी किया था।

वह ऑडियो टेप का जमाना था और घोटाले की जांच के लिए रामनिवास मिर्धा की रहनुमाई में बनी जेपीसी ने नरसिंह राव और उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को शेयर घोटाले से बरी कर दिया था। रामनिवास मिर्धा की रिपोर्ट बोफोर्स घोटाले की जांच करने वाली जेपीसी के अध्यक्ष बी. शंकरानंद जैसी ही थी। शंकरानंद ने राजीव गांधी के इस कथन को ही दोहराया था कि ऐसा कोई घोटाला हुआ ही नहीं। न कोई बिचौलिया था, न कोई कमिशनखोर। एचडी देवगौड़ा के समय सीबीआई प्रमुख जोगेंद्र सिंह जब बोफोर्स घोटाले की तह तक पहुंच गए थे तो सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी पर दबाव डालकर देवगौड़ा सरकार गिरा दी थी। वाजपेयी के समय बोफोर्स घोटाले की जांच ओतोवियो क्वात्रोची को मिली कमिशन तक पहुंच गई थी। उसके कमिशन वाले खाते सील करवा दिए गए थे। मनमोहन सिंह की सरकार बनते ही सबसे पहला काम क्वात्रोची के खातों पर लगी सील हटवाने का हुआ। विधिमंत्री हंसराज भारद्वाज ने सील खुलवाने के लिए व्यक्तिगत तौर पर दिलचस्पी ली, लेकिन जब खुलासा हुआ तो उन्होंने अनजान बनने की कोशिश की। बाद में खाते खुलवाने की पैरवी करते हुए कहा कि जब उस राशि को कमिशन साबित ही नहीं कर सकते थे, तो उसे सील रखवाए रखने से क्या फायदा था।

बोफोर्स, हर्षद मेहता और झारखंड मुक्तिमोर्चा सांसदों की खरीद-फरोख्त ऐसे तीन घोटाले हैं, जिनमें प्रधानमंत्री स्तर पर भ्रष्टाचार के सबूत मौजूद होने के बावजूद किसी भी प्रधानमंत्री का बाल भी बांका नहीं हुआ। भले ही जांच रपटों में राजीव गांधी और नरसिंह राव को बरी कर दिया गया, लेकिन देश का हर नागरिक सच्चाई से वाकिफ है। देश का बड़ा तबका राजीव गांधी और नरसिंह राव को बेदाग नहीं मानता। ये तीन घोटाले वास्तव में हुए थे, जिन पर आम जनता की धारणा बनी कि राजनीति में कीचड़ ही कीचड़ है और राजनीतिज्ञों को खरीदकर कोई भी काम करवाया जा सकता है। यह असलियत भी है, इसी जनधारणा को उजागर करने के लिए एनडीए शासनकाल में एक मीडिया ग्रुप ने हथियारों की फर्जी खरीद-फरोख्त का नाटक रचा, जिसमें हथियार बेचने वाले खुद पत्रकार थे, हथियारों का कोई सौदा नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिज्ञों और सैन्य अधिकारियों को रिश्वत देकर सौदे में मदद का वादा ले लिया गया। तहलका का यह स्टिंग आपरेशन पूरी तरह काल्पनिक सौदे पर आधारित नाटक था, जिसमें बंगारू लक्ष्मण जैसे भाजपा अध्यक्ष जाल में फंसकर नोटों की गड्डियां लेते हुए दिखाई दिए। समता पार्टी की अध्यक्ष जया जेटली यह कहते हुए दिखी कि आप पार्टी के कोषाध्यक्ष आरके जैन से मिल लें। सेना के कई अधिकारी दलाल बने पत्रकारों के साथ दारू पीते और सौदा करवाने में मदद करने की बात कहते दिखे।

हर्षद मेहता के ऑडियो युग के बाद तहलका का वीडियो युग भ्रष्टाचार उजागर करने का ज्यादा कारगर हथियार साबित हुआ तो ग्यारह सांसदों को संसद में सवाल पूछने के लिए रिश्वत देने में फंसाने का आपरेशन चक्रव्यूह हुआ। इस मामले में स्पीकर प्रोएक्टिव हो गए और दस दिन के अंदर पवन कुमार बंसल की रहनुमाई में कमेटी बनाकर सारे सांसदों को बर्खास्त कर दिया गया। बंसल कमेटी का फैसला बी. शंकरानंद और रामनिवास मिर्धा कमेटियों से एकदम अलग था। शंकरानंद कमेटी ने राजीव गांधी और रामनिवास मिर्धा कमेटी ने नरसिंह राव को बरी कर दिया था। जबकि बंसल कमेटी से ग्यारह सांसद बर्खास्त हो गए क्योंकि उनमें से दस विपक्षी दलों के सांसद थे। अब फिर एक मामला किशोरचंद्र देव कमेटी के सामने है। मनमोहन सरकार के शक्ति परीक्षण के समय सांसदों की खरीद-फरोख्त तो सबकी जुबान पर थी ही, लेकिन प्रधानमंत्री ने चुनौती दी कि सबूत कहां से लाओगे। इसलिए तहलका जैसा एक स्टिंग ऑपरेशन करना पड़ा। आखिर वे सांसद तो स्टिंग ऑपरेशन में शामिल हो नहीं सकते थे, जो एबस्टेन रहकर या सरकार के पक्ष में वोट देकर सरकार की मदद करने वाले थे (ऐसे सांसदों की तादाद बाद में सत्रह निकली।) इसलिए स्टिंग ऑपरेशन खुद भाजपा ने किया और सीएनएन-आईबीएन को अपना मीडिया पार्टनर बनाया ताकि खरीद-फरोख्त को तहलका-चक्रव्यूह की तरह देश के सामने उजागर किया जा सके। तहलका और चक्रव्यूह ने सांसदों को अपने चंगुल में फंसाने के लिए राजनीतिक गलियारों में घूमने वाले उन छोटे कर्मचारियों को अपना औजार बनाया था, जो सांसदों के सवालों को तैयार करने, टाइप करने, फाइलें बनाने जैसा काम करते हैं। मध्यम वर्ग के वे कुछ ही पेशेवर लोग हैं, जो सांसद बदलते रहते हैं, सांसद बदलते समय उनके सामने पार्टी की कोई प्रतिबध्दता नहीं होती। इसी तरह पासपोर्ट बनवाने के लिए सांसदों से चिट्ठियां लिखवाने से लेकर बड़े-बड़े काम करवाने वाले प्रोफेशनल लोग भी दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घूमते हुए दिखाई देते हैं। वे भाजपा के दफ्तर में होते हैं, तो खुद को भाजपाई कहते हैं, कांग्रेस दफ्तर में होते हैं तो खुद को कांग्रेसी कहते हैं। राजनीतिक संकट के दिनों में ऐसे लोग सक्रिय हो जाते हैं। जयललिता के समर्थन वापसी के बाद 1999 में जब वाजपेयी की अग्निपरीक्षा हो रही थी, तो ऐसे कई धुंरधर सौ करोड़ रुपए में सरकार बचाने का फार्मूला लेकर घूम रहे थे, पर सरकार एक वोट से गिर गई।

ऑपरेशन सांसद खरीद-फरोख्त में बीच की कड़ी बनने वाला सुहेल हिंदुस्तानी मूलरूप से राजस्थान के जयपुर जिले का रहने वाला है। वह वहां जनता युवा मोर्चा में सक्रिय होकर दिल्ली में भाजपा के मुख्यालय तक पहुंचा था। फिर कुछ देर बाद भाजपा नेताओं से मोह भंग हुआ, तो दिल्ली में ही अपने काम धंधे में लग गया। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस में नए संपर्क बने तो जल्द ही बड़े लोगों के करीब भी पहुंच गया। वही समाजवादी पार्टी के सांसद रेवती रमणसिंह और भाजपा सांसदों अशोक अर्गल-फग्गन सिंह कुलस्ते के बीच कड़ी का काम कर रहा था। बीस-इक्कीस जुलाई को रमण सिंह ने कई बार सुहेल को फोन किया, इसका रिकार्ड भी मौजूद है। दोनों भाजपाई सांसद बाईस जुलाई को जब अमरसिंह से मिलने गए, तो सुहेल हिंदुस्तानी सफेद जैन कार के आगे वाली सीट पर बैठा था और उसका साथी कार चला रहा था। रेवती रमणसिंह जब भाजपाई सांसदों को अमरसिंह के पास ले जाने में विफल हो गए थे, तो यह जिम्मा सुहेल हिंदुस्तानी को दिया गया था। अब 18 अगस्त को किशोरचंद्र देव कमेटी में रेवती रमण सिंह और सुहेल हिंदुस्तानी की गवाही होगी। सवाल यह नहीं है कि किसी वीडियो में अमर सिंह या अमर सिंह की आवाज है या नहीं। सवाल यह है कि अशोक अर्गल के घर एक करोड़ रुपए लाने वाला संजीव सक्सेना कौन है। साबित होता है कि वह अमर सिंह का आदमी है। रेवती रमण सिंह की दोनों भाजपा सांसदों से बातचीत, दोनों भाजपाई सांसदों को अमर सिंह के घर ले जाने, संजीव सक्सेना को मेज पर हजार-हजार रुपयों की दस गड्डियां रखने के चश्मदीद गवाह सीएनएन-आईबीएन के पत्रकार सिध्दार्थ गौतम को भी ग्यारह अगस्त को जांच कमेटी में बुलाया गया है। क्या सिध्दार्थ गौतम यह कहेंगे कि उन्होंने कोई रिकार्ड नहीं किया, क्या वह यह कहेंगे कि अमर सिंह के घर के बाहर सांसदों के साथ वीडियो में दिख रहा शख्स वह खुद नहीं है। क्या रेवती रमण सिंह यह कहेंगे कि तीनों भाजपा सांसदों से बात करने वाला शख्स उनका डुप्लीकेट है। संजीव सक्सेना जब भी सामने आएंगे तो क्या वह खुद को अमर सिंह का आदमी होने को नकार सकेंगे। यह सब कुछ हो जाए, तो किशोरचंद्र देव कमेटी आसानी से बी. शंकरानंद और रामनिवास मिर्धा जैसी रिपोर्ट दे सकेगी।

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