उल्फा के बहाने बात मूल निवासियों के हक की

पूर्वोत्तर के कई राज्य ब्रिटिश भारत के मानचित्र में भी नहीं थे। अलग भाषा और नस्ल के कारण पूर्वोत्तर में अलगाववादी आंदोलन तो था ही, विकास के असंतुलन ने आग में घी का काम किया है।

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना 19 दिसम्बर को भारत आ रही हैं। उनके भारत आने से ठीक पहले बांग्लादेश सीमा से लगते असम राज्य  के अलगाववादी संगठन उल्फा के बड़े नेता गिरफ्तार कर भारत के सुपुर्द किए गए हैं। असम में बाहरी लोगों के खिलाफ लड़ाई के दो पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है। पहला आंदोलन आसू ने बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ शुरू किया था। आंदोलन मूल आबादी का राज्य पर राजनीतिक अधिकार बनाए रखने का था। कांग्रेस बांग्लादेशियों के राशन कार्ड और वोट बनाकर उन्हें अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए इस्तेमाल कर रही थी। कई विधानसभा क्षेत्रों में हालत यह हो गई थी कि हार-जीत की चाबी बांग्लादेशियों के हाथ में आ गई थी। सत्ता के वर्चस्व का हिंसक नजारा 1983 में देखने को मिला जब विधानसभा चुनाव में कम से कम तीन हजार लोग मारे गए। शांतिप्रिय आंदोलन हिंसक रूप ले चुका था। राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद एक तरफ असम का आंदोलन खत्म करने के लिए 15 अगस्त 1985 को आसू से राजनीतिक समझौता किया। तो दूसरी तरफ पंजाब में सिखों की नाराजगी दूर करने के लिए 24 जुलाई 1985 को संत हरचंद सिंह लोगोवाल से समझौता किया। नतीजतन दोनों ही राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ। राजीव गांधी सत्ता की राजनीति से काफी दूर थे। अपनी पार्टी के हित की बजाए अनेक बार उन्होंने राष्ट्रीय हित को तरजीह दी। यह दो उदाहरण यही दर्शाते हैं। तीसरा उदाहरण दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद का भी है, जो उन्हीं के कार्यकाल में बनी।

राजीव गांधी पूर्वोत्तर के अलगाववादी आंदोलनों से बेहद चिंतित थे। उन्होंने पूर्वोत्तर के आदिवासियों का दिल जीतने के लिए विकास की कई योजनाएं शुरू की। लेकिन देश के बाकी हिस्सों की तरह पूर्वोत्तर में भी विकास की योजनाएं बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का शिकार होकर रह गई। आज मुंबई में उत्तर भारतीयों खासकर बिहारियों के खिलाफ जो आंदोलन दिखाई दे रहा है, वही आंदोलन पूर्वोत्तर में सत्तर के दशक से चल रहा है। जहां आसू का आंदोलन सिर्फ बांग्लादेशियों के खिलाफ था वहां यूनाईटिड लिब्रेशन फ्रंट आफ असम यानी उल्फा ने भी ठीक उसी समय 1979 में आंदोलन किया था। उल्फा का आंदोलन असम को गैर असमियों से मुक्त कराकर स्वतंत्र देश की स्थापना करना था। यह आंदोलन बांग्लादेशियों के खिलाफ कम, वहां जा बसे उत्तर भारतीयों के खिलाफ ज्यादा था। इसलिए उल्फा उग्रवादियों को बांग्लादेश से समर्थन मिलना शुरू हो गया। तभी से असम में अलगाववादी गतिविधियों का केंद्र बांग्लादेश बना हुआ है।

मूल निवासियों की ओर से राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक प्रतिष्ठानों पर अपना कब्जा बरकरार रखने की कोशिश सिर्फ असम और मुंबई में ही नहीं दिखती। बीते हफ्ते पंजाब के लुधियाना में हुई हिंसक झड़पें भी इसी का उदाहरण हैं। बासठ सालों में विकास के भारी असंतुलन ने देश में इस समस्या को विकट रूप तक पहुंचा दिया है। झारखंड, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण भी विकास के असंतुलन और मूल निवासियों के अस्तित्व पर खतरे के कारण हुआ। दिल्ली और मुंबई बासठ साल में अपना चरित्र बदल चुकी हैं, देश के बाकी महानगरों में भी यही स्थिति पैदा हो रही है, जिस कारण मूल निवासियों की कुंठाएं बढ़ रही हैं। लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में असम एक ऐसा राज्य था जिसने इस खतरे को सबसे पहले सत्तर के दशक में भांप लिया था। अपने अस्तित्व के बचाव के लिए अस्सी के दशक में असम के बोडो आदिवासियों ने बोडोलैंड की मांग शुरू कर दी थी। नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट बोडोलैंड की मांग अपने क्षेत्र को राज्य के भीतर ही स्वायत्तता दिलाना है। असम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों की स्थिति देश के बाकी हिस्सों से थोड़ी अलग है। सिलीगुड़ी या चिकेन नेक के नाम से मशहूर पश्चिम बंगाल का छोटा कारीडोंर पूर्वोत्तर के सात राज्यों को भारत की मुख्य धरती से जोड़ता है। इसमें हम असम को नहीं जोड़ते, जो 1947 से पहले ही भारत से जुड़ा है और वहां की भाषा, संस्कृति, इतिहास भारत के इतिहास से अलग नहीं है। हालांकि असम में भी ब्रिटिश भारत से पहले आहोम राजशाही का शासन था। उल्फा ने अपने अलगाववादी आंदोलन की शुरूआत उस रंगघर पैवेलियन से की थी जो कभी आहोम राजशाही की प्रमुख सीट मानी जाती थी। पूर्वोत्तर के बाकी मौजूद सात राज्यों मेघालय, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, नगालैंड और सिक्किम की भाषा, वेशभूषा, संस्कृति और यहां तक कि लोगों के चेहरे-मोहरे भी बाकी भारतीयों से अलग हैं। एक-दो राज्यों को छोड़कर करीब करीब पूरे पूर्वोत्तर में सशस्त्र विद्रोह चल रहा है। कोई संगठन पूर्ण आजादी की मांग कर रहा है तो कोई भारतीय संविधान के तहत स्वायत्तता की मांग करता है।

वस्तुस्थिति यह है कि पूर्वोत्तर के इस हिस्से के साथ ही चीन के कब्जे वाले तिब्बत की स्थिति काफी भिन्न रही है। इस पूरे इलाके पर न कभी चीन का अधिपत्य रहा है और न पूरे तौर पर भारत का। देश की आजादी से पहले असम भी पूरे तौर पर भारतीय राजनीतिक मानचित्र का हिस्सा नहीं था। नगालैंड, मिजोरम और मेघालय उस समय तक असम का ही हिस्सा थे। मणिपुर और त्रिपुरा पर स्थानीय राजघराने का शासन था, जो ब्रिटिश काल में ही भारत का हिस्सा बने थे। अरुणाचल और सिक्किम भी ब्रिटिश भारत का हिस्सा नहीं थे। बीसवीं सदी के शुरू में ब्रिटेन ने भारत का राजनीतिक मानचित्र खिंचा तो पूर्वोत्तर के असम, मणिपुर और त्रिपुरा को भारत में शामिल किया, तो उत्तर पूर्व के बलूचिस्तान और उत्तर पश्चिम फ्रंटीयर राज्य को भारतीय मानचित्र में शामिल किया। आजादी के बाद जहां भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में विद्रोह की चिंगारियां भड़कती रहती हैं, वहीं बलूचिस्तान और एनडब्ल्यूएफपी पाकिस्तान के लिए समस्या बना हुआ है। बलूचिस्तान में शुरू से ही पाकिस्तान से अलग होने का आंदोलन चल रहा है, तो भारत के हिस्से में आए अरुणाचल और सिक्किम पर चीन अपना दावा ठोकता रहा है। अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में चीन ने सिक्किम को तो भारत का हिस्सा मान लिया है, लेकिन अरुणाचल पर अभी भी दावा नहीं छोड़ा है, जिस पर भारत-चीन बातचीत चल रही है। ब्रिटिश हुकूमत की ओर से भारत और तिब्बत में बार्डर के तौर पर तय की गई मेकमोहन रेखा को चीन मान्यता नहीं देता।

एक तरफ अरुणाचल को लेकर चीन का दावा है तो दूसरी तरफ आजादी के समय तक राजशाही बरकरार रहने वाले मणिपुर और त्रिपुरा में अलगाववादी आंदोलन चल रहा है। मणिपुर में पीपुल्स लिबे्रेशन आर्मी, यूनाईटेड नेशनल लिब्रेशन फ्रंट और पीपुल्स रिवोलयूशनरी पार्टी आजादी का खूनी आंदोलन चलाए हुए हैं त्रिपुरा के आंदोलन की बागडोर तो वामपंथी उग्रवादियों के दो संगठनों नेशनल लिबेशन आफ त्रिपुरा और आल त्रिपुरा टाईगर फोर्स के हाथ में हैं, जिन्हें चीन और नेपाल के माओवादियों का समर्थन हासिल है। इसी तरह आजादी तक राज घराने के शासनाधीन रहे नगालैंड में पहले फिजों का आंदोलन चल रहा था तो अब एनएससीएन-एन और एनएससीएन-के का आंदोलन चल रहा है। इन दोनों संगठनों का लक्ष्य ग्रेटर नगालैंड की स्थापना है। जिसमें मणिपुर और असम का चचार पर्वतीय इलाका शामिल हो। राजीव गांधी के शासनकाल से ही इन दोनों संगठनों से केंद्र सरकार की बातचीत चल रही है। वाजपेयी के शासनकाल में बातचीत ने तेजी पकड़ी थी, लेकिन पिछले पांच साल से अब लगातार युध्द विराम की अवधि बढ़ाकर काम चलाऊ फार्मूला अपनाया जा रहा है। मेघालय में गारो हिल्स का आंदोलन चल रहा है, मिजोरम में असमियों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ आक्रोश है। लेकिन इन सभी छोटे-छोटे विद्रोही संगठनों से ज्यादा खतरा है उल्फा का। जो 30 साल के बाद बातचीत के लिए मजबूरी में राजी हुआ है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत दौरे से पहले उल्फा प्रमुख अरबिंद राजखोवा और उनके कई प्रमुख सहयोगी चार दिसंबर को भारत के सुपुर्द कर दिए गए, उनकी गिरफ्तारी बांग्लादेश में पांच दिन पहले हो चुकी थी। हिंसक आंदोलन का प्रमुख अगुवा परेश बरूआ अभी भी शिकंजे से बाहर है, इसलिए राजखोवा की गिरफ्तारी को उल्फा आंदोलन का अंत मानना जल्दबाजी होगी। मूल समस्या विकास के असंतुलन से उपजी है जो आज असम, मुंबई और लुधियाना में दिखती है। अगर असंतुलन खत्म नहीं हुआ तो देश में जगह-जगह मूल निवासी विद्रोह पर उतर आएंगे।

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