दोस्त, दुश्मन की पहचान जरूरी

हम भारतीय इतने सुसंस्कारित हैं कि मरे हुए व्यक्ति की बुराईयां नहीं देखते। ऐसा नहीं कि ऐसी सुसंस्कृति अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान की नहीं। आखिर भारत और पाकिस्तान एक ही देश के विभाजन से ही तो बने हैं। धर्म और पूजा पध्दति को छोड़ दें, तो दोनों देशों की संस्कृति, भाषा-बोली, रहन-सहन एक जैसा ही है। इसीलिए बेनजीर भुट्टो की हत्या पर हम भारतीयों को गहरा सदमा लगा। भले ही बेनजीर ने कभी भी भारत के साथ दोस्ती की वैसी पैरवी नहीं की, जैसी नवाज शरीफ ने की। या कारगिल की साजिश रचने के बाद परवेज मुशर्रफ भी करते रहे हैं। हालांकि मेरे जैसे करोड़ाें भारतीय परवेज मुशर्रफ पर भरोसा नहीं करते, वह बाकी पाकिस्तानी शासकों से कहीं ज्यादा मक्कार और जुबान के कच्चे हैं। जहां तक बेनजीर भुट्टो की बात है, तो उनकी हत्या पर भारत ने पुरानी सारी बातें भुलाकर उन्हें अपना दोस्त बताना शुरू कर दिया। यह भारत की संस्कृति ही है, जिसमें मरने वाले की बुराई नहीं देखी जाती। इसीलिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बेनजीर भुट्टो को श्रध्दांजलि देते हुए पाकिस्तानी उच्चायोग की श्रध्दांजलि पुस्तिका में यहां तक लिख दिया कि दक्षिण एशिया ने एक ऐसा राजनीतिक नेता खो दिया, जो भारत-पाक में दोस्ती की हिमायती थी।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह राजनीति और कूटनीति की अज्ञानता बार-बार साबित करते रहे हैं। इससे पहले इंग्लैंड में जाकर भारत में अंग्रेजों के राज में हुए विकास की तारीफ करके विवाद का विषय बन चुके हैं। बेनजीर की हत्या का अफसोस हर भारतीय को है, इसकी बड़ी वजह यह है कि कारगिल पर हमला करने वाले परवेज मुशर्रफ को पसंद नहीं किया जाता और इस समय बेनजीर उनके शासन का खात्मा करने की तरफ आगे बढ़ रहीं थी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश करें और भारत से दोस्ती की विरोधी रही बेनजीर को दोस्ती का समर्थक बताना शुरू कर दें। प्रधानमंत्री की ओर से श्रध्दांजलि पुस्तिका में लिखी गई बात इतिहास का हिस्सा बनेगी, इसलिए इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाना ठीक नहीं। कम से कम मौजूदा पीढ़ी को इतिहास का सच मालूम होना चाहिए, प्रधानमंत्री ने जो कुछ लिखा है, या जो मोटे तौर पर भारतीय मीडिया में छप रहा है, वह सच से कोसों दूर है।

सच यह है कि कश्मीर में भारत विरोधी आतंकवाद की शुरूआत उस समय हुई, जब बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी। बेनजीर भुट्टो खुद कश्मीर को हिंदू मुक्त प्रांत बनाकर भारत के लिए समस्या खड़ी करने के षड़यंत्र में शामिल थी। सच यह है कि बेनजीर भुट्टो ने प्रधानमंत्री रहते हुए कभी भी भारत के साथ दोस्ती की ईमानदारी से कोशिश नहीं की। जिस समय बेनजीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री थी, उसी समय कश्मीर में आतंकवाद शुरू हुआ और कश्मीरी पंडितों को बेघर करके कश्मीर से बाहर निकाला गया। जम्मू कश्मीर में उस समय जगमोहन राज्यपाल थे और बेनजीर भुट्टो एक नहीं अलबत्ता अनेक बार हमारे प्रांत के राज्यपाल के खिलाफ बोली थी। बेनजीर भुट्टो ने ही कश्मीर की आजादी का नारा लगाया था। भारत के साथ दोस्ती के सच को जानने के लिए दूर जाने की जरूरत नहीं। अपनी हत्या से ठीक पहले बेनजीर जो भाषण दे रही थी, उसमें भी उसने भारत के खिलाफ आग उगली थी। बेनजीर भुट्टो ने अपने आखिरी भाषण में भी कहा कि उनके पिता जुल्फिकार अली भुट्टो को जब पता चला कि भारत ने परमाणु बम बना लिया है, तो उन्होंने कहा था कि पाकिस्तानी घास की रोटी खा लेगा, लेकिन परमाणु बम बनाकर रहेगा। बेनजीर भुट्टो ने अपने इस भाषण में यह भी कहा कि जब वह प्रधानमंत्री बनी, तो खुफिया एजेंसियों ने उन्हें बताया कि भारत के पास मारक हथियार हैं, जिनका मुकाबला करने के लिए हमें भी मारक हथियार बनाने चाहिए। बेनजीर ने कहा कि उन्होंने तुरंत भारत जैसे ही हथियार बनाने और आयात करने का आदेश दिया। बेनजीर ने यहां तक कहा कि प्रधानमंत्री बनने पर वह भारत के खतरे से सख्ती के साथ निपटेगी। अपने आखिरी भाषण में बेनजीर ने पाक की जनता को भारत के खिलाफ भड़काते हुए यह भी कहा था कि भारत ने पाकिस्तान का बटवारा करवाया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को बेनजीर भुट्टो के इस आखिरी भाषण में दोस्ती की गंध कहां से आई, समझ से परे है।

मनमोहन सिंह मीडिया की ओर से पेश किए जा रहे असत्य का शिकार हुए हों, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भारत सरकार का सूचना तंत्र इतना कमजोर भी नहीं है। प्रधानमंत्री को पाकिस्तान उच्चायोग जाने से पहले यह जानकारी तो दी ही गई होगी कि बेनजीर भुट्टो का प्रधानमंत्री के नाते कैसा इतिहास रहा है। भारत के साथ दोस्ती की बात छोड़ भी दें, तो आतंकवाद के मुद्दे पर भी बेनजीर भुट्टो का रिकार्ड ठीक नहीं रहा। उन्होंने न सिर्फ भारत में आतंकवाद की नींव रखी, अलबत्ता उन्हीं के शासनकाल में अफगानिस्तान से सोवियत फौजों को शिकस्त देने के लिए तालिबान की नींव रखी गई थी। यह इतिहास का कड़वा सच है कि अफगानिस्तान को सेक्युलर बनने से बचाने और इस्लामिक देश बनाए रखने के लिए पाकिस्तान की गुप्तचर एजेंसी आईएसआई ने तालिबान के निर्माण में मदद दी। पाकिस्तान के हर शासक ने ओसामा बिन लादेन की मेहमान की तरह खातिरदारी की। यह अलग बात है कि बेनजीर भुट्टो अमेरिकी सहयोग से पाकिस्तान में घुसने के बाद अपने आखिरी दिनों में तालिबान और ओसामा बिन लादेन के खिलाफ बोल रही थी। अमेरिकी राष्ट्रपति बुश से गठजोड़ के कारण ही उसी तालिबान और अलकायदा ने बेनजीर को मौत के घाट उतार दिया, जिसने उन्हें पाल-पोषकर बडा किया था। इन तथ्यों की रोशनी में न तो बेनजीर को आतंकवाद विरोधी शख्सियत माना जा सकता है, न लोकतंत्र के लिए शहीद होने वाली और न ही भारत के मित्र के तौर पर पहचान दी जा सकती है। अपनी संस्कृति के मुताबिक मरने वाले की बुराई नहीं की जाती, लेकिन तारीफ में तथ्यों को नजरअंदाज करना इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना है। मरने वालों के साथ कोई मर नहीं जाता, इसलिए बेनजीर की मौत से भारत के प्रति उसके ख्यालों को मरा हुआ नहीं माना जा सकता। बेनजीर भुट्टो के भारत विरोधी ख्यालात पाकिस्तान के इतिहास का हिस्सा है और उस इतिहास से छेड़छाड़ कर बेनजीर को भारत का मित्र बताने की हिमाकत नहीं करनी चाहिए।

आपका लेख पध् अचच्ा लगा.

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