कैसे-कैसे लोग करेंगे करार का फैसला

लोकसभा, विधानसभाओं, स्थानीय निकायों के चुनाव लड़ने  वालों और वोटरों के लिए अलग-अलग मापदंड तय होने चाहिए। संसद का चुनाव लड़ने का हक राष्ट्रीय दलों को हो, लोकसभा में मतदान का हक भी सिर्फ स्नातकों को हो।

अब जबकि हफ्तेभर में लोकसभा मनमोहन सरकार का भविष्य तय करेगी, तो फैसला उन मुट्ठीभर निर्दलीयों और क्षेत्रीय दलों के सांसदों पर निर्भर होगा, जिनका विचारधारा या अंतरराष्ट्रीय राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं। सरकार को संसद का जनादेश अमेरिका से एटमी करार पर  लेना है, लेकिन जब सरकार के भविष्य का फैसला होगा, तो यह मुद्दा छोटे-छोटे व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थों में दब जाएगा। एटमी करार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति से जुड़ा है, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के ज्यादा सांसद एटमी करार के खिलाफ हैं, इसके बावजूद फैसला उनके हाथ में नहीं है। लोकसभा में जब-जब ऐसा मौका आया, छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के इक्का-दुक्का सांसद और विचारधारा विहीन निर्दलीय सांसद ले देकर सरकार के पक्ष में खड़े हो जाते हैं। एक बार तो सांसदों की खरीद-फरोख्त तक से सरकार बच चुकी है। संसदीय लोकतंत्र और मौजूदा संविधान की यह खामी कभी दूर नहीं हो सकती, क्योंकि राजनीतिक नेताओं और राजनीतिक दलों की दिलचस्पी उनमें सुधार की नहीं होती, ये खामियां कभी एक राजनीतिक दल को फायदा पहुंचाती हैं, तो कभी दूसरे राजनीतिक दल को। देश का दुर्भाग्य यह है कि संविधान और संसदीय लोकतंत्र की खामियों को दूर करने की जिम्मेदारी संविधान निर्माताओं ने उन्हीं सांसदों पर डाल दी है, जिनके व्यक्तिगत और राजनीतिक स्वार्थ आड़े आते हैं। संविधान की खामियां दूर करने का ऐसा प्रावधान नहीं किया गया, जिसमें राजनीतिज्ञों, समाज सेवकों, कानून विशेषज्ञों, रिटायर्ड जजों, रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारियों की अहम भूमिका होती। संसद को कानून बनाने का हक होने के बावजूद संविधान निर्माताओं ने उसकी समीक्षा का हक सुप्रीम कोर्ट को दिया था, इसके चलते संसद से पारित कई कानून रद्द हो चुके हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को संविधान और संसदीय लोकतंत्र की खामियां दूर करने का कोई हक नहीं है। संविधान में ऐसा प्रावधान भी नहीं किया गया कि समय-समय पर बड़ी खामी नजर आने पर जनमत संग्रह के जरिए फैसला किया जाए और जनता के फैसले को संविधान का हिस्सा बनाया जाए। संविधान निर्माताओं ने मौजूदा नेताओं की तरह राजनीतिक या अपने हित को सामने रखकर संविधान बनाया होता, तो संविधान और संसदीय लोकतंत्र का इससे भी विभत्स रूप हमारे सामने होता।

1947 में संविधान सभा के सदस्यों का चुनाव प्रांतीय विधानसभाओं से समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के आधार पर किया गया था, विभाजन से पहले संविधान सभा में 389 सदस्य थे, लेकिन देश का विभाजन हो जाने के बाद संविधान सभा में सिर्फ 310 सदस्य रह गए थे। संविधान सभा में अत्यंत अनुभवी और योग्य व्यक्ति थे। कांग्रेस के सभी दिग्गज और मंजे हुए नेता जैसे जवाहर लाल नेहरू, सरदार बल्वभ भाई पटेल, डा. राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, गोविन्द बल्लभ पंत, केएम मुंशी, आचार्य कृपलानी और टीटी कृष्णामाचारी तो थे ही। कांग्रेस के अलावा अन्य दलों के डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पंडित हृदयनाथ गुंजरू, डा. आयंगर, भीमराव अम्बेडकर आदि भी शामिल थे। आम धारणा के विपरीत संविधान सभा के अध्यक्ष डा अम्बेडकर नहीं, अलबत्ता डा. राजेद्र प्रसाद थे। डा. अम्बेडकर को आठ सदस्यों वाली प्रारूप समिति का अध्यक्ष चुना गया था, इस समिति में 315 धाराओं और आठ परिशिष्टों का ड्राफ्ट संविधान सभा के सामने रखा था। इस ड्राफ्ट में 2437 संशोधन किए गए और आखिर में 395 धाराएं और नौ परिशिष्टों वाला संविधान तैयार हुआ। यहां यह बात भी काबिल-ए-गौर है कि ड्राफ्ट कमेटी ने जो ड्राफ्ट तैयार किया था उसमें 200 धाराएं अंग्रेजों के बनाए हुए 1935 के कानून से ली गई थीं। इतना ही नहीं मौजूदा संसदीय लोकतंत्र भी इंग्लैंड के संविधान से लिया गया। सबसे बड़ा फर्क सिर्फ यह था कि 1935 के कानून में सबको वोट का  अधिकार नहीं दिया गया था, जबकि डा. राजेंद्र प्रसाद की रहनुमाई वाली संविधान सभा में सभी को वोट का अधिकार दिया। इसके अलावा भी संशोधन, मौलिक अधिकारों, संप्रभुता आदि नए जोड़े गए।

भारत का संविधान और संसदीय लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप कोई रामायण, बाईबल या गुरुग्रंथ साहिब नहीं, जिसे बदला न जा सके। संविधान और संसदीय लोकतंत्र में अनेक खामियां निकली हैं, जिनमें से कुछ ऐसी खामियां सुधारी भी गई हैं, जिनसे राजनीतिक नेताओं को कोई ज्यादा फायदा नहीं होता था। जैसे चुनाव प्रणाली में पर्याप्त सुधार किए गए हैं, हालांकि राजनीतिक दलों ने अपनी सुविधा के लिए राज्यसभा सदस्य की चुनाव प्रणाली में सुधार की बजाए विकार पैदा करके संविधान के मूल ढांचे को भी तहस-नहस कर दिया है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में यह विकार कांग्रेस और भाजपा की आम सहमति से हुआ, जिसके मुताबिक देश के किसी भी हिस्से का नागरिक किसी भी राज्य से राज्यसभा में चुनकर आ सकता है। इससे सारी जिंदगी पंजाब और दिल्ली में बिताने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का असम से राज्यसभा में चुनकर आना वैध हो गया है। अटल बिहारी वाजपेयी ने संविधान समीक्षा आयोग अच्छी नियत से बनाया था, लेकिन उसे दलगत राजनीति का शिकार बना दिया गया। वाजपेयी के उस समय के प्रयास को अम्बेडकर विरोधी मानसिकता बताकर खारिज किया गया। जबकि अम्बेडकर संविधान निर्माता नहीं, अलबत्ता सिर्फ प्रारूप कमेटी के अध्यक्ष थे। सिर्फ अम्बेडकर का सवाल ही नहीं उठाया गया, अलबत्ता देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस ने भी समीक्षा आयोग को विदेशी मूल का मुद्दा तय करने की नियत से बनाया जाना बताकर खारिज कर दिया। हालांकि संविधान निर्माण के समय किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कभी विदेशी मूल का नागरिक देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, सेनाध्यक्ष या मुख्य न्यायाधीश के पद का दावेदार हो सकता है। उस समय अगर किसी ने कल्पना की होती, तो चर्चा जरूर होती, फिर भले ही फैसला कुछ भी हुआ होता। आज इस मुद्दे पर देश के नेताओं और संविधान विशेषज्ञों की राय बिना लाग लपेट नहीं हो सकती, जैसी संविधान निर्माण के समय होती। उस समय किसी ने ऐसे हालात की कल्पना भी की होती, तो  संविधान निर्माता समिति के जवाहर लाल नेहरू, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, पंडित गोविन्द बल्लभ पंत और आचार्य कृपलानी ही विदेशी मूल के नागरिक को सर्वोच्च पदों से वंचित करने का प्रावधान करके जाते। जस्टिस वेंकटचलैया की रहनुमाई वाला संविधान समीक्षा आयोग संविधान और संसदीय लोकतंत्र की दर्जनों खामियां सामने होने के बावजूद कोई अच्छा सुझाव नहीं दे सका। वेंकटचलैया क्योंकि पूर्व मुख्य न्यायाधीश थे, इसलिए वह न्याय पालिका में सुधारों के इर्द-गिर्द ही घूमते रहे।

मौजूदा संसदीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खामी यह है कि लोकसभा, विधानसभाओं और स्थानीय निकाय के चुनावों में कोई बड़ा फर्क नहीं है, जबकि तीनों का काम अलग-अलग तरह का है। एक ही तरह के वोटर तीनों ही चुनावों में हिस्सा लेते हैं और एक जैसी योग्यताओं वाले उम्मीदवार तीनों तरह के चुनावों में खड़े हो सकते हैं। जबकि तीनों ही जनप्रतिनिधियों की भूमिकाएं और कार्यक्षेत्र अलग-अलग है। राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की अलग-अलग भूमिका और अलग-अलग व्याख्या तय होती, तो हम लोकसभा और विधानसभाओं का मौजूदा स्वरूप नहीं देखते। संसद की भूमिका देशभर के लिए कानून का निर्माण कराने, देश की अर्थव्यवस्था और विकास को दिशा देने की है। इसलिए लोकसभा और राज्यसभा का चुनाव लड़ने वालों के लिए अलग मापदंड और योग्यता तय होनी चाहिए थी। राज्य विधानसभाओं की भूमिका राज्य के लिए राज्य की सूची वाले कानूनों को बनाने और राज्य के विकास की है, इसलिए विधानसभा का चुनाव लड़ने की अलग योग्यता और अलग मापदंड तय होना चाहिए था। नगर पालिकाओं और पंचायतों की भूमिका अलग है इसलिए वहां अलग मापदंड और योग्यता तय की जानी चाहिए। इसी हिसाब से संसद के चुनाव में हिस्सा लेने का हक सिर्फ राष्ट्रीय दलों को दिया जाता, विधानसभाओं का चुनाव लड़ने का हक राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों को दिया जाता, तो आज हमारे सामने ऐसी समस्या खड़ी नहीं होती, जैसी एटमी करार पर देख रहे हैं। देश की संप्रभुता, सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय स्थिति, विदेश नीति को प्रभावित करने वाले इस एटमी करार का फैसला अब एक-एक, दो-दो, पांच-पांच सांसदों वाले टीआरएस, जेडीएस, आरएलडी, तृणमूल कांग्रेस, झारखंड विकास मोर्चा, मुस्लिम लीग, एसडीएफ जैसे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के सांसद और आधा दर्जन निर्दलीय सांसद करेंगे। संसदीय लोकतंत्र की इस बड़ी खामी के कारण राष्ट्रीय दलों का बहुमत लोकसभा में बेचारगी की हालत में खड़ा होगा। राजनीतिक स्वार्थों के चलते ऐसे संशोधनों की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिसमें संसद का चुनाव लड़ने का हक सिर्फ  राष्ट्रीय दलों को हो, राष्ट्रीय दल का मापदंड भी कम से कम एक तिहाई राज्यों में दस फीसदी वोट हो, उम्मीदवार और वोटर के लिए कम से कम स्नातक होने की योग्यता तय हो।

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